संक्षिप्त योगवासिष्ठ
Sankshipt Yoga Vasistha
महर्षि वाल्मीकि द्वारा
पृष्ठ 744, कुल 750 में से
संदर्भ में पढ़ेंनिर्वाण-प्रकरण उ० ] * सभासदों का कृतार्थता-प्रकाशन तथा दशरथका दान-मानसे सम्पन्न उत्सव मनाना * ६९५
ज्ञान-दृष्टिको कैसे जान सकता है ? भला, पुल या जहाजके बिना बालक समुद्रको कैसे पार कर सकता है ?
लक्ष्मणजी बोले—आज मुनिवर वसिष्ठजीकी वाणीसे जो बोध प्राप्त हुआ है, वह अनन्त जन्म-जन्मान्तरोंसे बढ़ी हुई दुर्वासनाओंके कारण उत्पन्न होनेवाले संशयोंका नाशक है तथा जन्म-जन्मान्तरोंसे संचित किये गये सैकड़ों पुण्योंके उत्तम फलको प्रकट करनेवाला है। इस बोधसे विचारके लिये उद्यत हुए मेरे मनमें आज पूर्ण चन्द्रमाके समान आह्लाद प्रदान करनेवाला परमात्मप्रकाश उदित हो गया है। ऐसी निरतिशयानन्द प्रकाशरूप आत्मदृष्टिके प्रत्यक्ष दिखायी देनेपर भी लोग अपने दुर्भाग्यके कारण सैकड़ों दोषपूर्ण दशाओं द्वारा दुःखी आगसे सूखे काठकी भाँति जलाये जा रहे हैं। यह महान् आश्चर्य है।
श्रीविश्वामित्रजीने कहा—अहो ! हमारे लिये बड़े हर्षकी बात है कि वसिष्ठ मुनिके मुखसे हमें यह परम पवित्र महान् ज्ञान सुननेको मिला, जिससे हमलोग सहस्रों वार गङ्गामें स्नान किये हुएके समान अत्यन्त पवित्र होकर बैठे हैं।
नारदजीने कहा—मैंने ब्रह्मलोकमें, स्वर्गमें और भूतलपर भी आजसे पहले जिसे नहीं सुना था, उस परम तत्त्वज्ञानको सुनकर मेरे दोनों कान पवित्र हो गये।
शत्रुघ्नने कहा—भगवन् ! आपके उपदेशसे मैं परमानन्दमें निमग्न हूँ। शान्त हूँ। परमपदको प्राप्त हो गया हूँ और सदाके लिये परिपूर्ण हूँ। केवल सुखस्वरूपसे स्थित हो गया हूँ।
राजा दशरथ बोले—हमारे अनेक जन्मोंके संचित पुण्यसे ही इन धीर मुनीश्वरने हमको उस परम उत्तम ज्ञानका उपदेश दिया, जिससे हम सभी परम पवित्र हो गये।
श्रीवाल्मीकिजी कहते हैं—भरद्वाज ! जब राजाके साथ समस्त सभासद् वहाँ इस तरहकी बातें कह रहे थे, उस समय महर्षि वसिष्ठ ज्ञानसे पवित्र हुई वाणीद्वारा यों बोले—'राजन् ! रघुकुलचन्द्र ! अब मैं जो कहता हूँ, उसे करो। इतिहास-कथा सुननेके पश्चात् ब्राह्मणोंकी पूजा करनी चाहिये। इसलिये आज इन ब्राह्मणसमूहोंको सब प्रकारकी मनोवाञ्छित वस्तुएँ देकर इनकी अभिलाषा पूर्ण करो। इससे तुम्हें वेदार्थतुल्य इस महारामायणके श्रवणका पूरा-पूरा तथा अक्षय फल प्राप्त होगा। मोक्षकी उपायभूत कथा-वस्तुकी समाप्ति होनेपर एक तुच्छ एवं दरिद्र मनुष्यको भी अपनी शक्तिके अनुसार ब्राह्मणका पूजन करना चाहिये। फिर आप-जैसे महाराजके लिये तो कहना ही क्या है ?
मुनिका यह वचन सुनकर राजा दशरथने सहस्रों वेद-वादी ब्राह्मणोंको दूत भेजकर बुलवाया। मथुरामें, सुराष्ट्र देशमें तथा गौड़ देशमें जो ब्राह्मण निवास करते थे, उनके कुलोंसे ब्राह्मणोंको बुलवाकर उन सबका पूजन किया। अधिक-से-अधिक ज्ञान-विज्ञानवाले ब्राह्मणोंको प्रधानता देते हुए भूपालने दस हजार ब्राह्मणोंको भोजन कराया और उन्हें उनकी रुचिके अनुसार भोजन करानेके पश्चात् दान-दक्षिणा भी दी। इस तरह ब्राह्मणोंका पूजन करके देवताओं, पितरों, राजाओं, पुरवासियों, मन्त्रियों, सेवकों, दीन-दुखियों तथा अन्धोंको भी भोजन एवं दान-मानसे संतुष्ट किया। इस प्रकार संसारकी सीमाके अन्तमें पहुँचे हुए राजा दशरथने उस दिन बड़ा भारी उत्सव किया। महाराज दशरथ अविनाशी परमपदको प्राप्त हो चुके थे। बोधरूपी सूर्यके उदयसे संसाररूपी रात्रिका अन्त हो गया था। इसलिये वे बड़े हर्षसे लगातार सात दिनोंतक महान् उत्सव मनाते रहे। जिसमें दान, भोजन तथा धन-वितरण-का कार्यक्रम निरन्तर चलता रहा।
(सर्ग २१४)