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संस्कार विधि (महर्षि दयानन्द सरस्वती - षोडश वैदिक संस्कार एवं गुरुकुल विधान सटीक)

संस्कार विधि (महर्षि दयानन्द सरस्वती - षोडश वैदिक संस्कार एवं गुरुकुल विधान सटीक)

Sanskar Vidhi of Maharshi Dayananda Saraswati

महर्षि स्वामी दयानन्द सरस्वती द्वारा

DevanagariHindipublished318 पृष्ठ

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पृष्ठ 101

उपनयनप्रकरणम् ९७ दक्षिण हृदय पर अपना हाथ रखके— ओं मम व्रते ते हृदयं दधामि मम चित्तमनुचित्तं ते अस्तु। मम वाचमेकमना जुषस्व बृहस्पतिष्ट्वा नियुनक्तु मह्यम्॥ आचार्य इस प्रतिज्ञामन्त्र को बोले। अर्थात् ‘हे शिष्य बालक! तेरे हृदय को मैं अपने अधीन करता हूँ। तेरा चित्त मेरे चित्त के अनुकूल सदा रहे .और तू मेरी वाणी को एकाग्र मन हो प्रीति से सुनकर उसके अर्थ का सेवन किया कर और आज से तेरी प्रतिज्ञा के अनुकूल बृहस्पति परमात्मा तुझको मुझसे युक्त करे’। यह प्रतिज्ञा करावे। इसी प्रकार शिष्य भी आचार्य से प्रतिज्ञा करावे कि— ‘हे आचार्य ! आपके हृदय को मैं अपनी उत्तम शिक्षा और विद्या की उन्नति में धारण करता हूँ। मेरे चित्त के अनुकूल आपका चित्त सदा रहे। आप मेरी वाणी को एकाग्र होके सुनिए और परमात्मा मेरे लिए आपको सदा नियुक्त रक्खे’। इस प्रकार दोनों प्रतिज्ञा करके— आचार्योक्तिः—को नामाऽसि ? तेरा नाम क्या है? बालकोक्तिः—[ असौ ] अहम्भोः। मेरा अमुक नाम है। ऐसा उत्तर देवे। आचार्यः—कस्य ब्रह्मचार्यसि? तू किसका ब्रह्मचारी है? बालकः—भवतः। आपका। आचार्य बालक की रक्षा के लिए— इन्द्रस्य ब्रह्मचार्यस्यग्निराचार्यस्तवाहमाचार्यस्तव असौ*॥


  • ‘असौ’ इस पद के स्थान में सर्वत्र बालक का नामोच्चारण करना चाहिए।