भारतकोश
संक्षिप्त योगवासिष्ठ

संक्षिप्त योगवासिष्ठ

Sankshipt Yoga Vasistha

महर्षि वाल्मीकि द्वारा

DevanagariHindipublished750 पृष्ठ

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निर्वाण-प्रकरण उ० ] * अरिष्टनेमि, सुरुचि, कारुण्य तथा सुतीक्ष्णकी कृतकृत्यताका प्रकाशन * ६९७

अरिष्टनेमि, सुरुचि, कारुण्य तथा सुतीक्ष्णकी कृतकृत्यताका प्रकाशन, शिष्योंका गुरुजनोंके प्रति आत्मनिवेदन तथा ब्रह्मको एवं ब्रह्मभूत वसिष्ठजीको नमस्कार

श्रीवाल्मीकिजी कहते हैं—राजन् ! वसिष्ठजीका श्रीराम आदिके प्रति दिया हुआ यह सदुपदेश मैंने तुमसे कहा—इस ग्रन्थमें बताये हुए तत्त्वमार्गसे चलकर तुम निश्चय ही उस परम पदको प्राप्त कर लोगे ।

राजा अरिष्टनेमिने कहा—भगवन् ! आपकी यह दृष्टि संसार-बन्धनका विनाश करनेवाली है, जिसके पड़ते ही मैं संसार-सागरसे पार हो गया ।

देवदूत बोला—देवाङ्गने ! ऐसा कहकर आश्चर्यसे चकित नेत्रवाले राजा अरिष्टनेमि मुझसे स्नेहयुक्त मधुर वाणीमें बोले—

‘देवदूत ! आपको नमस्कार है । प्रभो ! आपका भला हो । सत्पुरुषोंकी मैत्री सात पग साथ चलनेसे ही हो जाती है, ऐसा कहा गया है । उसे आपने सत्य कर दिखाया । अब आप देवराजके भवनको लौट जाइये । आपका कल्याण हो । मैं इस मोक्षशास्त्रकी कथाके श्रवणसे परम संतुष्ट एवं आनन्दमग्न हो गया हूँ । मैंने जो कुछ सुना है उसका चिन्तन करता हुआ अब यहीं रहूँगा । मेरी सारी चिन्ता दूर हो चुकी है ।’

भद्रे ! राजा अरिष्टनेमिके ऐसा कहनेपर मुझे बड़ा आश्चर्य हुआ । जिसे मैंने पहले कभी नहीं सुना था, वह ज्ञानका सारभूत तत्त्व मुझे सुननेको मिला है । उसीसे मेरा अन्तःकरण इस समय अत्यन्त आनन्दमग्न हो गया है । अमृत पीकर छके हुए पुरुषकी भाँति मैं पूर्णतः तृप्तिका अनुभव कर रहा हूँ । तदनन्तर वाल्मीकिजीसे विदा ले मैं यहाँ तुम्हारे निकट मानो तुम्हें उपदेश देनेके लिये ही चला आया था । निष्पाप देवाङ्गने ! तुमने जो कुछ पूछा था, वह सब मैंने तुम्हें कह सुनाया । अब मैं यहाँसे इन्द्रभवनको जाऊँगा ।

अप्सरा बोली—महाभाग देवदूत ! आपको नमस्कार है । आपने मुझे जो तत्त्वज्ञान सुनाया है, उससे मुझे बड़ा संतोष प्राप्त हुआ । मैं कृतार्थ हो गयी । मेरा सारा शोक जाता रहा । अब मैं सदा निश्चिन्त रहूँगी । आपका कल्याण हो । आप अपनी इच्छाके अनुसार देवराज इन्द्रके समीप जाइये ।

अग्निवेश्यने कहा—वत्स कारुण्य ! तदनन्तर वह सुरुचि नामवाली श्रेष्ठ अप्सरा गन्धमादनके समीपवर्ती हिमालयके शिखरपर बैठकर देवदूतके मुखसे सुने हुए उसी तत्त्वज्ञानका चिन्तन करने लगी । बेटा ! क्या तुमने वसिष्ठजीका उपदेशरूप यह महारामायण शास्त्र सुना ? (मोक्षका साधन कर्म है या कर्मत्याग, ऐसा जो तुम्हारा संदेह था, क्या वह दूर हो गया ?) उस समस्त उपदेशपर पूर्णतः विचार और निश्चय करके तुम जैसा चाहो, वैसा करो ।

कारुण्य बोला—भगवन् ! इस समय तत्त्वज्ञान होनेसे मेरी स्मृति, वाणी और दृष्टि-सत्ता सभी निर्विषय हो गये हैं । तात्पर्य यह कि अब मेरे लिये इस लोकमें न तो कुछ स्मरणीय रहा, न वर्णनीय रहा और न दर्शनीय ही रह गया । ठीक वैसे ही, जैसे खम और वन्ध्यापुत्रके विषयमें स्मृति, वाणी और दृष्टिके लिये कोई आधार नहीं रह जाता है । मेरे लिये सारी सांसारिक स्थिति वैसी ही हो गयी है, जैसी निर्जल मरुप्रदेशमें मरीचिकाकी । अर्थात् जैसे मृगतृष्णाका जल मिथ्या है, उसी तरह यह दृश्यप्रपञ्च भी मेरे लिये असत् हो गया है । अब मुझे न कर्म करनेसे कोई प्रयोजन है और न कर्म न करनेसे ही कोई प्रयोजन है; क्योंकि मैं कृतार्थ हो गया, तथापि लोक-संग्रहके लिये न्यायतः प्राप्त कर्म करता रहूँगा । हठद कर्म छोड़ देनेके लिये भी क्या आग्रह है ।