भारतकोश
संक्षिप्त योगवासिष्ठ

संक्षिप्त योगवासिष्ठ

Sankshipt Yoga Vasistha

महर्षि वाल्मीकि द्वारा

DevanagariHindipublished750 पृष्ठ

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४४ * अविच्छिन्नचिदात्मैकः पुमानस्तीह नेतरत् * [ संक्षिप्त योगवासिष्ठ

इसके सुन्दर पल्लव हैं। गुल्म नामक (पेटका) रोग ही इसपर फैली हुई लताएँ अथवा झाड़ियाँ हैं। यह कर्म करनेके लिये पञ्चभूतोंके समूहसे संगठित हुआ है। जीव तथा ईश्वररूप पक्षियोंने इसपर अपने घोंसले बना रक्खे हैं। दाँतरूपी केसरोंसे सुशोभित, उत्पत्ति-विनाश-शील तथा मन्द हासमय विकाससे युक्त हर्षरूपी फूलों-द्वारा यह शरीर-वृक्ष सदा अलंकृत होता रहता है। सुन्दर कान्ति ही इसकी छाया है। यह देहरूपी वृक्ष जीवरूपी पथिकोंका विश्राम-स्थान है। इसे किसका आत्मीय कहा जाय और किसका पराया? इसके ऊपर आस्था और अनास्था ही क्या हो सकती है? तात! भवसागर तथा नदी आदिको पार करनेके लिये बारंबार अपनायी गयी देहलता एवं नौकामें कौन आत्मीयताकी भावना कर सकता है? जहाँ रोमरूपी असंख्य वृक्ष उगे हुए हैं, जो इन्द्रियरूपी बहुसंख्यक गड्डोंसे भरा हुआ है, उस देहरूपी निर्जन वनमें कौन विश्वस्त (निर्भय) होकर रह सकता है?

जो संसाररूपी वनमें उगा और बढ़ा है, जिसपर चित्तरूपी चञ्चल वानर उछलता-कूदता रहता है, जिसका प्रत्येक अवयव विषय-चिन्तनरूपी मञ्जरीसे अलंकृत है, महान् दुःखरूपी घुनोंके लग जानेसे जिसमें सब ओर छेद या घाव हो गये हैं, जो तृणारूपिणी सर्पिणीका घर है, जिसपर कोपरूपी कौएने घोंसला बना रक्खा है, जिसमें मन्द मुसकानरूपी पुष्प प्रकट होते और खिलते हैं, इसीलिये जिसकी बड़ी शोभा होती है, शुभ और अशुभ (सुख और दुःख) जिसके महान् फल हैं, सुन्दर कंधे और बाँहें जिसकी शाखाएँ हैं, अङ्गुलियोंसे युक्त हाथरूपी पुष्प-गुच्छोंके कारण जो बड़ा सुन्दर जान पड़ता है, प्राणवायुरूपी पवनके स्पन्दनसे जिसके सम्पूर्ण अवयवरूपी पल्लव हिलते रहते हैं, जो समस्त इन्द्रियरूपी पक्षियोंका आधार है, सुन्दर घुटनोंसे युक्त शरीरका निचला भाग जिसका तना है, जो बहुत ऊँचा है, यौवनकी कान्तिरूपी छायासे युक्त होनेके कारण जो सरस प्रतीत होता है, कामरूपी पथिक जिसका सेवन करता है, मस्तकपर उगे हुए बड़े-बड़े केश-कलाप जिसपर जमे हुए तिनकोंके समुदाय हैं, अहंकाररूपी गीध जिसपर घोंसला बनाकर रहता है, जो भीतरसे खोखला (छिद्रयुक्त) है, नाना प्रकारकी वासनारूपिणी जटाओंके जालका उद्गम-स्थान होनेके कारण जिसे काटना अत्यन्त कठिन है तथा परिश्रमरूपी शाखा-विस्तारके कारण जो विरस (रूखा) दिखायी देता है, वह शरीररूपी वृक्ष मुझे सुखद नहीं प्रतीत होता।

मुने! शरीर अहंकाररूपी गृहस्थका विशाल गृह है। यह गिरकर सदाके लिये धरतीपर लोट जाय अथवा चिरकालतक स्थिर बना रहे, इससे मेरा क्या प्रयोजन है? जहाँ इन्द्रियरूपी पशु कतार बाँधकर खड़े रहते हैं, तृणारूपिणी गृहस्वामिनी बारंबार (घर-आँगनमें) डोलती-फिरती है तथा जिसके समस्त अवयवोंको आसक्तिरूपी गेरू आदिके रंगसे रँगा गया है, वह शरीररूपी गृह मुझे अभीष्ट नहीं है। पीठकी हड्डी (रीढ़) रूपी शहतीरोंके परस्पर मिलनेसे जिसके भीतर खाली स्थान बहुत थोड़ा रह गया है तथा जो आँतकी रस्सियोंसे बाँधकर खड़ा किया गया है, वह देहरूपी घर मुझे प्रिय नहीं है। जिसमें सब ओर नस नाड़ी और आँतोंकी रस्सियाँ फैली हुई हैं, जिसे रक्तरूपी जलसे बनाये गये गारेके द्वारा लीपा गया है तथा बुढ़ापा-रूपी चूनेसे जिसपर सफेदी की गयी है, वह देहरूपी घर मुझे अभीष्ट नहीं है। चित्तरूपी भृत्यने नाना प्रकारकी अनन्त चेष्टाओं‌द्वारा जिसकी स्थिति अत्यन्त सुदृढ कर दी है तथा मिथ्या और मोह (असत्य और अज्ञान)—ये दो जिसके बड़े-बड़े खंभे हैं, वह देहरूपी गृह मुझे प्रिय नहीं है। दुःखरूपी छोटे-छोटे बच्चों‌ने जहाँ रो-रोकर कोलाहल मचा रक्खा है,