संक्षिप्त योगवासिष्ठ
Sankshipt Yoga Vasistha
महर्षि वाल्मीकि द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें६८६ * अविच्छिन्नचिदात्मैकः पुमानस्तीह नेतरत् * [ संक्षिप्त योगवासिष्ठ
श्रीरामने कहा—प्रभो ! मैं आपके कृपाप्रसादसे परम निर्मल हूँ। मुने ! मैं अपने-आपमें ही विश्राम-सुखका अनुभव करता हूँ। बाह्य इन्द्रियोंकी दृष्टिसे परे हूँ। मनकी भी मुझतक पहुँच होनी कठिन है। मैं सर्वथा निर्विकार हूँ। जैसे आकाशको मुट्ठियोंसे नहीं बाँधा जा सकता, उसी प्रकार आशाएँ मुझे बाँध नहीं सकती हैं। जैसे सुगन्ध वृक्षगत पुष्पसे ऊपर उठकर आकाशमें पहुँचकर उस पुष्पसे परे हो जाती है, उसी प्रकार मैं देहातीत और सर्वत्र समभावसे स्थित हूँ। जैसे अप्रबुद्ध और प्रबुद्ध सभी राजा बहुत काम-धन्धेवाले राज्योंमें सुखपूर्वक विचरते हैं, उसी प्रकार मैं हर्ष, विषाद और आशासे रहित, स्थिर, एक तथा समतापूर्ण दृष्टिसे सम्पन्न एवं आत्मनिष्ठ होनेके कारण सर्वत्र निःशङ्क होकर विचरता हूँ। प्रभो ! मैं सर्वोपरि सच्चिदानन्दस्वरूप हूँ। मुझमें विषयसुखकी बिल्कुल इच्छा नहीं है। मुझे अपनी इच्छाके अनुसार आज्ञा-पालनके कार्यमें नियुक्त कीजिये।
श्रीवसिष्ठजीने कहा—रघुनन्दन ! जैसे आकाश शान्त आकाशमें विश्राम प्राप्त करता है, उसी प्रकार तुम्हें अत्यन्त सम एवं शीतल आत्मामें पूर्ण विश्राम प्राप्त है। वत्स ! बड़े सौभाग्यकी बात है कि ज्ञानस्वरूप तुमने अपने बोधके द्वारा रघुकुलकी भूत, भविष्य और वर्तमान परम्पराको पवित्र कर दिया है। राघवेन्द्र ! अब तुम मुनीश्वर विश्वामित्रजीकी याचना पूर्ण करके पिताके साथ इस पृथ्वीका पालन करते हुए सुखसे रहो। सौभाग्यशाली राजकुमार ! तुम-जैसे महापुरुषके साथ रहकर पुत्र, भृत्य, बन्धु-बान्धव, पैदल, रथ, हाथी और अश्वमण्डलसहित समस्त रघुवंशी शरीरसे नीरोग, मनसे निर्भय तथा घरोंमें सुस्थिर लक्ष्मीसे सम्पन्न हो सदा अभ्युदयशाली बने रहें।
श्रीवाल्मीकिजी कहते हैं—सभामें वसिष्ठजीकी यह बात सुनकर सब राजा तथा अन्य लोग अमृतकी धारासे सींचे हुएकी भाँति मनमें अत्यन्त शीतलता एवं शान्तिका अनुभव करने लगे। कमलनयन श्रीराम अपने मनोहर मुखचन्द्रसे उसी प्रकार सुशोभित हो रहे थे, जैसे सुधा-भरे चारु चन्द्रमाके उदयसे सम्पूर्ण क्षीरसागर उल्लसित हो उठता है। तत्त्वज्ञानविशारद वामदेव आदि मुनि बड़े आदरसे बोले—'अहो ! भगवान् वसिष्ठने अद्भुत ज्ञानका वर्णन किया'। शान्त अन्तःकरणवाले राजा दशरथ भी प्रसन्नतासे प्रकाशित हो रहे थे। उनके सारे अङ्ग संतोषसे ही हृष्ट-पुष्ट हो गये थे। उनपर ज्ञानकी नयी दीप्ति छा रही थी।
तत्पश्चात् श्रीराम बोले—मुने ! मैं ऐसे परमानन्दमें सदा निमग्न हूँ, जिसके प्राप्त होनेपर फिर किसीको कभी खेद नहीं हो सकता। मैं चिरसुखी हूँ। सदा उदित हूँ एवं सनातन पुरुषार्थस्वरूप हूँ।
(सर्ग २०१-२०२)
मध्याह्नकालमें राजासे सम्मानित हो सबका आवश्यक कृत्यके लिये उठ जाना और दूसरे दिन प्रातःकाल सबके सभामें आनेपर श्रीरामका गुरुके समक्ष अपनी कृतकृत्यता प्रकट करना
श्रीवाल्मीकिजी कहते हैं—भरद्वाज ! जब इस प्रकार मुनिवर वसिष्ठ तथा श्रीरामचन्द्रजी परस्पर विचार कर रहे थे, उस समय मानो उन दोनोंका संवाद सुननेके लिये भगवान् भास्कर आकाशके मध्यभागमें आ पहुँचे। तुरत ही सम्पूर्ण दिशाओंमें पदार्थसमूहोंको प्रकाशित करनेके लिये श्रीरामकी महामतिके समान धूप तेज हो गयी। कमलोंसे भरे हुए सरोवर उस सभामें बैठे हुए हृदयकमलके खिल जानेसे विकसित आकारसे सुशोभित राजाओंके समान बड़ी शोभा पाने लगे। इतनेहीमें मध्याह्नकालकी सूचना देनेवाले शङ्ख, मुखोंकी स्निग्ध