संस्कार विधि (महर्षि दयानन्द सरस्वती - षोडश वैदिक संस्कार एवं गुरुकुल विधान सटीक)
Sanskar Vidhi of Maharshi Dayananda Saraswati
महर्षि स्वामी दयानन्द सरस्वती द्वारा
पृष्ठ 99, कुल 318 में से
संदर्भ में पढ़ेंउपनयनप्रकरणम् ९५ शुद्धोदक से भरनी। तत्पश्चात् आचार्य अपनी हस्ताञ्जलि भरके— ओँ तत्स॑वि॒तुर्वृ॑णीमहे व॒यं दे॒वस्य॑ भोर्ज॒नम्। श्रेष्ठं॑ स॒र्व॒धात॑मं तुरं॒ भग॑स्य धीमहि॥४॥ इस मन्त्र को पढ़के आचार्य अपनी अञ्जलि का जल बालक की अञ्जलि में छोड़के, बालक की हस्ताञ्जलि अङ्गुष्ठसहित पकड़के— ओम् देवस्य त्वा सवितुः प्रसवेऽश्विनोर्बाहुभ्यां पूष्णो हस्ताभ्यां हस्तं गृह्णाम्यसौ*। इस मन्त्र को पढ़के बालक की हस्ताञ्जलि का जल नीचे पात्र में छुड़ा देना। इसी प्रकार दूसरी बार, अर्थात् प्रथम आचार्य अपनी अञ्जलि भर, बालक की अञ्जलि में अपनी अञ्जलि का जल भरके, अङ्गुष्ठसहित हाथ पकड़के— ओँ सविता ते हस्तमग्रभीत्, असौ॥ इस मन्त्र से पात्र में छुड़वा दे। पुनः इसी प्रकार तीसरी बार आचार्य अपने हाथ में जल भर, पुनः बालक की अञ्जलि में भर, अङ्गुष्ठसहित हाथ पकड़के— ओम् अग्निराचार्यस्तव, असौ॥ तीसरी बार बालक की अञ्जलि का जल छुड़वाके, बाहर निकल सूर्य के सामने खड़े रह उसे देखके आचार्य— ओँ देव सवितरेष ते ब्रह्मचारी तं गोपाय स मामृत॥ इस एक और पृष्ठ ७९ में लिखे प्रमाणे (तच्चक्षुर्देवहितम्०) इस दूसरे मन्त्र को पढ़के बालक को सूर्यावलोकन करा,
- 'असौ' इस पद के स्थान में बालक का सम्बोधनान्त नामोच्चारण सर्वत्र करना चाहिए।