भारतकोश
संक्षिप्त योगवासिष्ठ

संक्षिप्त योगवासिष्ठ

Sankshipt Yoga Vasistha

महर्षि वाल्मीकि द्वारा

DevanagariHindipublished750 पृष्ठ

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निर्वाण-प्रकरण उ० ] * मध्याह्नकालमें राजासे सम्मानित हो सबका आवश्यक कृत्यके लिये उठ जाना * ६८७


उद्दाम वायुसे पूरित हो प्रलयकालकी प्रचण्ड वायुसे व्याप्त हुए महासागरोंके समान गम्भीर घोष करते हुए बज उठे। उस समय निदाघकी ज्वालाको शान्त करनेके लिये सौभाग्यवती स्त्रियोंद्वारा छिड़के गये कर्पूरमिश्रित जलसे वहाँ नूतन जलदमाला-सी छा गयी। फिर महाराज दशरथ समस्त सामन्तों, भूपालों, परिजनों एवं अङ्गरक्षक सेवकों आदिके साथ सभासे उठे। मुनिवर वसिष्ठ, श्रीराम तथा संसद्के अन्य सदस्य भी उठ गये। राजा, राजकुमार, मन्त्री और मुनि परस्पर एक-दूसरेसे सम्मानित हो बड़ी प्रसन्नताके साथ अपने-अपने निवासस्थानको गये। तत्पश्चात् जब मध्याह्नकालके वाद्योंकी ध्वनि दीवालोंसे टकराकर प्रति-ध्वनित हुई, तब वाक्यप्रयोगमें निपुण मुनिवर वसिष्ठने यह बात कही—'रघुनन्दन ! तुमने सुननेयोग्य सब बातें सुन लीं, ज्ञेय तत्त्वोपदेशको पूर्णरूपसे जान लिया। अब तुम्हारे लिये दूसरी कोई जाननेयोग्य उत्तम बात शेष नहीं है। जैसा मैंने तुम्हें उपदेश दिया है, जैसा तुम शास्त्रोंसे देखते हो और जैसा स्वयं अनुभव करते हो, उन सबकी एकवाक्यता कर लो। महामते ! अब समयोचित कार्य करनेके लिये उठो। हमलोग भी स्नान करनेके लिये जा रहे हैं। यह हमारे मध्याह्न-कालिक उपासनाका समय व्यतीत हो रहा है। भद्र ! यदि तुम्हें कोई और शुभ प्रश्न पूछना हो तो उसे कल प्रातःकाल पुनः पूछ लेना।'

मुनिनाथ वसिष्ठके ऐसा कहनेपर धर्मात्मा राजा दशरथने उस सभामें आये हुए समस्त साधुपुरुषों, मुनियों, ब्राह्मणों, राजाओं तथा आकाशचारी देवताओंका भी वसिष्ठ आदिकी बतायी हुई विधिसे श्रीरामके साथ पूजन किया। मणियों और मुक्ताओंकी राशियाँ भेंट कीं, दिव्य पुष्प अर्पण किये, नाना प्रकारके रत्न प्रदान किये, मोतियोंके हार समर्पित किये, प्रेमपूर्वक प्रणाम किया, धन दिया, वस्त्र, आसन, अन्नपान, सुवर्ण, भूमि, धूप, गन्ध और पुष्पमालाएँ प्रदान कीं। इस प्रकार उन प्रशंसनीय भूपालने शास्त्रोक्त रीतिसे उन सभीका पूजन किया। तदनन्तर दूसरोंको मान देनेवाले वे नरेश वसिष्ठ आदि देवर्षियों तथा सभासदोंके साथ उस सभासे उसी प्रकार उठे, जैसे सायंकाल चन्द्रमा आकाशसे उदित होते हैं। मधुर वाणी बोलनेवाले वे दशरथ आदि सब राजा और साधु-मुनि एक दूसरेसे सम्मानित हो परस्पर विदा ले स्नेहयुक्त संतुष्ट हृदयसे अपने-अपने आश्रमोंको गये, मानो सातो लोकोंके निवासी देवता इन्द्रपुरीसे अपने-अपने धाममें जा रहे हों। एक दूसरेका क्रमशः प्रेमपूर्वक समादर करके सब विदा ले अपने-अपने घरमें आये और दिनके आवश्यक कार्यमें लग गये। वसिष्ठ आदि समस्त मुनियों तथा दशरथ आदि राजाओंने दिनके आवश्यक कार्य पूर्ण किये। जब वे सब लोग न्यायसे प्राप्त दैनिक कार्य सम्पन्न कर चुके, तब आकाशपथिक सूर्यदेव क्रमशः आगे बढ़ते हुए अस्ताचलको जा पहुँचे। महामति श्रीराम तथा अन्य लोग रातमें भी वैसी ही ज्ञान-चर्चा करते रहे; इसलिये उनकी वह रात शीघ्र ही व्यतीत हो गयी। फिर अन्धकाररूपी धूल और तारारूपी पुष्पराशियोंके कूड़े-करकटको हटाकर जगत्-रूपी भवनको घरकी तरह साफ-सुथरा बनाते हुए सूर्यदेवका शुभागमन हुआ। तत्पश्चात् राजा, राजकुमार, मन्त्री और वसिष्ठ आदि मुनि फिर राजा दशरथकी सभामें आये, उस समय जब दशरथ आदि नरेश और सुमन्त्र आदि सचिव आसनपर विराजमान मुनिवर वसिष्ठकी भूरि-भूरि प्रशंसा कर रहे थे, कमलनयन बुद्धिमान् श्रीराम गुरु और पिताके सामने उपस्थित हो कोमल वाणीमें इस प्रकार बोले—

श्रीरामने कहा—ब्रह्मन् ! आप जैसा कहते हैं, वैसा ही मैं भी मानता हूँ कि मेरी बुद्धि कृतकृत्य हो रही है। मैं परम निर्वाणस्वरूप एवं शान्त हूँ। मुझे किसी बातकी आकाङ्क्षा नहीं है। जो कुछ