संक्षिप्त योगवासिष्ठ
Sankshipt Yoga Vasistha
महर्षि वाल्मीकि द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें६९६ * अविच्छिन्नचिदात्मैकः पुमानस्तीह नेतरत् * [ संक्षिप्त योगवासिष्ठ
श्रीवाल्मीकि-भरद्वाज-संवादका उपसंहार, इस ग्रन्थकी महिमा तथा श्रोताके लिये दान, मान आदिका उपदेश
श्रीवाल्मीकिजी कहते हैं—मेरे शिष्यशिरोमणि परमबुद्धिमान् भरद्वाज ! इसी प्रकार तुम भी इसी कमनीय तथा निर्मल ब्रह्मात्मदृष्टिका दृढ़तापूर्वक अवलम्बन करके वीतराग संदेहशून्य शान्तचित्त जीवन्मुक्त होकर सुखसे रहो । निष्पाप भरद्वाज ! इस ज्ञानका आश्रय ले तुम्हारी बुद्धि यदि आसक्तिशून्य रही तो घने मोहान्धकारमें पड़ने और मूढ़ होनेपर भी नष्ट नहीं होगी। बेटा भरद्वाज ! तुम्हारी बुद्धि तो स्वाभाविक ही आसक्तिके बन्धनसे मुक्त है । परंतु आज इस मोक्षसंहिताको सुनकर तुम वास्तवमें मुक्ततर हो गये—सर्वश्रेष्ठ जीवन्मुक्त हो गये । इन पवित्र तथा ब्रह्मका प्रत्यक्ष अनुभव प्रदान करनेवाले मोक्षोपायोंका यदि कोई बालक भी श्रवण कर ले तो वह तत्त्वज्ञानी हो सकता है । फिर तुम-जैसे महात्मा पुरुषके लिये तो कहना ही क्या है ? सत्पुरुषोंकी नीति (शिक्षा)से, उनकी उत्तम सेवासे, उनके सामने प्रश्न करनेसे तथा उनकी उदारतापूर्ण ज्ञानचर्चामें भाग लेनेसे प्रमादशून्य श्रेष्ठ-बुद्धिवाले अधिकारी पुरुष उसी प्रकार ज्ञेय आत्मतत्त्वको जान लेते हैं, जैसे श्रीवसिष्ठजीके सङ्गसे श्रीराम आदिने जाना था। तृणारूपी चर्ममयी रस्सीसे दृढ़तापूर्वक बँधी हुई अज्ञानीके हृदयमें जो देह और इन्द्रिय आदिके प्रति तादात्म्याध्यासरूप तथा पुत्र-कलत्रादिके प्रति ममतारूप ग्रन्थियाँ बद्धमूल हो गयी हैं, वे सब इस मोक्षशास्त्रकी कथाओंपर विचार करते रहनेसे सर्वथा खुलकर एकरसताको प्राप्त हो जाती हैं । बेटा ! दूसरी बहुत-सी बातें कहनेसे क्या लाभ ? इतना ही जान लो कि जो लोग इन महामहिमाशाली मोक्षोपायोंका ज्ञान प्राप्त करेंगे, वे तत्त्ववेत्ताओंमें श्रेष्ठतम होकर फिर कभी संसारबन्धनमें नहीं पड़ेंगे । जो सत्पुरुष इस ग्रन्थको बहुश्रुत विद्वान्के सामने स्वयं भलीभाँति विचारकर इसे पूर्णतः समझ लेनेके पश्चात् स्वयं भी सुननेकी इच्छावाले लोगोंको उपदेश देंगे, वे पुनर्जन्मको नहीं प्राप्त होंगे । उन्हें दूसरे वचनोंका आश्रय लेनेकी क्या आवश्यकता है ? जो अर्थानुसंधानकी अपेक्षा न रखकर केवल इसका पारायण करेंगे अथवा जो इस पुस्तकको लिखेंगे तथा जो उत्तम तीर्थक्षेत्रमें व्याख्यानकुशल श्रेष्ठ वक्ताको इसकी कथा कहनेके लिये नियुक्त करेंगे, वे यदि सकामभाववाले होंगे तो राजसूययज्ञके फलसे युक्त हो बारंबार स्वर्गलोकमें जायँगे और यदि निष्काम होकर उक्त कार्य करेंगे तो उत्तम कुलमें जन्म तथा सद्गुरुके मुखारविन्दसे सत्-शास्त्रके श्रवणका सुयोग पाकर तीसरे जन्ममें उसी तरह मोक्ष प्राप्त कर लेंगे, जैसे पुण्यवान् पुरुष धन-सम्पत्तिको पा लेते हैं । पूर्वकालमें अचिन्त्यरूपवाले ब्रह्माजीने मेरेद्वारा रचित इस ग्रन्थपर पूर्ण विचार करके यह बात कही थी कि 'इसमें सत्यस्वरूप ब्रह्मका निर्वचन होनेके कारण यह मोक्षमयी उत्तम संहिता है ।' उन महर्षिकी यह वाणी असत्य नहीं हो सकती । मोक्षोपाय नामक कथात्मक प्रबन्धरूप इस महारामायणकी कथा समाप्त होनेपर उत्तम बुद्धिवाले श्रोताको चाहिये कि वह वक्ताको प्रयत्नपूर्वक सुन्दर भवन देकर अभीष्ट अन्न-पानके दानसे ब्राह्मणोंका पूजन करे । इतना ही नहीं, उन सबको यथाशक्ति मनोवाञ्छित धनकी दक्षिणा आदि भी देनी चाहिये । भरद्वाज ! तुम्हें बोध प्रदान करनेके लिये मैंने सैकड़ों कथा-क्रमोंसे विशाल कलेवर हुए इस निर्मल दृष्टान्तों और युक्तियोंसे सम्पन्न तथा ब्रह्मतत्त्वकी विस्तृत व्याख्यासे युक्त 'महारामायण-शास्त्रको श्रवण कराया है। इसे सुनकर जीते-जी ही समस्त बन्धनोंसे मुक्त होकर ज्ञान, तपस्या और कर्मके फलसे युक्त अक्षय सम्पत्ति प्राप्त करके सदाके लिये पूर्ण परमानन्दमें निमग्न हो जाओ ।
( सर्ग २१५ )