संक्षिप्त योगवासिष्ठ
Sankshipt Yoga Vasistha
महर्षि वाल्मीकि द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें६९४ * अविच्छिन्नचिदात्मकः पुमानस्तीह नेतरत् * [संक्षिप्त योगवासिष्ठ
स्फूर्ति होनेपर उसमें सबसे पहले आकाशसत्ताका अध्यास होता है; फिर दिक्-सत्ता, कालसत्ता और भेद सत्ताका उदय (अध्यास) होता है। जब आत्माको देह आदिमें अहं का भान होता है, तब देहसे भिन्न स्थलमें 'यहाँ मैं नहीं हूँ' इसका भी अवश्य भान होता है। यह देशकृत परिच्छेद कहलाता है। इस रीतिसे आत्मा ही नाना प्रकारका कालकृत और वस्तुक्रुत परिच्छेद स्वीकार करके बिना क्रमके ही द्वैतरूप होकर आकाशमें उदित होता है। फिर इन पूर्वोक्त आकाशात्मक पदार्थभेद-सत्ताओंके नामकरणकी बुद्धि उत्पन्न होती है, जिससे जाति, गुण और क्रिया आदिकी दृष्टिसे इनमें परस्पर भेद किया जा सके। परंतु वास्तवमें वह सब चिदाकाश ही है। इस प्रकार निराकार परमपदमें अहंभावसे देश, काल आदिकी कल्पनाओंके सिद्ध होनेपर अर्थात् उस परब्रह्म परमात्माके देश-कालादि-रूपसे स्थित होनेपर जो यह दृश्य नामक आभासरूप वस्तुकी प्रतीति होती है, वह सब निर्वाध ब्रह्म ही है, जो ब्रह्मसे भिन्न-सा प्रतीत होता है।
रघुनन्दन ! तुम तो समस्त दृश्य पदार्थोंसे मुक्त, सब ओर प्रकाशमान, सर्वस्वरूप, निर्मलस्वभाव, आत्मनिष्ठ, निरतिशय आनन्दमय, परमशान्तचित्त, आकाशके समान मनोहर एव तृणारहित हो। अब तुम धर्मके अनुसार राज्यका पालन करो।
(सर्ग २११-२१३)
सभासदोंका कृतार्थता-प्रकाशन तथा वसिष्ठजीकी आज्ञासे महाराज दशरथका ब्राह्मणोंको भोजन कराना और सात दिनोंतक दान-मानसे सम्पन्न उत्सव मनाना
श्रीवाल्मीकिजी कहते हैं—भरद्वाज ! महामुनि वसिष्ठजी जब इतना कह चुके, तब तत्काल ही आकाशसे वर्षा करनेके लिये जलसे भरे हुए मेघके समान गम्भीर घोषके साथ देवताओंकी दुन्दुभियाँ बज उठीं। भूतलपर हिमकी वर्षाके समान दिव्य पुष्पोंकी वृष्टि होने लगी, जिसने समस्त दिग्वधुओंके मुख उज्ज्वल कान्तिसे सुशोभित कर दिये। उस सभामें यथास्थान नीचे बैठे हुए समस्त सभासदोंने वे दिव्य पुष्प लेकर वसिष्ठजीके चरणोंमें पुष्पाञ्जलि अर्पित की और सबने सब प्रकारसे दुःख-शोकको त्याग दिया।
तत्पश्चात् राजा दशरथ बोले—भगवन् ! आपके उपदेशसे हमारी आत्मा परमपदमें सुखपूर्वक प्रवेश पानेके योग्य हो गयी है। हम संसाररूपी अत्यन्त विस्तृत एवं दुर्गम मार्गपर चिरकालसे चलते रहनेके कारण थक गये थे। परंतु आज आपकी उपदेश-वाणीसे शुद्ध हो उस परमपदमें उसी तरह विश्रामका सुख उठा रहे हैं, जैसे शरत्कालके उज्ज्वल मेघ हिमालय आदि पर्वतपर विश्राम करते हैं। पुरुषार्थकी सिद्धिके लिये अवश्य करने योग्य कर्मोंकी अवधि आज पूरी हो गयी—हमलोग कृतकृत्य हो गये। हमने आपत्तियोंकी चरम सीमा देख ली—अब इनसे पिण्ड छूट गया; क्योंकि हमें ज्ञेय-तत्त्वका सम्पूर्ण रूपसे ज्ञान हो गया और हम परमपदमें विश्राम पा रहे हैं।
श्रीरामजी बोले—मुनीश्वर ! आपकी वाणी सुनकर इतना सुख मिल रहा था, मानो अमृतका अभिषेक प्राप्त हो रहा हो। उसे बारंबार याद करके मैं परम पूजित और शान्त होनेपर भी रह-रहकर हर्षित-सा हो उठता हूँ। अब मुझे न तो कोई कर्मसे प्रयोजन है और न उसे न करने (छोड़ने) से ही। मैं जैसे हूँ, उसी तरह निश्चिन्त हूँ। आपके उस उपदेश-वचनसे विश्राम-सुखका जैसा उपाय प्राप्त हुआ है, वैसा दूसरा कौन होगा, दूसरी दृष्टि भी कैसी होगी? अहो ! हमें विश्रामसुखकी असीम विस्तार-वाली भूमि प्राप्त हो गयी है। आपकी कृपाके बिना मनुष्य इस