संक्षिप्त योगवासिष्ठ
Sankshipt Yoga Vasistha
महर्षि वाल्मीकि द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें| ४६ | * अविच्छिन्नचिदात्मकः पुमानस्तीह नेतरत् * | [ संक्षिप्त योगवासिष्ठ |
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होते ही जोर-जोरसे हिलने लगता है, यह आधिव्याधिरूपी सैकड़ों कण्टकोंसे क्षत-विक्षत होनेके कारण जर्जर हो जाता है। इसका स्वभाव क्षुद्र है तथा यह कड़वा और नीरस है; अतएव मुझे प्रिय नहीं है। चिरकालतक यत्नपूर्वक खा-पी लेनेके बाद भी नूतन पल्लवोंके समान कोमल कृशताको प्राप्त हो यह बारंबार विनाशकी ओर ही दौड़ता है। दीर्घकालतक लोगोंपर अपना प्रभुत्व स्थापित करके धन-सम्पत्तिका सेवन करनेके बाद भी न तो यह ऊँचे उठता है और न स्थिरताको ही प्राप्त होता है, फिर इस शरीरका किसलिये पालन किया जाता है ? कोई भोग-वैभवसे सम्पन्न हो या दरिद्र—दोनोंका शरीर समान ही होता है, बुढ़ापेके समय बूढ़ा होता और मृत्युकालमें मर जाता है। उसे अपनेमें किसी विशेषताका अनुभव नहीं होता। जो लोग इन नाशवान् शरीरोंमें आस्था रखते हैं—इन्हें नित्य स्थिर रहनेवाला मानते हैं तथा जो संसारकी स्थिरतापर भी विश्वास करते हैं, वे मोहरूपी मदिराका पान करके उन्मत्त हो गये हैं। उन्हें बारंबार धिक्कार है।
मुने ! 'मैं न तो इस शरीरका कोई सम्बन्धी हूँ और न शरीर हूँ। न यह शरीर मेरा है और न मैं ही यह शरीर हूँ।' ऐसा विचार करके जिनका चित्त परमात्मामें विश्राम ले रहा है, वे ही लोग पुरुषोंमें उत्तम हैं। जो मान और अपमानसे वृद्धिको प्राप्त हुई हैं और प्रचुर लाभसे मनोरम प्रतीत होती हैं, वे दोषपूर्ण दृष्टियाँ केवल शरीरमें नित्यत्वका विश्वास रखनेवाले मनुष्यको नष्ट कर देती हैं। जो शरीररूपी गड्ढेमें सोती है और अहंकारका चमत्कारपूर्ण कार्य है, उस मनोहर अङ्गवाली (भोगतृष्णा-मयी दोषदृष्टिरूपिणी) पिशाचीने छलसे हमारा सर्वस्व हर लिया है। शरीरमें ही नित्यताका विश्वास रखनेवाली इस मिथ्या-ज्ञानरूपिणी दुष्ट राक्षसीने अकेली (असहाय) दीन-हीन प्रज्ञा (सुबुद्धि) को पूर्णरूपसे ठग लिया, यह कितने दुःखकी बात है !
कुछ ही दिनोंमें जीर्णताको प्राप्त होकर यह शरीररूपी पल्लव झरनेके जलकी बूँदोंके समान बिना किसी यत्नके अपने आप गिर पड़ता है। समुद्रमें उत्पन्न हुए पानीके बुलबुलोंकी तरह इस शरीरका बहुत शीघ्र विनाश हो जाता है। ब्रह्मन् ! यह शरीर मिथ्याभूत अज्ञानका विकार है और स्वप्नरूपी भ्रान्तियोंका भंडार है। इसका विनाश बहुत स्पष्ट दिखायी देता है। इसलिये इसमें मेरा क्षण-भरके लिये भी विश्वास नहीं है। जिस पुरुषने बिजली, शरद् ऋतुके बादल और गन्धर्व-नगरके चिरस्थायी होनेका निर्णय कर लिया है, वही इस शरीरकी नित्यतापर विश्वास करे (मैं तो नहीं कर सकता)। शीघ्रतापूर्वक नष्ट हो जानेमें हठपूर्वक अपना उत्कर्ष जतानेके लिये जो होड़ लगाकर प्रवृत्त हुए हैं, उन सतत विनाशशील पदार्थोंकी अपेक्षा भी जो अधिक क्षणभङ्गुर है, उस प्रबल दोषयुक्त शरीरकी तिनकेके समान उपेक्षा करके मैं सुखी हो गया हूँ।
(सर्ग १८)
बाल्यावस्थाके दोष
श्रीरामचन्द्रजी कहते हैं—मुनीश्वर ! असमर्थता, आपत्तियाँ, तृष्णा, मूकता (बोल न सकना), मूढ़-बुद्धिता (बुद्धिके द्वारा कुछ जान न पाना), खिलौने आदिकी अभिलाषा, चञ्चलता और दीनता आदि सारे दोष बाल्यावस्थामें ही प्रकट होते हैं। बाल्यावस्थामें पशु-पक्षियोंकी-सी चेष्टाएँ होती हैं। बालक सभी लोगोंके द्वारा तिरस्कृत होता है। बालकोंकी चपल चेष्टा मृत्युसे भी बढ़कर दुःख देनेवाली होती है। बाल्यावस्थामें अज्ञानवश जल, अग्नि और वायुसे निरन्तर उत्पन्न होनेवाले भयके कारण पग-पगपर जो दुःख प्राप्त होता है, वह आपत्तिकालमें भी किसको होता होगा ? बालक भाँति-भाँतिकी लीलाओं, दुर्विलासों, दुश्चेष्टाओं तथा दूषित