संस्कार विधि (महर्षि दयानन्द सरस्वती - षोडश वैदिक संस्कार एवं गुरुकुल विधान सटीक)
Sanskar Vidhi of Maharshi Dayananda Saraswati
महर्षि स्वामी दयानन्द सरस्वती द्वारा
पृष्ठ 98, कुल 318 में से
संदर्भ में पढ़ें९४ संस्कारविधिः इन पाँच मन्त्रों से पाँच आज्याहुति दिलानी। उसके पीछे पृष्ठ ३३ में लिखे प्रमाणे व्याहृति आहुति चार और पृष्ठ ३३ में लिखे प्रमाणे स्विष्टकृत् आहुति एक और पृष्ठ ३३ में लिखे प्रमाणे प्राजापत्याहुति एक, ये सब मिलके छह घृत की आहुति देनी। सब मिलके पन्द्रह आहुति बालक के हाथ से दिलानी। उसके पश्चात् आचार्य यज्ञकुण्ड के उत्तर की ओर पूर्वाभिमुख बैठे और बालक आचार्य के सम्मुख पश्चिम में मुख करके बैठे। तत्पश्चात् आचार्य बालक की ओर देखके— ओम् आगन्त्रा समगन्महि प्र सुमर्त्य युयोतन। अरिष्टाः संचरेमहि स्वस्ति चरतादयम्॥ १॥ इस मन्त्र का जप करे। माणवकवाक्यम्—‘‘ओं ब्रह्मचर्यमागामुप मा नयस्व’’। आचार्योक्तिः—‘‘को नामासि¹?’’ बालकोक्तिः—‘‘एतन्नामास्मि²।’’ तत्पश्चात्— ओम् आपो॒ हि ष्ठा म॑यो॒भुव॒स्ता न॑ऽ ऊ॒र्जे द॑धातन। म॒हे रणा॑य॒ चक्ष॑से॥ १॥ यो वः॑ शि॒वत॑मो॒ रस॒स्तस्य॑ भाजयते॒ह नः॑। उ॒श॒तीरि॑व मा॒तरः॑॥ २॥ तस्मा॒ऽ अरं॑ गमाम वो॒ यस्य॒ क्षया॑य॒ जिन्व॑थ। आपो॑ ज॒नय॑था च नः॥ ३॥ इन तीन मन्त्रों को पढ़के बटुक की दक्षिण हस्ताञ्जलि १. तेरा नाम क्या है, ऐसा पूछना। २. मेरा यह नाम है।