भारतकोश
संक्षिप्त योगवासिष्ठ

संक्षिप्त योगवासिष्ठ

Sankshipt Yoga Vasistha

महर्षि वाल्मीकि द्वारा

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निर्वाण-प्रकरण उ० ] * यह जगत् ब्रह्मका संकल्प होनेसे ब्रह्म ही है, इसका विवेचन * ६८९


घिरा हुआ है, वह कुशद्वीप इसी भूतलपर स्थित सात महाद्वीपोंमेंसे एक है। वह भूमण्डलको कंगनके आकारमें घेरकर बसा हुआ है। वहाँ पूर्वोत्तर दिशामें इलावती नामसे प्रसिद्ध एक सुवर्णमयी-सी नगरी है। उस नगरीके पूर्वभागमें एक राजा थे, जिनका नाम प्रज्ञप्ति था। जगत्‌के सारे प्राणी उनमें अनुरक्त थे। वे इस सृष्टिमें दूसरे इन्द्रके समान प्रतिष्ठित थे। एक समय किसी कारणवश मैं प्रलयकालमें आकाशसे गिरे हुए सूर्यकी भाँति उस राजाके समीप जा पहुँचा। उसने पुष्प, अर्घ्य और आचमनीय आदिके द्वारा मेरी पूजा की और पास बैठकर मुझसे बहुत से प्रश्न किये।

( सर्ग २०४-२०६ )


यह जगत् ब्रह्मका संकल्प होनेसे ब्रह्म ही है, इसका विवेचन

राजाके प्रश्नोंके उत्तरमें मैंने कहा—राजन् ! मैं तुमसे स्पष्ट शब्दोंमें तत्त्वज्ञानकी बात बता रहा हूँ, जिससे तुम्हारे सारे संदेह पूर्णतः निर्मूल हो जायेंगे। पहले यह समझ लो कि जगत्‌के सारे पदार्थ सदा ही असत् हैं और सदा ही ये सत् भी हैं; क्योंकि इनकी स्थिति कल्पनाके अनुसार है। जहाँ अमुक वस्तु इस रूपमें ही है, ऐसी निश्चित बुद्धि होती है, वहाँ वह पदार्थ वैसा ही होता है, फिर वह सत् हो या असत्। इस विषयमें आग्रह नहीं है। जैसे स्वप्नमें स्वप्नद्रष्टा चिदात्मा ही स्वप्नगत जगत्‌के आकारमें भासित होता है, उसी प्रकार सृष्टिके आरम्भमें समस्त कारणोंका अभाव होनेसे चिदाकाश ही इस जाग्रत् जगत्‌के आकारमें भासित होता है। इसलिये इस जाग्रत्कालिक जगत्में स्वप्नजगत्‌से भिन्नता क्या है ? इस प्रकार विशुद्ध ज्ञानस्वरूप ब्रह्म ही इस जगत्‌के रूपमें भासित होता है, इसलिये इस जगत्‌में ब्रह्मसे भिन्नता क्या रही ? इस प्रकार निर्विकार परब्रह्म परमात्माकी ही जगत्‌के रूपमें स्थिति होनेके कारण जगत् विशुद्ध ब्रह्म ही है। लोक, वेद और महान् शास्त्रोंद्वारा पूर्वापर विचार करके मैंने यही अनुभव किया है और इस अनुभूति—ज्ञानको ही यहाँ प्रकट किया है। समस्त भूतोंमें नित्य चिदात्मा ही सत्तारूपसे सर्वत्र परिपूर्ण है—इस बातको महात्मा पुरुषोंने भी बारम्बार कहा है; तथापि जगत्की नित्य चैतन्यरूपताका अपलाप ( निराकरण ) करके जो मूढ़ मनुष्य अन्धकारपूर्ण कूपमें रहनेवाले मेढकोंके समान व्यर्थ ही टर्र-टर्र करते हैं; आपाततः वर्तमान नाम-रूपके अनुभवको ही प्रमाण मानकर यह कहते हैं कि संवित् या चेतनता कोई नित्यवस्तु नहीं है। वह शरीरसे ही प्रकट होती है; इसलिये शरीर ही उसका कारण है। दूसरे शब्दोंमें उनका कहना है कि जड़से ही चैतन्यकी अभिव्यक्ति हुई है। ऐसी भ्रान्त धारणासे जो लोग मोहमें पड़े हुए हैं, वे उन्मत्त हैं—पागल हैं और मूर्ख हैं। ऐसे लोग हमलोगोंकी ज्ञानचर्चामें भाग लेने योग्य नहीं हैं। जिनका मस्तिष्क ठीक है, उनमें और पागलोंमें क्या बातचीत हो सकती है! वैसे ही मूर्खों और तत्त्वज्ञानियोंमें संलाप होना कैसे सम्भव है! जिस विद्वत्कथासे सारे संदेहोंका निवारण न हो जाय, वह तीनों लोकोंमें कहीं भी क्यों न हुई हो, उसे मूर्ख-कथा ही समझना चाहिये।

राजन् ! प्रजाजनोंको अपने घरमें रहते हुए भी सम्बन्धशून्य, आकाररहित और दूर देशमें घटित वृत्तान्तोंद्वारा जिस प्रकार शुभाशुभ फलकी प्राप्ति होती है, उसे बताता हूँ, सुनो—ब्रह्म ही अज्ञानवश दृश्य समझ लिया गया है, इसलिये दृश्यके रूपमें प्रतीत होता है और जब उसकी ब्रह्मस्वरूपताका बोध हो जाता है, तब यह सम्पूर्ण दृश्य ब्रह्म ही है, ऐसा अनुभव होने लगता है। इसलिये यह जगत् ब्रह्मसंकल्पनगरके रूपमें स्थित है। संकल्पनगरमें जब जिस-जिस वस्तुके विषयमें जैसा संकल्प किया जाता है, वह-वह वस्तु उस समय वैसी ही आकृति धारणकरके अनुभव-में आने लगती है। जैसे तुम्हारे इस संकल्पगृहमें जो