संक्षिप्त योगवासिष्ठ
Sankshipt Yoga Vasistha
महर्षि वाल्मीकि द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंनिर्वाण-प्रकरण उ० ] * राजा प्रज्ञातिके प्रश्नोंपर श्रीवसिष्ठजीका विचार एवं निर्णय * ६९१
राजा प्रज्ञातिके प्रश्नोंपर श्रीवसिष्ठजीका विचार एवं निर्णय
श्रीवसिष्ठजी कहते हैं—राजन् ! यदि ध्यान करनेवाला उपासक आत्मज्ञानके सुखकी अनुभूतिसे वञ्चित होनेके कारण यही चिन्तन करे कि 'मैं इस चन्द्रमामें ही प्रवेश करूँ' तो वह इसीमें प्रवेश करता है। 'मैं चन्द्रमण्डलके सुखसे सम्पन्न होकर चन्द्रमामें प्रवेश करूँ' ऐसा चिन्तन करनेवाला उपासक वैसे ही सुखका भागी होता है, यह निश्चय है। यह उपासक दृढ़ निश्चयके साथ जैसे स्वभावका ध्यान करता है, उसकी अक्षय चेतना वैसे ही स्वभावका अनुभव करती है। जैसे सभी ध्यानकर्ताओंको अपने-अपने संकल्पके अनुसार पृथक्-पृथक् चन्द्रत्वका अनुभव होता है, वैसे ही स्त्रीचिन्तन करनेवाले पुरुषोंको अपनी-अपनी कल्पनाके अनुसार अलग अलग काल्पनिक स्त्रीलाभकी प्रतीति होती है। जो घरसे बाहर न निकलकर भी सातों द्वीपोंका राजा बना बैठा है, उसका वह कल्पनासिद्ध साम्राज्य उसके घरमें ही चिदाकाशके भीतर भासित होता है।
राजन् ! दान, श्राद्ध, तप और जप आदि अमूर्त कर्मोंका परलोकमें जो मूर्तिमान् फल प्रकट होता है वह कैसे सम्भव है, यह बताया जाता है, सुनो। उनकी बुद्धि उन दान आदि सत्कर्मोंके संस्कारसे भावित होती है। अतः वे परलोकमें अमूर्त रहकर ही मूर्तिमान् फलको देखते और अनुभव करते हैं। वह फल चिन्मय स्वरूपसे ही अनुभवमें आता है। मन और ज्ञानेन्द्रियोंसे वेदना और अवेदनाकार भ्रान्ति होती है। इस भ्रान्तिके द्वारा विषयप्राप्तिके लिये वह चिन्मय जीव मनसहित कर्मेन्द्रियोंसे प्रेरित हो सचेष्ट एवं निश्चेष्ट होता है। फिर उस भ्रान्तिकी निवृत्ति होनेपर वह निर्मल, शान्त, चिन्मय आत्मा ही शेष रहता है। इस लोकमें किये गये दानसे परलोकमें चिन्मय संकल्परूप भिन्न-भिन्न फलकी प्राप्ति होती है। उसे संकल्परूप जीव प्राप्त करता है। ऐसा विद्वानोंका कहना है। फिर वह फल परलोकमें क्यों न मिले। इस कल्पनामय संसारमें अकृत्रिम संकल्प ही चिन्मय फलरूप होकर चारों ओर उपलब्ध होता है। भले ही वह दान न करनेके कारण दारिद्र्यजनित दुःखके रूपमें प्राप्त हुआ हो अथवा दान करनेसे ऐश्वर्य-भोगके रूपमें उपलब्ध हुआ हो। वह सब का-सब होता है चिन्मय ही। राजन् ! तुमने जैसा पूछा था, उसके अनुसार यह सब मैंने बता दिया। यह सारा जगत् आकारशून्य तथा चिन्मय ब्रह्मका संकल्पमात्र है।
राजाने पूछा—भगवन् ! सृष्टिके आदिमें जब एक निराकार चिदाकाश ही था, तब उसके द्वारा देहकी कल्पना कैसे सम्भव हुई (क्योंकि शरीरमें ही चैतन्यकी अभिव्यक्ति देखी जाती है, अव्यक्त चैतन्यमें भ्रान्ति आदि नहीं देखी जाती। ऐसी दशामें पहले भ्रान्तिकी सिद्धि हो, तब देहकी सिद्धि हो सकती है और देहकी सिद्धि हो तभी भ्रान्तिकी सिद्धि हो सकती है, यह अन्योन्याश्रय दोष आता है)। तथा शरीरके बिना चैतन्यकी अभिव्यक्ति कैसे सम्भव है !
श्रीवसिष्ठजी बोले—महामते ! तुमने देह शब्दका जो अर्थ समझा है, वह तत्त्वज्ञानीके प्रति उसी तरह असम्भव है, जैसे आकाशमें पत्थरोंका नाचना। तत्त्वज्ञानीकी दृष्टिमें जो ब्रह्म शब्दका अर्थ है, वही देह शब्दका भी अर्थ है। इन दोनोंके अर्थमें वैसे ही भेद नहीं है, जैसे अम्बु और अम्बस् शब्दोंके अर्थमें (अम्बु और अम्बस् दोनों जलके ही वाचक हैं, उसी तरह ब्रह्म और देह एक ही अर्थके बोधक हैं)। स्वप्नदेहके समान यह शरीर भी ब्रह्म ही है, उससे भिन्न नहीं है। यदि कहो कि स्वप्नदेह भी ब्रह्म ही है तो उसे भिन्न-सा मानकर उसका दृष्टान्त क्यों दिया जाता है ? तो इसके उत्तरमें निवेदन है कि यह तुम्हारे समझनेके लिये युक्तिमात्र दी गयी है। वास्तवमें स्वप्नदेहको उससे भिन्न बताना