संक्षिप्त योगवासिष्ठ
Sankshipt Yoga Vasistha
महर्षि वाल्मीकि द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें६९८ * अविच्छिन्नचिदात्मैकः पुमानस्तीह नेतरत् * [ संक्षिप्त योगवासिष्ठ
अगस्ति बोले—सुतीक्ष्ण ! ऐसा कहकर अग्निवेश्यका विद्वान् पुत्र कारुण्य, जो कृतकृत्य हो चुका था, वर्ण और आश्रमके अनुसार प्राप्त हुए कर्मका समय-समयपर यथोचित रीतिसे अनुष्ठान करने लगा। अतः सुतीक्ष्ण ! मोक्षका साधन ज्ञान है या कर्म—ऐसा संशय नहीं करना चाहिये। संशय करनेसे जीव परम पुरुषार्थरूपी स्वार्थसे भ्रष्ट हो जाता है। संशयात्माका विनाश हो जाता है।
अगस्तिमुनिका यह वचन अनेक अर्थोंमें एकताका बोध करानेवाला था। इसे सुनकर सुतीक्ष्णने गुरुदेवको प्रणाम किया और उनके निकट विनयपूर्वक कहा।
सुतीक्ष्ण बोले—भगवन् ! आपकी कृपासे मेरा अज्ञान और उसका कार्यरूप जगत् नष्ट हो गया। मुझे सर्वोत्तम ब्रह्मज्ञानकी प्राप्ति हो गयी। जैसे दीपक रहनेपर उसके प्रकाशके सहारे नट, नर्तक आदि रङ्गमञ्चपर नृत्य-अभिनय आदि क्रियाएँ करते हैं, उसी तरह जिस साक्षी स्वयं-ज्योति नित्य प्रकाश परमात्माके निष्क्रियरूपसे स्थित होनेपर ही सब सचेष्ट मूर्तियाँ अपनी-अपनी चेष्टाओंमें प्रवृत्त होती हैं तथा जैसे सुवर्ण ही कंगन, बाजूबंद, केयूर और नूपुरोंके रूपमें स्फुरित होता है एवं जैसे जलमें तरङ्ग-मालाएँ प्रकट होती हैं, उसी तरह जिससे यह सम्पूर्ण दृश्य स्फुरित होता है, वह परब्रह्म परमात्मा ही यह सम्पूर्ण जगत् है। उस पूर्ण ब्रह्ममें ही यह पूर्ण ब्रह्मरूप जगत् स्थित है। ऐसा विचारकर मेरे समक्ष वर्ण और आश्रमके अनुसार जैसा व्यवहार प्राप्त होता है, उस व्यवहारका अनुसरण करता हूँ। संत-महात्माओंके वचनका कौन उल्लङ्घन कर सकता है। भगवन् ! मैं आपके प्रसादसे ज्ञेय-तत्त्वका ज्ञान प्राप्त करके कृतार्थ हो गया हूँ। गुरुदेव ! आपको नमस्कार है। मैं आपके चरणोंमें भूमिपर दण्डवत् पड़ा हूँ। गुरुका कौन-सा प्रत्युपकार करके शिष्य उनके ऋणसे उऋण हो सकते हैं ? इसलिये शिष्योंको चाहिये कि वे अपने आपको मन, वाणी और शरीरद्वारा गुरुकी सेवामें समर्पित कर दें। यही उनका गुरुके ऋणसे उद्धार है, दूसरे किसी कर्मसे वे उद्धार नहीं पा सकते। स्वामिन् ! मैं आपके कृपाप्रसादसे भवसागरसे पार हो गया हूँ और अपने पूर्ण परमानन्दसे सम्पूर्ण जगज्जालको मैंने पूरित कर दिया है। अब मैं संशयरहित हो गया हूँ। 'यह सारा जगत् ब्रह्म ही है, क्योंकि यह ब्रह्मसे ही उत्पन्न होता, ब्रह्ममें ही लीन होता और ब्रह्मसे ही जीवन-धारण करता है'—इस प्रकार सामवेदमें श्रुतिके द्वारा जिसका सुस्पष्ट वर्णन किया गया है, उस सच्चिदानन्दघन परब्रह्म परमात्माको नमस्कार है। जो ब्रह्मानन्दस्वरूप अथवा ज्ञानोपदेशद्वारा ब्रह्मानन्दकी प्राप्ति करानेवाले, परम सुखद, अद्वितीय ज्ञानमूर्ति, द्वन्द्वोंसे रहित, आकाशसदृश निर्मल, 'तत्त्वमसि' आदि वेदान्त महावाक्योंके लक्ष्यार्थरूप, एक, नित्य, निर्मल, निश्चल, सम्पूर्ण बुद्धि-वृत्तियोंके साक्षी, समस्त भावोंसे परे तथा तीनों गुणोंसे रहित हैं, उन पर-ब्रह्मस्वरूप श्रीवसिष्ठजीको हम नमस्कार करते हैं।
( सर्ग २१६ )
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