संस्कार विधि (महर्षि दयानन्द सरस्वती - षोडश वैदिक संस्कार एवं गुरुकुल विधान सटीक)
Sanskar Vidhi of Maharshi Dayananda Saraswati
महर्षि स्वामी दयानन्द सरस्वती द्वारा
पृष्ठ 100, कुल 318 में से
संदर्भ में पढ़ें९६ संस्कारविधिः बालकसहित आचार्य सभामण्डप में आ, यज्ञकुण्ड की उत्तरबाजू की ओर बैठके— ओं युवा॑ सु॒वासा॒ परिवी॑त॒ आगा॒त् स उ॒ श्रेया॑न् भवति॒ जाय॑मानः॥ इस तथा— ओं सूर्यस्यावृतमन्वावर्त्तस्व, असौ*॥ इस मन्त्र को पढ़े और बालक आचार्य की प्रदक्षिणा करके आचार्य के सम्मुख बैठे। पश्चात् आचार्य बालक के दक्षिण स्कन्धे पर अपने हाथ से स्पर्श और पश्चात् अपने हाथ को वस्त्र से आच्छादित करके— ओं प्राणानां ग्रन्थिरसि मा विस्रसोऽन्तक इदं ते परि- ददामि, अमुम्॥ १॥ इस मन्त्र को बोलने के पश्चात्— ओं अहुर इदं ते परिददामि, अमुम्॥ २॥ इस मन्त्र से उदर पर। और— ओं कृशन इदं ते परिददामि, अमुम्॥ ३॥ इस मन्त्र से हृदय। ओं प्रजापतये त्वा परिददामि, असौ॥ ४॥ इस मन्त्र को बोलके दक्षिण स्कन्ध, और— ओं देवाय त्वा सवित्रे परिददामि, असौ॥ ५॥ इस मन्त्र को बोलके वाम हाथ से बायें स्कन्ध पर स्पर्श करके, बालक के हृदय पर हाथ धरके— ओं तं धीरासः कवय उन्नयन्ति स्वाध्यो३ मनसा देवयन्तः॥ ६॥ इस मन्त्र को बोलके आचार्य संम्मुख रहकर बालक के
- ‘असौ’ और ‘अमुम्’ इन दोनों पदों के स्थान में सर्वत्र बालक का नामोच्चारण करना चाहिए।