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संक्षिप्त योगवासिष्ठ

Sankshipt Yoga Vasistha

महर्षि वाल्मीकि द्वारा

DevanagariHindipublished750 पृष्ठ

क्षमा-प्रार्थना और नम्र निवेदन । ६९९

क्षमा-प्रार्थना और नम्र निवेदन

योगवासिष्ठ महारामायण ग्रन्थका अद्वैत ब्रह्म-प्रतिपादक शास्त्रोंमें बड़े महत्त्वका स्थान है। इसमें बड़ी ही सुन्दर सुबोध युक्तियों, आख्यानों तथा इतिहास-कथाओंके द्वारा जगत्‌की असत्ता एवं एकमात्र सच्चिदानन्दघन परमात्मसत्ताका प्रतिपादन किया गया है। एक ही तत्त्वका प्रतिपादक होनेसे ग्रन्थमें पुनरुक्ति बहुत अधिक है। इस महान् ग्रन्थका सार 'कल्याण' के विशेषाङ्कके रूपमें प्रकाशित करनेके लिये 'कल्याण' के बहुसंख्यक ग्राहकोंका बहुत पुराना आग्रह था। भगवान्‌की कृपासे वह आज पूरा हो रहा है। इसमें तत्त्व-निरूपण तो है ही, साथ-ही-साथ शास्त्रोक्त सदाचार, सत्पुरुष-सङ्ग, त्याग-वैराग्ययुक्त सत्कर्म, वस्तु-विवेक, सद्गुण, आदर्श व्यवहार आदिपर भी बड़ा जोर दिया गया है। 'कल्याण' के सम्मान्य पाठक-पाठिकाओंसे संविनय निवेदन है कि वे अपने जीवनको पवित्र तथा परमात्म-प्राप्तिके योग्य बनानेके लिये इन समस्त सदाचार-सद्गुणोंको विशेषरूपसे ग्रहण करें।

इस महान् ग्रन्थमेंसे सार निकालकर प्रसंग चुननेका सारा कार्य श्रद्धेय श्रीजयदयालजी गोयन्दकाने किया है। सुन्दर अनुवादका कार्य करनेवालोंमें प्रधान हैं—पाण्डेय पं० श्रीरामनारायणदत्तजी शास्त्री 'राम' महोदय और दूसरे हैं पं० श्रीरामाधारंजी शुक्ल शास्त्री। इन्होंने बड़ी ही लगन तथा बुद्धिमानीसे कार्य किया है। यह विशेषाङ्क इन्हीं महानुभावोंके सद्-प्रयासका फल है। हमलोगोंका तो केवल नाममात्र है।

इसमें जो भूलें रही हैं, उनकी सारी जिम्मेवारी हमारी है और उसके लिये हम क्षमाप्रार्थी हैं। सारग्राही महानुभावोंको इसमें जो कुछ श्रेष्ठ, सुन्दर, भूलसे रहित दिखायी दे, कृपया उसीको ग्रहण करें।

कई प्रकारकी अड़चनें आ जानेके कारण सब प्रकरणोंके चित्र नहीं बन पाये, इसलिये विशेषाङ्कमें चित्र प्रसङ्गानुकूल नहीं लग सके हैं। चित्रोंपर प्रकरण तथा सर्ग छपे हैं, उसीसे देख लेनेकी कृपा करें। इन सब त्रुटियोंके लिये भी क्षमा-प्रार्थना है।

'कल्याण' के सभी ग्राहक-ग्राहिका, पाठक-पाठिका, प्रेमी-प्रचारक, 'कल्याण' से प्रीति तथा सहानुभूति रखनेवाले एवं खास करके 'कल्याण' में प्रकाशित साधन, सद्भाव, सदाचार, नियम आदिको सानन्द स्वयं ग्रहण करने तथा जनतामे उसकी उपादेयता बतलाकर उनका प्रसार करनेवाले सभी श्रेणियोंके महानुभाव एवं महिलाएँ हमारे लिये परम आदरणीय हैं। हम उनका हृदयसे अभिवादन करते हैं, और उन्हें 'कल्याण' परिवारके ही माननीय तथा अभिन्न-हृदय सदस्य मानकर उनसे प्रार्थना करते हैं कि 'कल्याण' के प्रति वे अपना अहैतुक प्रेम, अनुग्रह, सद्भाव सदा बढ़ाते रहें। हमारी स्वभाव-सुलभ तथा प्रमादजनित त्रुटियोंको बताते रहें और अपने निर्मल प्रेमसे ही उन्हें दूर भी करें। वे हमें अपनी सद्भावनासे बल देते रहें जिससे हमारे जीवनकी गति भगवान्‌की ओर लगी रहे और हमें उत्तरोत्तर आगे बढ़नेमें सहायता मिले।

हम अपने उन सभी पूज्यचरण पवित्रहृदय, कृपालु, संतो, महात्माओं, आचार्यों, विद्वानों और लेखक तथा कवि महानुभावों तथा पवित्रहृदया माताओंके श्रीचरणोंमें भक्ति-श्रद्धासहित प्रणाम करते हुए, जानते तथा न जानते हुए बने तथा बननेवाले अपराधोंके लिये क्षमा-प्रार्थना करते हुए उनसे शुभाशीर्वाद चाहते हैं। 'कल्याण' के प्रचार-प्रसारमें हम उन्हींको प्रधान कारण मानते हैं; क्योंकि उन्हींके सद्भावों तथा विचारपूर्ण लेखोंसे 'कल्याण' को सदा शक्ति मिलती रहती है।

इस अङ्कके सम्पादन, चित्रनिर्माण, प्रूफ़-संशोधन आदि कार्योंमें जिन-जिनसे हमें सहायता मिली है, उन सभीके प्रति हम अपनी हार्दिक कृतज्ञता प्रकट करते हैं।

इस विशेषाङ्कमें बहुत-से कृपालु लेखक महानुभावोंके लेख स्थानाभावसे नहीं जा सके हैं, उनसे हम सविनय क्षमा चाहते हैं।

प्रार्थी
हनुमानप्रसाद पोद्दार <br> चिम्मनलाल गोस्वामी } सम्पादक

७०० * अविच्छिन्नचिदात्मैकः पुमानस्तीह नेतरः *


जीवन्मुक्तका स्वरूप और आचार

रह न गया जिसमें किंचित् भी, कहीं, कभी ममताका लेश ।
प्राणि-पदार्थ-परिस्थिति देने लगे सभी समता-संदेश ॥
रहा न जिसमें किसी वस्तु-स्थितिका किंचित्-सा भी अभिमान ।
अहंकारके पूर्ण विलयसे हुआ जिसे पर-तत्त्व-ज्ञान ॥

रहता सदा जगत्में, करता काम सभी विधिके अनुसार ।
पर कुछ भी करता न कभी वह, रहता निर्मल निरहंकार ॥
अभिनय करता यथायोग्य वह सुन्दर नाम-रूप अनुसार ।
पर रहता निर्लेप नित्य वह राग-काम-विरहित अविकार ॥

द्वेष, क्रोध, शोक, भय, चिन्ता, ईर्ष्या, मत्सर, हर्षामर्ष ।
छू सकते न कभी उसको सब, हो अपकर्ष, भले उत्कर्ष ॥
सत्य अहिंसा अपरिग्रह अस्तेय अतुल सब विधि संतोष ।
करुण-हृदय संतत सेवा-रत, शुभ गुणमय जीवन निर्दोष ॥

पर-दुखमें दुखिया-सा होकर यथासाध्य सेवा करता ।
पर-सुखमें कर हर्ष प्रकट, अति अमित मोद मनमें भरता ॥
सुखकी नहीं स्पृहा करता, होता न कभी दुखमें उद्विग्न ।
द्वन्द्वरहित वह रहता निज निर्मल स्व-रूप चिन्मयमें मग्न ॥

कभी न होता किसी जीवका उससे किंचित् भी अपकार ।
सदा सभीके हितमें रहती उसकी बुद्धि-विभूति उदार ॥
पर होते आदर्श सभी उसके विशुद्ध सुन्दर व्यवहार ।
जीवन्मुक्त वही अति पावन परम ज्ञान-विग्रह साकार ॥

शम-दम, परहितरति ईश्वर-गुरु-सेवन उसके सहज स्वभाव ।
पर-वैराग्य सहज शुचि रहता, नहीं भोगका किंचित् चाव ॥
नहीं त्यागमें भी होता वह आग्रहवश कदापि अनुरक्त ।
पूर्ण परात्पर सच्चिन्मय आनन्द रूप रहता अविभक्त ॥

करता सहज रूपसे सारे सदाचार संयुत शुभ कर्म ।
नहीं छोड़ता किसी प्रलोभन-भयसे वह अपना सद्धर्म ॥
पर रहता स्वरूपतः वह नित धर्माधर्म-रहित तत्त्वज्ञ ।
नहीं समझ पाते, उसकी अन्तःस्थितिको बाहरसे अज्ञ ॥


**९—भेदके निराकरणपूर्वक एकमात्र ब्रह्मकी ही अखण्ड सत्ताका वर्णन तथा जगत्‌की पृथक्‌ सत्ताका खण्डन ... १११**

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