भारतकोश
संक्षिप्त योगवासिष्ठ

संक्षिप्त योगवासिष्ठ

Sankshipt Yoga Vasistha

महर्षि वाल्मीकि द्वारा

DevanagariHindipublished750 पृष्ठ

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६९२ * अविच्छिन्नचिदात्मैकः पुमानस्तीह नेतरत् * [ संक्षिप्त योगवासिष्ठ

अभीष्ट नहीं है; क्योंकि स्वप्न भी ब्रह्म ही है। स्वप्नका तुम्हें अनुभव है, इसलिये उसके द्वारा तुम्हें समझाया जाता है। ‘स्वप्नमें यह शरीर कौन है, ये स्वप्नगत पदार्थ किसके हैं अथवा किसमें स्वप्नबुद्धि है’ इत्यादि रूपसे विचार करके ज्ञानीके द्वारा समझे गये भ्रमरूपी स्वप्नसे अज्ञानीको बोध कराया जाता है। ब्रह्ममें न जाग्रत् है, न स्वप्न है, न सुषुप्ति है और न और ही कुछ है। किंतु मन-वाणीसे अगोचर, तुरीय ओंकारस्वरूप परम पुरुषार्थमय, स्वयंप्रकाश चिदाकाश ही इस जगत्‌के रूपमें भासित होता है। आज जो यह विश्व इस तरह भासित-सा होता है, इसे अभासित ही समझो। पहले जिस तरह सच्चिदानन्दघनरूपसे भासित था, उसी तरह वह अब भी अत्यन्त निर्मल है। जाग्रत्, स्वप्न आदि अवस्थाएँ इसमें कदापि नहीं हैं। यह द्वैत-अद्वैत सब कुछ ब्रह्ममय ही है। पूर्ण परब्रह्म परमात्मासे पूर्णका ही प्रसार होता है। अतः पूर्ण परमात्मरूपसे ही यह जगत् स्थित है। न तो कभी इसका भान हुआ है और न अभान। स्फटिक शिलाके घनीभूत मध्यभागकी भाँति यह सदा सच्चिदानन्दघन ही है। लोक, शास्त्र, वेद आदिमें जो वस्तु युक्ति, प्रमाण और अनुभवसे सिद्ध है, वह सिद्ध ही है। वही वस्तु स्वानुभवसे जानी जाती है। अतः परम पुरुषार्थरूपसे फल देती है। अन्य सब वस्तुओंका निराकरण करके जिस एक वस्तुका चिरकालतक चिन्तन किया जाता है, उसीकी अवश्य प्राप्ति होती है। लोकमें सब जगह देखा जाता है कि दूसरी-दूसरी वस्तुएँ भी चिरकालतक चिन्तित या भावित होनेपर अवश्य प्राप्त हो जाती हैं। महात्मन् ! मतिमान् नरेश ! इस प्रकार मैंने तुम्हारे महान् प्रश्नोंपर विचार करके यह अपना निर्णय बताया है। तुम शीघ्रतापूर्वक इसी मार्गके पथिक बन जाओ तथा मनसे निश्चिन्त, शरीरसे नीरोग और इन्द्रियोंसे वासनाशून्य होकर सर्वश्रेष्ठ हो जाओ।

(सर्ग २१०)


सिद्ध आदिके लोकोंकी संकल्परूपता बताते हुए इस जगत्‌को भी वैसा ही बताना और ब्रह्ममें अहम्भावका स्फुरण ही हिरण्यगर्भ है, उसका संकल्प होनेके कारण त्रिलोकी भी ब्रह्म ही है—इसका प्रतिपादन

श्रीवसिष्ठजी कहते हैं—रघुनन्दन ! इलावती नगरीमें बैठकर राजा प्रज्ञप्तिपर अनुग्रह करनेका जो मेरा प्रयोजन था, उसे पूरा करके उस राजाद्वारा सम्मानित मैंने स्वर्गलोकमें जानेके लिये आकाशमार्गका आश्रय लिया।

श्रीरामजीने पूछा—ब्रह्मन् ! सिद्ध, साध्य, यम, ब्रह्मा, विद्याधर और देवताओंके लोक तथा वहाँके निवासी कैसे दिखायी देते हैं ? यह मुझे बताइये।

श्रीवसिष्ठजीने कहा—रघुनन्दन ! सिद्ध, साध्य, यम, ब्रह्मा, विद्याधर, देवताओं तथा अन्य अपूर्व महात्मा प्राणियोंके लोकोंको यदि तुम विशेष धारणाओंद्वारा देखनेका प्रयत्न करो तो प्रतिरात, प्रतिदिन, आगे, पीछे, ऊपर और नीचे देख सकते हो और न देखना चाहो तो नहीं देख सकते हो। जैसे सिद्धोंके ये कल्पनालोक हैं, उसी तरह हमारा यह लोक भी काल्पनिक ही है।

सिद्धोंने लोकोंकी रचना करके अपने संकल्पसे उन सबको स्थिर कर लिया है। सारा जगत् सदा निराकार निर्विकार शान्तस्वरूप चिदाकाश ही है। जिसने जैसा दृढ़ निश्चय किया, उसकी दृष्टिमें यह वैसा ही प्रतीत होता है। उससे भिन्न प्रकारका नहीं। जो वस्तु दृढ़ निश्चयसे प्रकाशित होती है, वह चिन्मय स्वभावसे युक्त होनेके कारण प्रकाशरूपसे ही भासित दिखायी देती है। किंतु यह विश्व किसीको दृढ़ निश्चयपूर्वक विदित नहीं है; इसलिये इसमें स्वभावतः चित्सत्ता और स्फूर्तिकी व्याप्ति नहीं है। इसलिये यह सब शून्य और निराकार