संक्षिप्त योगवासिष्ठ
Sankshipt Yoga Vasistha
महर्षि वाल्मीकि द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंवैराग्य-प्रकरण ] * शरीर-निन्दा * ५५
गाढ़ निद्रारूपी सुख-शय्याके कारण जो मनोरम प्रतीत होता है तथा जिसमें दुश्चेष्टारूपिणी दग्धै दासी निवास करती है, वह देहरूपी घर मुझे प्रिय नहीं है । मुनीश्वर ! जो मल आदि दोषोंसे युक्त विषय-समूहरूपी बर्तनों तथा अन्यान्य उपकरणोंसे ठसाठस भरा हुआ है तथा जिसमें अज्ञानरूपी नोनछा लगा हुआ है, वह देहरूपी गेह मुझे अभीष्ट नहीं है । गुल्फरूपी आधार-काष्ठपर स्थित जो पिंडलियाँ हैं, वे मानो खंभे हैं । घुटना उनका मस्तक है, वह भी जिसके ऊरुस्तम्भका आधार है तथा दोनों बड़ी-बड़ी भुजाएँ दो आड़ी लकड़ियोंके समान जिसे दृढ़तापूर्वक धारण करती हैं, वह देहरूपी घर मुझे इष्ट नहीं है ।
ब्रह्मन् ! जहाँ ज्ञानेन्द्रियरूपी झरोखोंके भीतर प्रज्ञारूपिणी गृहस्वामिनी क्रीडा कर रही है तथा चिन्ता-रूपिणी पुत्रियाँ खेल रही हैं, वह देह-गेह मुझे प्रिय नहीं है । जो सिरके केशारूपी छाजनसे छाया हुआ है, कानरूपी शोभाशाली चन्द्रशालाओंसे सुशोभित है तथा कुछ लम्बी अङ्गुलिरूप काष्ठचित्रोंसे सुसज्जित है, वह शरीररूपी गृह मुझे प्रिय नहीं है । जिसके समस्त अङ्गरूपी भित्तियोंके समूहमें रोमरूपी घने जौके अङ्कुर उगे हैं और जहाँ पेटका गड्ढा कभी भरता नहीं, ऐसा देहरूपी गेह मुझे नहीं चाहिये । जिसमें नखरूपी मकड़ियोंका निवास है, जहाँ भूखरूपी कुतिया निरन्तर शोर मचाये रहती है तथा जिसमें भयानक शब्द करनेवाली प्राणवायु सदा चलती रहती है, ऐसे देह-गेहकी प्राप्ति मुझे प्रिय नहीं है । जहाँ श्वास-प्रश्वासके रूपमें वायुके वेगका निरन्तर भीतर-बाहर आना-जाना लगा रहता है और जिसकी इन्द्रियरूपी खिड़कियाँ सदा खुली रहती हैं, वह देहरूपी घर मुझे कभी इष्ट नहीं है । जिसके मुखरूपी दरवाजेपर जिह्वारूपिणी वानरी सदा डटी रहती है, अतएव जो भयङ्कर दिखायी देता है तथा जिसके दाँतरूपी हड्डियोंके टुकड़े स्पष्टतः दृष्टिगोचर होते हैं, वह शरीररूपी घर मुझे नहीं चाहिये । यह देह गेह त्वचारूपी चूनेके लेप (या पलस्तर) से चिकना किया हुआ है । नाड़ीरूप यन्त्रोंके संचारसे यह चञ्चल बना रहता है और मनरूपी सुन्दर चूहेने इसमें सब ओर बिल खोद रक्खे हैं; इसलिये यह मुझे प्रिय नहीं है । जो मन्द मुसकानरूपी दीपककी प्रभासे क्षणभरके लिये उद्भासित हो उठता है, एक ही क्षणमें आनन्दोल्लाससे सुन्दर दिखायी देता है और फिर क्षणमात्रमें ही अज्ञाना-न्धकारसे व्याप्त हो जाता है, वह शरीररूपी घर मुझे प्रिय नहीं है । जो समस्त रोगोंका घर है, झुर्रियों तथा पके बालोंका नगर है और समस्त मानसिक चिन्ताओंका दुर्गम वन है, वह देह-गेह मुझे प्रिय नहीं है ।
यह शरीर एक भयानक वन है । इन्द्रियाँ ही इस जंगलके भालू हैं, जो अपने रोषके कारण इसे दुर्गम बनाये हुए हैं । यह भीतरसे सूना है तथा अनेकानेक निस्सार खोडरोंसे युक्त है । इसकी दिशारूपी कुंजें घोर अज्ञानान्धकारसे व्याप्त होनेके कारण गहन जान पड़ती हैं; अतः यह मुझे कदापि प्रिय नहीं है । यहाँ धन-सम्पत्ति, राज्य, शरीर, नाना प्रकारकी चेष्टाओं और मनोरथोंसे क्या लेना-देना है; क्योंकि काल कुछ ही दिनोंमें इन सबको अपना ग्रास बना लेता है । मुने ! यह शरीर केवल रक्त और मांसका ही बना हुआ है । इसका एक ही धर्म है—विनाश । फिर इसके बाहरी और भीतरी स्वरूपपर विचार करके बताइये, इसमें कौन-सी रमणीयता है ?
तात ! जो शरीर मरनेके समय जीवका अनुसरण नहीं करते—उसका साथ छोड़ देते हैं, वे कितने बड़े कृतघ्न हैं। फिर आप ही कहिये, उनपर बुद्धिमान् पुरुषोंकी क्या आस्था हो सकती है ? यह शरीर उस कोमल पल्लवके समान है, जो तनिक-सी वायुका संचार
१. दाह और घावसे पीड़ित ।
२. एड़ीके ऊपरकी गाँठ ।
सं० यो० व० अं० ३—