भारतकोश
संक्षिप्त योगवासिष्ठ

संक्षिप्त योगवासिष्ठ

Sankshipt Yoga Vasistha

महर्षि वाल्मीकि द्वारा

DevanagariHindipublished750 पृष्ठ

पृष्ठ 739, कुल 750 में से

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६९० * अविच्छिन्नचिदात्मकः पुमानस्तीह नेतरत् * [ संक्षिप्त योगवासिष्ठ

यह प्रजा है, वह तुम्हारे संकल्पके अनुसार बनी है, उसी तरह ब्रह्मके संकल्पसे सम्पन्न हुए जगत्में यह प्रजा ब्रह्म-संकल्पके अनुसार ही होती है। अपने इस संकल्पनगरमें जैसा तुमने चाहा है, वैसा सब कुछ यहाँ स्थित है और आगे जैसा संकल्प करोगे, वैसा ही सब कुछ देखोगे।

राजन्! चिदाकाशके संकल्प-नगरके भीतर स्थित हुए इस दृश्यजगत्का ऐसा स्वभाव ही है कि यह कभी प्रकट होता है कभी लुप्त हो जाता है और फिर क्षण-भरमें ही प्रकट हो जाता है। बच्चोंके संकल्प-नगरके समान तथा आकाशमें स्थित केशोंके वर्तुलाकार गोले आदिकी भाँति ये सत्-असत्-रूप असंख्य सर्ग चेतना-काशमय परमात्मामें भासित होते हैं। तुम एक संकल्प-नगरका निर्माण करके दूसरे संकल्पके वशीभूत हो स्वयं ही उसी क्षण उसका विनाश कर डालते हो। यह जैसे तुम्हारा अपना स्वभाव है, वैसे ही चिदाकाशके संकल्प-नगरमें जो उन्मज्जन निमज्जन - उन्मेष-निमेष होते हैं, वह ब्रह्मके स्वभावका निर्मल विकास ही है, ऐसा समझो। इसलिये चैतन्यघन, अनादि-अनन्त महाकाश ही त्रिलोकाकाश बना हुआ है। इस कारण वह आज जो कुछ भी करता और सोचता है वह सब उस आचरण-रहित ब्रह्म परमात्माके सत्यसंकल्पसे सैकड़ों योजन दूर और अनेक युगोंके व्यवधानके बाद भी समीप और वर्तमान कालमें किये गये कर्मकी भाँति अपना फल प्रकट करने-वाला होता है। देशान्तर और कालान्तरमें भी जो आवरणशून्य एकमात्र आत्मा है, उसमें देश और काल दोनोंका सदा सांनिध्य रहता है; इसलिये कौन-सा ऐसा कर्म और फल है, जिसे वह न जानता हो। जैसे चमकती हुई मणिमें अपनी कान्तिमे ही दीप्तिविशेषके आविर्भाव-तिरोभावका अनुभव होता है, उसी प्रकार चिदाकाशरूपी मणिमें जगतोंके सृष्टि, प्रलय और विविध फलभोगरूप परिवर्तन अनुभूत होते हैं। शास्त्रके विधि और निषेधसम्बन्धी वचनोंका प्रयोजन है लोकमर्यादाकी रक्षा। वह सर्वव्यापी ब्रह्मके सङ्कल्पमें स्थित है, इसलिये परलोकमें भी जीवको फलकी प्राप्ति करानेवाली होती है। ब्रह्म न कभी उदित होता है, न अस्त। जैसे द्रष्टा, दृश्य आदिकी कल्पनासे युक्त जो तुम्हारा कल्पना-नगर है, वह स्वयं तुम हो, उसी प्रकार ब्रह्मके संकल्पसे प्रकट हुआ जगत् स्वयं ब्रह्म ही है। जब वह जगत्के रूपमें भासित होता है, उस समय 'जगत्की सृष्टि हुई,' ऐसा कहा जाता है; परन्तु यह केवल कहनेके लिये है, वास्तवमें ऐसी बात नहीं है।

चिद्-घन-परमात्माका यह सुस्पष्ट स्वभाव ही है कि वह जिस-जिसका संकल्प करता है, तत्काल ही वे पदार्थ वहाँ अवयवोंसहित प्रकट हो जाते हैं। संकल्प-कल्पित पदार्थ स्वभाववश नानारूपसे स्थित होनेपर भी परब्रह्ममें चिन्मय-रूपसे भासित होते हैं तथा स्वभावतः अनेक आकारवाले होनेपर भी उनका सार-तत्त्व एक ही होता है अर्थात् वे सद्रूपसे एक ही होते हैं। इस प्रकार आदि, मध्य और अन्तसे रहित, अनन्त शक्तिशाली ब्रह्म किंचित्-अकिंचित् तथा सत्-असत् दोनों रूपोंसे स्थित है। वह सर्वात्मक है, इसलिये प्राणियोंमें और तृण-गुल्म तथा पेड़-पौधे आदिमें, जहाँपर जो वस्तु जैसे और जिस स्वभावसे स्थित है वहाँपर वैसे स्वभावसे युक्त होकर वह स्वयं ही विराजमान है।

राजन्! संकल्प-नगररूप इस जगत्में जो असम्भव हो ऐसी कोई बात नहीं है। वह जगत् अपने संकल्प-कर्ता इस चिदात्मा परब्रह्मसे भिन्न नहीं है। इसलिये तुम सम्पूर्ण जगत्को ब्रह्म ही समझो।

(सर्ग २०७-२०९)

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