संक्षिप्त योगवासिष्ठ
Sankshipt Yoga Vasistha
महर्षि वाल्मीकि द्वारा
६९४ * अविच्छिन्नचिदात्मकः पुमानस्तीह नेतरत् * [संक्षिप्त योगवासिष्ठ
स्फूर्ति होनेपर उसमें सबसे पहले आकाशसत्ताका अध्यास होता है; फिर दिक्-सत्ता, कालसत्ता और भेद सत्ताका उदय (अध्यास) होता है। जब आत्माको देह आदिमें अहं का भान होता है, तब देहसे भिन्न स्थलमें 'यहाँ मैं नहीं हूँ' इसका भी अवश्य भान होता है। यह देशकृत परिच्छेद कहलाता है। इस रीतिसे आत्मा ही नाना प्रकारका कालकृत और वस्तुक्रुत परिच्छेद स्वीकार करके बिना क्रमके ही द्वैतरूप होकर आकाशमें उदित होता है। फिर इन पूर्वोक्त आकाशात्मक पदार्थभेद-सत्ताओंके नामकरणकी बुद्धि उत्पन्न होती है, जिससे जाति, गुण और क्रिया आदिकी दृष्टिसे इनमें परस्पर भेद किया जा सके। परंतु वास्तवमें वह सब चिदाकाश ही है। इस प्रकार निराकार परमपदमें अहंभावसे देश, काल आदिकी कल्पनाओंके सिद्ध होनेपर अर्थात् उस परब्रह्म परमात्माके देश-कालादि-रूपसे स्थित होनेपर जो यह दृश्य नामक आभासरूप वस्तुकी प्रतीति होती है, वह सब निर्वाध ब्रह्म ही है, जो ब्रह्मसे भिन्न-सा प्रतीत होता है।
रघुनन्दन ! तुम तो समस्त दृश्य पदार्थोंसे मुक्त, सब ओर प्रकाशमान, सर्वस्वरूप, निर्मलस्वभाव, आत्मनिष्ठ, निरतिशय आनन्दमय, परमशान्तचित्त, आकाशके समान मनोहर एव तृणारहित हो। अब तुम धर्मके अनुसार राज्यका पालन करो।
(सर्ग २११-२१३)
सभासदोंका कृतार्थता-प्रकाशन तथा वसिष्ठजीकी आज्ञासे महाराज दशरथका ब्राह्मणोंको भोजन कराना और सात दिनोंतक दान-मानसे सम्पन्न उत्सव मनाना
श्रीवाल्मीकिजी कहते हैं—भरद्वाज ! महामुनि वसिष्ठजी जब इतना कह चुके, तब तत्काल ही आकाशसे वर्षा करनेके लिये जलसे भरे हुए मेघके समान गम्भीर घोषके साथ देवताओंकी दुन्दुभियाँ बज उठीं। भूतलपर हिमकी वर्षाके समान दिव्य पुष्पोंकी वृष्टि होने लगी, जिसने समस्त दिग्वधुओंके मुख उज्ज्वल कान्तिसे सुशोभित कर दिये। उस सभामें यथास्थान नीचे बैठे हुए समस्त सभासदोंने वे दिव्य पुष्प लेकर वसिष्ठजीके चरणोंमें पुष्पाञ्जलि अर्पित की और सबने सब प्रकारसे दुःख-शोकको त्याग दिया।
तत्पश्चात् राजा दशरथ बोले—भगवन् ! आपके उपदेशसे हमारी आत्मा परमपदमें सुखपूर्वक प्रवेश पानेके योग्य हो गयी है। हम संसाररूपी अत्यन्त विस्तृत एवं दुर्गम मार्गपर चिरकालसे चलते रहनेके कारण थक गये थे। परंतु आज आपकी उपदेश-वाणीसे शुद्ध हो उस परमपदमें उसी तरह विश्रामका सुख उठा रहे हैं, जैसे शरत्कालके उज्ज्वल मेघ हिमालय आदि पर्वतपर विश्राम करते हैं। पुरुषार्थकी सिद्धिके लिये अवश्य करने योग्य कर्मोंकी अवधि आज पूरी हो गयी—हमलोग कृतकृत्य हो गये। हमने आपत्तियोंकी चरम सीमा देख ली—अब इनसे पिण्ड छूट गया; क्योंकि हमें ज्ञेय-तत्त्वका सम्पूर्ण रूपसे ज्ञान हो गया और हम परमपदमें विश्राम पा रहे हैं।
श्रीरामजी बोले—मुनीश्वर ! आपकी वाणी सुनकर इतना सुख मिल रहा था, मानो अमृतका अभिषेक प्राप्त हो रहा हो। उसे बारंबार याद करके मैं परम पूजित और शान्त होनेपर भी रह-रहकर हर्षित-सा हो उठता हूँ। अब मुझे न तो कोई कर्मसे प्रयोजन है और न उसे न करने (छोड़ने) से ही। मैं जैसे हूँ, उसी तरह निश्चिन्त हूँ। आपके उस उपदेश-वचनसे विश्राम-सुखका जैसा उपाय प्राप्त हुआ है, वैसा दूसरा कौन होगा, दूसरी दृष्टि भी कैसी होगी? अहो ! हमें विश्रामसुखकी असीम विस्तार-वाली भूमि प्राप्त हो गयी है। आपकी कृपाके बिना मनुष्य इस
निर्वाण-प्रकरण उ० ] * सभासदों का कृतार्थता-प्रकाशन तथा दशरथका दान-मानसे सम्पन्न उत्सव मनाना * ६९५
ज्ञान-दृष्टिको कैसे जान सकता है ? भला, पुल या जहाजके बिना बालक समुद्रको कैसे पार कर सकता है ?
लक्ष्मणजी बोले—आज मुनिवर वसिष्ठजीकी वाणीसे जो बोध प्राप्त हुआ है, वह अनन्त जन्म-जन्मान्तरोंसे बढ़ी हुई दुर्वासनाओंके कारण उत्पन्न होनेवाले संशयोंका नाशक है तथा जन्म-जन्मान्तरोंसे संचित किये गये सैकड़ों पुण्योंके उत्तम फलको प्रकट करनेवाला है। इस बोधसे विचारके लिये उद्यत हुए मेरे मनमें आज पूर्ण चन्द्रमाके समान आह्लाद प्रदान करनेवाला परमात्मप्रकाश उदित हो गया है। ऐसी निरतिशयानन्द प्रकाशरूप आत्मदृष्टिके प्रत्यक्ष दिखायी देनेपर भी लोग अपने दुर्भाग्यके कारण सैकड़ों दोषपूर्ण दशाओं द्वारा दुःखी आगसे सूखे काठकी भाँति जलाये जा रहे हैं। यह महान् आश्चर्य है।
श्रीविश्वामित्रजीने कहा—अहो ! हमारे लिये बड़े हर्षकी बात है कि वसिष्ठ मुनिके मुखसे हमें यह परम पवित्र महान् ज्ञान सुननेको मिला, जिससे हमलोग सहस्रों वार गङ्गामें स्नान किये हुएके समान अत्यन्त पवित्र होकर बैठे हैं।
नारदजीने कहा—मैंने ब्रह्मलोकमें, स्वर्गमें और भूतलपर भी आजसे पहले जिसे नहीं सुना था, उस परम तत्त्वज्ञानको सुनकर मेरे दोनों कान पवित्र हो गये।
शत्रुघ्नने कहा—भगवन् ! आपके उपदेशसे मैं परमानन्दमें निमग्न हूँ। शान्त हूँ। परमपदको प्राप्त हो गया हूँ और सदाके लिये परिपूर्ण हूँ। केवल सुखस्वरूपसे स्थित हो गया हूँ।
राजा दशरथ बोले—हमारे अनेक जन्मोंके संचित पुण्यसे ही इन धीर मुनीश्वरने हमको उस परम उत्तम ज्ञानका उपदेश दिया, जिससे हम सभी परम पवित्र हो गये।
श्रीवाल्मीकिजी कहते हैं—भरद्वाज ! जब राजाके साथ समस्त सभासद् वहाँ इस तरहकी बातें कह रहे थे, उस समय महर्षि वसिष्ठ ज्ञानसे पवित्र हुई वाणीद्वारा यों बोले—'राजन् ! रघुकुलचन्द्र ! अब मैं जो कहता हूँ, उसे करो। इतिहास-कथा सुननेके पश्चात् ब्राह्मणोंकी पूजा करनी चाहिये। इसलिये आज इन ब्राह्मणसमूहोंको सब प्रकारकी मनोवाञ्छित वस्तुएँ देकर इनकी अभिलाषा पूर्ण करो। इससे तुम्हें वेदार्थतुल्य इस महारामायणके श्रवणका पूरा-पूरा तथा अक्षय फल प्राप्त होगा। मोक्षकी उपायभूत कथा-वस्तुकी समाप्ति होनेपर एक तुच्छ एवं दरिद्र मनुष्यको भी अपनी शक्तिके अनुसार ब्राह्मणका पूजन करना चाहिये। फिर आप-जैसे महाराजके लिये तो कहना ही क्या है ?
मुनिका यह वचन सुनकर राजा दशरथने सहस्रों वेद-वादी ब्राह्मणोंको दूत भेजकर बुलवाया। मथुरामें, सुराष्ट्र देशमें तथा गौड़ देशमें जो ब्राह्मण निवास करते थे, उनके कुलोंसे ब्राह्मणोंको बुलवाकर उन सबका पूजन किया। अधिक-से-अधिक ज्ञान-विज्ञानवाले ब्राह्मणोंको प्रधानता देते हुए भूपालने दस हजार ब्राह्मणोंको भोजन कराया और उन्हें उनकी रुचिके अनुसार भोजन करानेके पश्चात् दान-दक्षिणा भी दी। इस तरह ब्राह्मणोंका पूजन करके देवताओं, पितरों, राजाओं, पुरवासियों, मन्त्रियों, सेवकों, दीन-दुखियों तथा अन्धोंको भी भोजन एवं दान-मानसे संतुष्ट किया। इस प्रकार संसारकी सीमाके अन्तमें पहुँचे हुए राजा दशरथने उस दिन बड़ा भारी उत्सव किया। महाराज दशरथ अविनाशी परमपदको प्राप्त हो चुके थे। बोधरूपी सूर्यके उदयसे संसाररूपी रात्रिका अन्त हो गया था। इसलिये वे बड़े हर्षसे लगातार सात दिनोंतक महान् उत्सव मनाते रहे। जिसमें दान, भोजन तथा धन-वितरण-का कार्यक्रम निरन्तर चलता रहा।
(सर्ग २१४)
६९६ * अविच्छिन्नचिदात्मैकः पुमानस्तीह नेतरत् * [ संक्षिप्त योगवासिष्ठ
श्रीवाल्मीकि-भरद्वाज-संवादका उपसंहार, इस ग्रन्थकी महिमा तथा श्रोताके लिये दान, मान आदिका उपदेश
श्रीवाल्मीकिजी कहते हैं—मेरे शिष्यशिरोमणि परमबुद्धिमान् भरद्वाज ! इसी प्रकार तुम भी इसी कमनीय तथा निर्मल ब्रह्मात्मदृष्टिका दृढ़तापूर्वक अवलम्बन करके वीतराग संदेहशून्य शान्तचित्त जीवन्मुक्त होकर सुखसे रहो । निष्पाप भरद्वाज ! इस ज्ञानका आश्रय ले तुम्हारी बुद्धि यदि आसक्तिशून्य रही तो घने मोहान्धकारमें पड़ने और मूढ़ होनेपर भी नष्ट नहीं होगी। बेटा भरद्वाज ! तुम्हारी बुद्धि तो स्वाभाविक ही आसक्तिके बन्धनसे मुक्त है । परंतु आज इस मोक्षसंहिताको सुनकर तुम वास्तवमें मुक्ततर हो गये—सर्वश्रेष्ठ जीवन्मुक्त हो गये । इन पवित्र तथा ब्रह्मका प्रत्यक्ष अनुभव प्रदान करनेवाले मोक्षोपायोंका यदि कोई बालक भी श्रवण कर ले तो वह तत्त्वज्ञानी हो सकता है । फिर तुम-जैसे महात्मा पुरुषके लिये तो कहना ही क्या है ? सत्पुरुषोंकी नीति (शिक्षा)से, उनकी उत्तम सेवासे, उनके सामने प्रश्न करनेसे तथा उनकी उदारतापूर्ण ज्ञानचर्चामें भाग लेनेसे प्रमादशून्य श्रेष्ठ-बुद्धिवाले अधिकारी पुरुष उसी प्रकार ज्ञेय आत्मतत्त्वको जान लेते हैं, जैसे श्रीवसिष्ठजीके सङ्गसे श्रीराम आदिने जाना था। तृणारूपी चर्ममयी रस्सीसे दृढ़तापूर्वक बँधी हुई अज्ञानीके हृदयमें जो देह और इन्द्रिय आदिके प्रति तादात्म्याध्यासरूप तथा पुत्र-कलत्रादिके प्रति ममतारूप ग्रन्थियाँ बद्धमूल हो गयी हैं, वे सब इस मोक्षशास्त्रकी कथाओंपर विचार करते रहनेसे सर्वथा खुलकर एकरसताको प्राप्त हो जाती हैं । बेटा ! दूसरी बहुत-सी बातें कहनेसे क्या लाभ ? इतना ही जान लो कि जो लोग इन महामहिमाशाली मोक्षोपायोंका ज्ञान प्राप्त करेंगे, वे तत्त्ववेत्ताओंमें श्रेष्ठतम होकर फिर कभी संसारबन्धनमें नहीं पड़ेंगे । जो सत्पुरुष इस ग्रन्थको बहुश्रुत विद्वान्के सामने स्वयं भलीभाँति विचारकर इसे पूर्णतः समझ लेनेके पश्चात् स्वयं भी सुननेकी इच्छावाले लोगोंको उपदेश देंगे, वे पुनर्जन्मको नहीं प्राप्त होंगे । उन्हें दूसरे वचनोंका आश्रय लेनेकी क्या आवश्यकता है ? जो अर्थानुसंधानकी अपेक्षा न रखकर केवल इसका पारायण करेंगे अथवा जो इस पुस्तकको लिखेंगे तथा जो उत्तम तीर्थक्षेत्रमें व्याख्यानकुशल श्रेष्ठ वक्ताको इसकी कथा कहनेके लिये नियुक्त करेंगे, वे यदि सकामभाववाले होंगे तो राजसूययज्ञके फलसे युक्त हो बारंबार स्वर्गलोकमें जायँगे और यदि निष्काम होकर उक्त कार्य करेंगे तो उत्तम कुलमें जन्म तथा सद्गुरुके मुखारविन्दसे सत्-शास्त्रके श्रवणका सुयोग पाकर तीसरे जन्ममें उसी तरह मोक्ष प्राप्त कर लेंगे, जैसे पुण्यवान् पुरुष धन-सम्पत्तिको पा लेते हैं । पूर्वकालमें अचिन्त्यरूपवाले ब्रह्माजीने मेरेद्वारा रचित इस ग्रन्थपर पूर्ण विचार करके यह बात कही थी कि 'इसमें सत्यस्वरूप ब्रह्मका निर्वचन होनेके कारण यह मोक्षमयी उत्तम संहिता है ।' उन महर्षिकी यह वाणी असत्य नहीं हो सकती । मोक्षोपाय नामक कथात्मक प्रबन्धरूप इस महारामायणकी कथा समाप्त होनेपर उत्तम बुद्धिवाले श्रोताको चाहिये कि वह वक्ताको प्रयत्नपूर्वक सुन्दर भवन देकर अभीष्ट अन्न-पानके दानसे ब्राह्मणोंका पूजन करे । इतना ही नहीं, उन सबको यथाशक्ति मनोवाञ्छित धनकी दक्षिणा आदि भी देनी चाहिये । भरद्वाज ! तुम्हें बोध प्रदान करनेके लिये मैंने सैकड़ों कथा-क्रमोंसे विशाल कलेवर हुए इस निर्मल दृष्टान्तों और युक्तियोंसे सम्पन्न तथा ब्रह्मतत्त्वकी विस्तृत व्याख्यासे युक्त 'महारामायण-शास्त्रको श्रवण कराया है। इसे सुनकर जीते-जी ही समस्त बन्धनोंसे मुक्त होकर ज्ञान, तपस्या और कर्मके फलसे युक्त अक्षय सम्पत्ति प्राप्त करके सदाके लिये पूर्ण परमानन्दमें निमग्न हो जाओ ।
( सर्ग २१५ )
निर्वाण-प्रकरण उ० ] * अरिष्टनेमि, सुरुचि, कारुण्य तथा सुतीक्ष्णकी कृतकृत्यताका प्रकाशन * ६९७
अरिष्टनेमि, सुरुचि, कारुण्य तथा सुतीक्ष्णकी कृतकृत्यताका प्रकाशन, शिष्योंका गुरुजनोंके प्रति आत्मनिवेदन तथा ब्रह्मको एवं ब्रह्मभूत वसिष्ठजीको नमस्कार
श्रीवाल्मीकिजी कहते हैं—राजन् ! वसिष्ठजीका श्रीराम आदिके प्रति दिया हुआ यह सदुपदेश मैंने तुमसे कहा—इस ग्रन्थमें बताये हुए तत्त्वमार्गसे चलकर तुम निश्चय ही उस परम पदको प्राप्त कर लोगे ।
राजा अरिष्टनेमिने कहा—भगवन् ! आपकी यह दृष्टि संसार-बन्धनका विनाश करनेवाली है, जिसके पड़ते ही मैं संसार-सागरसे पार हो गया ।
देवदूत बोला—देवाङ्गने ! ऐसा कहकर आश्चर्यसे चकित नेत्रवाले राजा अरिष्टनेमि मुझसे स्नेहयुक्त मधुर वाणीमें बोले—
‘देवदूत ! आपको नमस्कार है । प्रभो ! आपका भला हो । सत्पुरुषोंकी मैत्री सात पग साथ चलनेसे ही हो जाती है, ऐसा कहा गया है । उसे आपने सत्य कर दिखाया । अब आप देवराजके भवनको लौट जाइये । आपका कल्याण हो । मैं इस मोक्षशास्त्रकी कथाके श्रवणसे परम संतुष्ट एवं आनन्दमग्न हो गया हूँ । मैंने जो कुछ सुना है उसका चिन्तन करता हुआ अब यहीं रहूँगा । मेरी सारी चिन्ता दूर हो चुकी है ।’
भद्रे ! राजा अरिष्टनेमिके ऐसा कहनेपर मुझे बड़ा आश्चर्य हुआ । जिसे मैंने पहले कभी नहीं सुना था, वह ज्ञानका सारभूत तत्त्व मुझे सुननेको मिला है । उसीसे मेरा अन्तःकरण इस समय अत्यन्त आनन्दमग्न हो गया है । अमृत पीकर छके हुए पुरुषकी भाँति मैं पूर्णतः तृप्तिका अनुभव कर रहा हूँ । तदनन्तर वाल्मीकिजीसे विदा ले मैं यहाँ तुम्हारे निकट मानो तुम्हें उपदेश देनेके लिये ही चला आया था । निष्पाप देवाङ्गने ! तुमने जो कुछ पूछा था, वह सब मैंने तुम्हें कह सुनाया । अब मैं यहाँसे इन्द्रभवनको जाऊँगा ।
अप्सरा बोली—महाभाग देवदूत ! आपको नमस्कार है । आपने मुझे जो तत्त्वज्ञान सुनाया है, उससे मुझे बड़ा संतोष प्राप्त हुआ । मैं कृतार्थ हो गयी । मेरा सारा शोक जाता रहा । अब मैं सदा निश्चिन्त रहूँगी । आपका कल्याण हो । आप अपनी इच्छाके अनुसार देवराज इन्द्रके समीप जाइये ।
अग्निवेश्यने कहा—वत्स कारुण्य ! तदनन्तर वह सुरुचि नामवाली श्रेष्ठ अप्सरा गन्धमादनके समीपवर्ती हिमालयके शिखरपर बैठकर देवदूतके मुखसे सुने हुए उसी तत्त्वज्ञानका चिन्तन करने लगी । बेटा ! क्या तुमने वसिष्ठजीका उपदेशरूप यह महारामायण शास्त्र सुना ? (मोक्षका साधन कर्म है या कर्मत्याग, ऐसा जो तुम्हारा संदेह था, क्या वह दूर हो गया ?) उस समस्त उपदेशपर पूर्णतः विचार और निश्चय करके तुम जैसा चाहो, वैसा करो ।
कारुण्य बोला—भगवन् ! इस समय तत्त्वज्ञान होनेसे मेरी स्मृति, वाणी और दृष्टि-सत्ता सभी निर्विषय हो गये हैं । तात्पर्य यह कि अब मेरे लिये इस लोकमें न तो कुछ स्मरणीय रहा, न वर्णनीय रहा और न दर्शनीय ही रह गया । ठीक वैसे ही, जैसे खम और वन्ध्यापुत्रके विषयमें स्मृति, वाणी और दृष्टिके लिये कोई आधार नहीं रह जाता है । मेरे लिये सारी सांसारिक स्थिति वैसी ही हो गयी है, जैसी निर्जल मरुप्रदेशमें मरीचिकाकी । अर्थात् जैसे मृगतृष्णाका जल मिथ्या है, उसी तरह यह दृश्यप्रपञ्च भी मेरे लिये असत् हो गया है । अब मुझे न कर्म करनेसे कोई प्रयोजन है और न कर्म न करनेसे ही कोई प्रयोजन है; क्योंकि मैं कृतार्थ हो गया, तथापि लोक-संग्रहके लिये न्यायतः प्राप्त कर्म करता रहूँगा । हठद कर्म छोड़ देनेके लिये भी क्या आग्रह है ।
६९८ * अविच्छिन्नचिदात्मैकः पुमानस्तीह नेतरत् * [ संक्षिप्त योगवासिष्ठ
अगस्ति बोले—सुतीक्ष्ण ! ऐसा कहकर अग्निवेश्यका विद्वान् पुत्र कारुण्य, जो कृतकृत्य हो चुका था, वर्ण और आश्रमके अनुसार प्राप्त हुए कर्मका समय-समयपर यथोचित रीतिसे अनुष्ठान करने लगा। अतः सुतीक्ष्ण ! मोक्षका साधन ज्ञान है या कर्म—ऐसा संशय नहीं करना चाहिये। संशय करनेसे जीव परम पुरुषार्थरूपी स्वार्थसे भ्रष्ट हो जाता है। संशयात्माका विनाश हो जाता है।
अगस्तिमुनिका यह वचन अनेक अर्थोंमें एकताका बोध करानेवाला था। इसे सुनकर सुतीक्ष्णने गुरुदेवको प्रणाम किया और उनके निकट विनयपूर्वक कहा।
सुतीक्ष्ण बोले—भगवन् ! आपकी कृपासे मेरा अज्ञान और उसका कार्यरूप जगत् नष्ट हो गया। मुझे सर्वोत्तम ब्रह्मज्ञानकी प्राप्ति हो गयी। जैसे दीपक रहनेपर उसके प्रकाशके सहारे नट, नर्तक आदि रङ्गमञ्चपर नृत्य-अभिनय आदि क्रियाएँ करते हैं, उसी तरह जिस साक्षी स्वयं-ज्योति नित्य प्रकाश परमात्माके निष्क्रियरूपसे स्थित होनेपर ही सब सचेष्ट मूर्तियाँ अपनी-अपनी चेष्टाओंमें प्रवृत्त होती हैं तथा जैसे सुवर्ण ही कंगन, बाजूबंद, केयूर और नूपुरोंके रूपमें स्फुरित होता है एवं जैसे जलमें तरङ्ग-मालाएँ प्रकट होती हैं, उसी तरह जिससे यह सम्पूर्ण दृश्य स्फुरित होता है, वह परब्रह्म परमात्मा ही यह सम्पूर्ण जगत् है। उस पूर्ण ब्रह्ममें ही यह पूर्ण ब्रह्मरूप जगत् स्थित है। ऐसा विचारकर मेरे समक्ष वर्ण और आश्रमके अनुसार जैसा व्यवहार प्राप्त होता है, उस व्यवहारका अनुसरण करता हूँ। संत-महात्माओंके वचनका कौन उल्लङ्घन कर सकता है। भगवन् ! मैं आपके प्रसादसे ज्ञेय-तत्त्वका ज्ञान प्राप्त करके कृतार्थ हो गया हूँ। गुरुदेव ! आपको नमस्कार है। मैं आपके चरणोंमें भूमिपर दण्डवत् पड़ा हूँ। गुरुका कौन-सा प्रत्युपकार करके शिष्य उनके ऋणसे उऋण हो सकते हैं ? इसलिये शिष्योंको चाहिये कि वे अपने आपको मन, वाणी और शरीरद्वारा गुरुकी सेवामें समर्पित कर दें। यही उनका गुरुके ऋणसे उद्धार है, दूसरे किसी कर्मसे वे उद्धार नहीं पा सकते। स्वामिन् ! मैं आपके कृपाप्रसादसे भवसागरसे पार हो गया हूँ और अपने पूर्ण परमानन्दसे सम्पूर्ण जगज्जालको मैंने पूरित कर दिया है। अब मैं संशयरहित हो गया हूँ। 'यह सारा जगत् ब्रह्म ही है, क्योंकि यह ब्रह्मसे ही उत्पन्न होता, ब्रह्ममें ही लीन होता और ब्रह्मसे ही जीवन-धारण करता है'—इस प्रकार सामवेदमें श्रुतिके द्वारा जिसका सुस्पष्ट वर्णन किया गया है, उस सच्चिदानन्दघन परब्रह्म परमात्माको नमस्कार है। जो ब्रह्मानन्दस्वरूप अथवा ज्ञानोपदेशद्वारा ब्रह्मानन्दकी प्राप्ति करानेवाले, परम सुखद, अद्वितीय ज्ञानमूर्ति, द्वन्द्वोंसे रहित, आकाशसदृश निर्मल, 'तत्त्वमसि' आदि वेदान्त महावाक्योंके लक्ष्यार्थरूप, एक, नित्य, निर्मल, निश्चल, सम्पूर्ण बुद्धि-वृत्तियोंके साक्षी, समस्त भावोंसे परे तथा तीनों गुणोंसे रहित हैं, उन पर-ब्रह्मस्वरूप श्रीवसिष्ठजीको हम नमस्कार करते हैं।
( सर्ग २१६ )
निर्वाण-प्रकरण उत्तरार्ध सम्पूर्ण
संक्षिप्त योगवासिष्ठ सम्पूर्ण
क्षमा-प्रार्थना और नम्र निवेदन । ६९९
क्षमा-प्रार्थना और नम्र निवेदन
योगवासिष्ठ महारामायण ग्रन्थका अद्वैत ब्रह्म-प्रतिपादक शास्त्रोंमें बड़े महत्त्वका स्थान है। इसमें बड़ी ही सुन्दर सुबोध युक्तियों, आख्यानों तथा इतिहास-कथाओंके द्वारा जगत्की असत्ता एवं एकमात्र सच्चिदानन्दघन परमात्मसत्ताका प्रतिपादन किया गया है। एक ही तत्त्वका प्रतिपादक होनेसे ग्रन्थमें पुनरुक्ति बहुत अधिक है। इस महान् ग्रन्थका सार 'कल्याण' के विशेषाङ्कके रूपमें प्रकाशित करनेके लिये 'कल्याण' के बहुसंख्यक ग्राहकोंका बहुत पुराना आग्रह था। भगवान्की कृपासे वह आज पूरा हो रहा है। इसमें तत्त्व-निरूपण तो है ही, साथ-ही-साथ शास्त्रोक्त सदाचार, सत्पुरुष-सङ्ग, त्याग-वैराग्ययुक्त सत्कर्म, वस्तु-विवेक, सद्गुण, आदर्श व्यवहार आदिपर भी बड़ा जोर दिया गया है। 'कल्याण' के सम्मान्य पाठक-पाठिकाओंसे संविनय निवेदन है कि वे अपने जीवनको पवित्र तथा परमात्म-प्राप्तिके योग्य बनानेके लिये इन समस्त सदाचार-सद्गुणोंको विशेषरूपसे ग्रहण करें।
इस महान् ग्रन्थमेंसे सार निकालकर प्रसंग चुननेका सारा कार्य श्रद्धेय श्रीजयदयालजी गोयन्दकाने किया है। सुन्दर अनुवादका कार्य करनेवालोंमें प्रधान हैं—पाण्डेय पं० श्रीरामनारायणदत्तजी शास्त्री 'राम' महोदय और दूसरे हैं पं० श्रीरामाधारंजी शुक्ल शास्त्री। इन्होंने बड़ी ही लगन तथा बुद्धिमानीसे कार्य किया है। यह विशेषाङ्क इन्हीं महानुभावोंके सद्-प्रयासका फल है। हमलोगोंका तो केवल नाममात्र है।
इसमें जो भूलें रही हैं, उनकी सारी जिम्मेवारी हमारी है और उसके लिये हम क्षमाप्रार्थी हैं। सारग्राही महानुभावोंको इसमें जो कुछ श्रेष्ठ, सुन्दर, भूलसे रहित दिखायी दे, कृपया उसीको ग्रहण करें।
कई प्रकारकी अड़चनें आ जानेके कारण सब प्रकरणोंके चित्र नहीं बन पाये, इसलिये विशेषाङ्कमें चित्र प्रसङ्गानुकूल नहीं लग सके हैं। चित्रोंपर प्रकरण तथा सर्ग छपे हैं, उसीसे देख लेनेकी कृपा करें। इन सब त्रुटियोंके लिये भी क्षमा-प्रार्थना है।
'कल्याण' के सभी ग्राहक-ग्राहिका, पाठक-पाठिका, प्रेमी-प्रचारक, 'कल्याण' से प्रीति तथा सहानुभूति रखनेवाले एवं खास करके 'कल्याण' में प्रकाशित साधन, सद्भाव, सदाचार, नियम आदिको सानन्द स्वयं ग्रहण करने तथा जनतामे उसकी उपादेयता बतलाकर उनका प्रसार करनेवाले सभी श्रेणियोंके महानुभाव एवं महिलाएँ हमारे लिये परम आदरणीय हैं। हम उनका हृदयसे अभिवादन करते हैं, और उन्हें 'कल्याण' परिवारके ही माननीय तथा अभिन्न-हृदय सदस्य मानकर उनसे प्रार्थना करते हैं कि 'कल्याण' के प्रति वे अपना अहैतुक प्रेम, अनुग्रह, सद्भाव सदा बढ़ाते रहें। हमारी स्वभाव-सुलभ तथा प्रमादजनित त्रुटियोंको बताते रहें और अपने निर्मल प्रेमसे ही उन्हें दूर भी करें। वे हमें अपनी सद्भावनासे बल देते रहें जिससे हमारे जीवनकी गति भगवान्की ओर लगी रहे और हमें उत्तरोत्तर आगे बढ़नेमें सहायता मिले।
हम अपने उन सभी पूज्यचरण पवित्रहृदय, कृपालु, संतो, महात्माओं, आचार्यों, विद्वानों और लेखक तथा कवि महानुभावों तथा पवित्रहृदया माताओंके श्रीचरणोंमें भक्ति-श्रद्धासहित प्रणाम करते हुए, जानते तथा न जानते हुए बने तथा बननेवाले अपराधोंके लिये क्षमा-प्रार्थना करते हुए उनसे शुभाशीर्वाद चाहते हैं। 'कल्याण' के प्रचार-प्रसारमें हम उन्हींको प्रधान कारण मानते हैं; क्योंकि उन्हींके सद्भावों तथा विचारपूर्ण लेखोंसे 'कल्याण' को सदा शक्ति मिलती रहती है।
इस अङ्कके सम्पादन, चित्रनिर्माण, प्रूफ़-संशोधन आदि कार्योंमें जिन-जिनसे हमें सहायता मिली है, उन सभीके प्रति हम अपनी हार्दिक कृतज्ञता प्रकट करते हैं।
इस विशेषाङ्कमें बहुत-से कृपालु लेखक महानुभावोंके लेख स्थानाभावसे नहीं जा सके हैं, उनसे हम सविनय क्षमा चाहते हैं।
प्रार्थी
हनुमानप्रसाद पोद्दार <br> चिम्मनलाल गोस्वामी } सम्पादक
७०० * अविच्छिन्नचिदात्मैकः पुमानस्तीह नेतरः *
जीवन्मुक्तका स्वरूप और आचार
रह न गया जिसमें किंचित् भी, कहीं, कभी ममताका लेश ।
प्राणि-पदार्थ-परिस्थिति देने लगे सभी समता-संदेश ॥
रहा न जिसमें किसी वस्तु-स्थितिका किंचित्-सा भी अभिमान ।
अहंकारके पूर्ण विलयसे हुआ जिसे पर-तत्त्व-ज्ञान ॥
रहता सदा जगत्में, करता काम सभी विधिके अनुसार ।
पर कुछ भी करता न कभी वह, रहता निर्मल निरहंकार ॥
अभिनय करता यथायोग्य वह सुन्दर नाम-रूप अनुसार ।
पर रहता निर्लेप नित्य वह राग-काम-विरहित अविकार ॥
द्वेष, क्रोध, शोक, भय, चिन्ता, ईर्ष्या, मत्सर, हर्षामर्ष ।
छू सकते न कभी उसको सब, हो अपकर्ष, भले उत्कर्ष ॥
सत्य अहिंसा अपरिग्रह अस्तेय अतुल सब विधि संतोष ।
करुण-हृदय संतत सेवा-रत, शुभ गुणमय जीवन निर्दोष ॥
पर-दुखमें दुखिया-सा होकर यथासाध्य सेवा करता ।
पर-सुखमें कर हर्ष प्रकट, अति अमित मोद मनमें भरता ॥
सुखकी नहीं स्पृहा करता, होता न कभी दुखमें उद्विग्न ।
द्वन्द्वरहित वह रहता निज निर्मल स्व-रूप चिन्मयमें मग्न ॥
कभी न होता किसी जीवका उससे किंचित् भी अपकार ।
सदा सभीके हितमें रहती उसकी बुद्धि-विभूति उदार ॥
पर होते आदर्श सभी उसके विशुद्ध सुन्दर व्यवहार ।
जीवन्मुक्त वही अति पावन परम ज्ञान-विग्रह साकार ॥
शम-दम, परहितरति ईश्वर-गुरु-सेवन उसके सहज स्वभाव ।
पर-वैराग्य सहज शुचि रहता, नहीं भोगका किंचित् चाव ॥
नहीं त्यागमें भी होता वह आग्रहवश कदापि अनुरक्त ।
पूर्ण परात्पर सच्चिन्मय आनन्द रूप रहता अविभक्त ॥
करता सहज रूपसे सारे सदाचार संयुत शुभ कर्म ।
नहीं छोड़ता किसी प्रलोभन-भयसे वह अपना सद्धर्म ॥
पर रहता स्वरूपतः वह नित धर्माधर्म-रहित तत्त्वज्ञ ।
नहीं समझ पाते, उसकी अन्तःस्थितिको बाहरसे अज्ञ ॥
**९—भेदके निराकरणपूर्वक एकमात्र ब्रह्मकी ही अखण्ड सत्ताका वर्णन तथा जगत्की पृथक् सत्ताका खण्डन ... १११**
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