संस्कार विधि (महर्षि दयानन्द सरस्वती - षोडश वैदिक संस्कार एवं गुरुकुल विधान सटीक)
Sanskar Vidhi of Maharshi Dayananda Saraswati
महर्षि स्वामी दयानन्द सरस्वती द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें८ संस्कारविधिः कृतानीह विधानानि ग्रन्थग्रन्थनतत्परैः। वेदविज्ञानविरहैः स्वार्थिभिः परिमोहितैः ॥ ६ ॥ प्रमाणैस्तान्यनादृत्य क्रियते वेदमानतः। जनानां सुखबोधाय संस्कारविधिरुत्तमः ॥ ७ ॥ बहुभिः सज्जनैस्सम्यङ् मानवप्रियकारकैः। प्रवृत्तो ग्रन्थकरणे क्रमशोऽहं नियोजितः ॥ ८ ॥ दयाया आनन्दो विलसति परो ब्रह्मविदितः सरस्वत्यस्याग्रे निवसति मुदा सत्यनिलया। इयं ख्यातिर्यस्य प्रततसुगुणा हीशशरणाऽ- स्त्यनेनायं ग्रन्थो रचित इति बोद्धव्यमनघाः ॥ ९ ॥ चक्षूरामाङ्कचन्द्रेऽब्दे कार्त्तिकस्यान्तिमे दले। अमायां शनिवारेऽयं ग्रन्थारम्भः कृतो मया ॥ १० ॥ बिन्दुवेदाङ्कचन्द्रेऽब्दे शुचौ मासेऽसिते दले। त्रयोदश्यां रवौ वारे पुनः संस्करणं कृतम् ॥ ११ ॥ ०-० सब संस्कारों के आदि में निम्नलिखित मन्त्रों के पाठ और अर्थ द्वारा एक विद्वान् वा बुद्धिमान् पुरुष ईश्वर की स्तुति- प्रार्थना और उपासना स्थिरचित्त होकर परमात्मा में ध्यान लगाके करे और सब लोग उसमें ध्यान लगाकर सुनें और विचारें—