भारतकोश
संक्षिप्त योगवासिष्ठ

संक्षिप्त योगवासिष्ठ

Sankshipt Yoga Vasistha

महर्षि वाल्मीकि द्वारा

DevanagariHindipublished750 पृष्ठ

पृष्ठ 737, कुल 750 में से

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६८८ * अविच्छिन्नचिदात्मैकः पुमानस्तीह नेतरत् * [ संक्षिप्त योगवासिष्ठ

कहने योग्य बात थी, आपने कह दी और मैंने ज्ञेय तत्त्वको भलीभाँति जान लिया। अब कृतकृत्यताको प्राप्त हुई आपकी यह वाणी विश्राम करे।
(सर्ग-२०३)


श्रीवसिष्ठ और श्रीरामका संवाद, दृश्यका परिमार्जन, सबकी चिदाकाशरूपताका प्रतिपादन, श्रीरामका प्रश्न और उसके उत्तरमें श्रीवसिष्ठद्वारा प्रज्ञप्तिके उपाख्यानका आरम्भ

श्रीवसिष्ठजी बोले—महाबाहो ! तुम फिर मेरी उत्तम बात सुनो; क्योंकि जैसे दर्पण बारंबार पोंछने या परिमार्जित करनेपर अधिक स्वच्छ एवं शोभित होता है, उसी प्रकार बारंबार चर्चा होनेसे भ्रमका निवारण होता है। जिससे बोध शुद्ध होकर निखर उठता है। रूप और नाम—दो ही प्रकारके दृश्य हैं। इनमें पहला अर्थ है और दूसरा शब्द—दोनों ही भ्रम हैं और इनका मार्जन आवश्यक है। अर्थ क्या है ? भ्रमको समझनेका एक संकेत। अर्थकी कोई वास्तविक सत्ता नहीं है। एक वस्तुको समझनेके लिये अनेक शब्द प्रयुक्त होते हैं, उन सबके अर्थ पृथक्-पृथक् होनेपर भी उनसे अनेक वस्तुओंकी उपलब्धि नहीं होती। इस तरह अर्थ-भ्रमका परिमार्जन हुआ। अर्थके बिना शब्द जलके कलकल नादकी भाँति निरर्थक है, अतः वह शब्दताको छोड़कर अर्थरूपताको प्राप्त होता है; इस तरह अर्थभ्रमके मार्जनके साथ उस शब्द-भ्रमका मार्जन भी हो जाता है। वास्तवमें यह दृश्य स्वप्नकी भाँति चेतनका संकल्पमात्र है। जगत्की उत्पत्ति कब और कहाँ हुई है ? जब जाग्रत् ही मिथ्या है, तब स्वप्नकी क्या बात है ! क्योंकि जाग्रत् ही संस्कारद्वारा स्वप्नदृष्ट पदार्थ बनकर स्मरणके समान अपने अर्थभूत वस्तुसे शून्य होकर सामने आता है। इसलिये वह चेतनका संकल्पमात्र होकर दूसरे आकारमें विस्तारको प्राप्त हुआ है। जैसे मुझमें स्वप्न-जगतरूप निर्मल चिदाकाश रूपवान् होता हुआ भी रूपरहित है, उसी प्रकार यह त्रिभुवन भी साकार दीखता हुआ भी निराकार ही है।

श्रीरामने कहा—ब्रह्मन् ! इस प्रकार विचार करनेसे न तो कुछ उत्पन्न हुआ है और न कुछ नष्ट ही हुआ है। यह जगत् जैसेका तैसा चिन्मय ब्रह्म है और अपने आपमें ही स्थित है। जैसे द्रव ही जल है, उसी तरह चेतनमें स्फुरण नामक जो स्वरूपका विस्तार है, वही यह जगत् कहा गया है। सम्यग्दर्शनसे जिसकी बुद्धि प्रबुद्ध हो गयी है, उसकी दृष्टिमें यह जो जगत्का भान है, वह अभानरूप ही है। वास्तवमें सब कुछ शून्य चिदाकाश ही है और वही परमार्थ है। अज्ञानीकी बुद्धिमें यह जगत् जैसा भी प्रतीत होता हो, होता रहे, उसपर हमें विचार करनेकी आवश्यकता नहीं है।

श्रीवसिष्ठजी बोले—रघुनन्दन ! तुमने इस विषयको जैसा समझा है और आगमोंने भी जैसा इसका वर्णन किया है, वह सब ज्यों-का-त्यों ठीक है। अब बताओ, हम यहाँ और क्या वर्णन करें ?

श्रीरामने पूछा—ब्रह्मन् ! बताइये, यह चिन्मय महाकाश ब्रह्माण्डके रूपमें कैसे परिणत हो गया ? इस ब्रह्माण्डकी विशालता कितनी है और यह कबतक रहेगा ?

श्रीवसिष्ठजी कहते हैं—निष्पाप रघुनन्दन ! जिसका बिना किसी कारणके भान होता है, उसका वह भान कुछ भी नहीं है। वास्तवमें परमार्थस्वरूप ब्रह्म ही उस रूपमें दीखता हुआ अपने परमार्थस्वरूपसे ही स्थित है। महामते ! इस विषयमें कभी किसीने अपने उत्तम बोधकी पुष्टिके लिये मुझसे एक महान् प्रश्न किया था। तुम उस उत्कृष्ट एवं महान् प्रश्नको सुनो। त्रिलोकीमें जिसकी बड़ी ख्याति है और जो दोनों ओरसे दो समुद्रोंद्वारा

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