संस्कार विधि (महर्षि दयानन्द सरस्वती - षोडश वैदिक संस्कार एवं गुरुकुल विधान सटीक)
Sanskar Vidhi of Maharshi Dayananda Saraswati
महर्षि स्वामी दयानन्द सरस्वती द्वारा
पृष्ठ 97, कुल 318 में से
संदर्भ में पढ़ेंउपनयनप्रकरणम् ९३ यज्ञोपवीतमसि यज्ञस्य त्वा यज्ञोपवीतेनोपनह्यामि ॥ २ ॥ इन मन्त्रों को बोलके आचार्य बायें स्कन्धे के ऊपर कण्ठ के पास से शिर बीच में निकाल, दाहिने हाथ के नीचे बग़ल में निकाल कटि तक धारण करावे। तत्पश्चात् बालक को अपने दाहिने ओर साथ बैठाके ईश्वर की स्तुतिप्रार्थनोपासना, स्वस्तिवाचन और शान्तिकरण का पाठ करके समिदाधान, अग्न्याधान कर (ओम् अदितेऽनुमन्यस्व०) इत्यादि पूर्वोक्त चार मन्त्रों से पूर्वोक्त रीति से कुण्ड के चारों ओर जल छिटका, पश्चात् आज्याहुति करने का आरम्भ करना। वेदी में प्रदीप्त हुई समिधा को लक्ष में धर, चमसा में आज्यस्थाली से घी ले, आघारावाज्यभागाहुति चार और व्याहृति आहुति चार तथा पृष्ठ ३४-३५ में लिखे प्रमाणे आज्याहुति आठ, तीनों मिलके सोलह घृत की आहुति देके, पश्चात् बालक के हाथ से प्रधानहोम, जो विशेष शाकल्य बनाया हो, उसकी आहुतियाँ निम्नलिखित मन्त्रों से दिलानी—(ओं भूर्भुवः स्वः। अग्न आयूंषि०) पृष्ठ ३४ में लिखे प्रमाणे चार आज्याहुति देवें। तत्पश्चात्— ओम् अग्ने व्रतपते व्रतं चरिष्यामि तत्ते प्रब्रवीमि तच्छकेयम्। तेनर्ध्यासमिदमहमनृतात् सत्यमुपैमि स्वाहा ॥ इदमग्नये—इदन्न मम ॥ १ ॥ ओं वायो व्रतपते० * स्वाहा ॥ इदं वायवे—इदन्न मम ॥ २ ॥ ओम् सूर्य व्रतपते० स्वाहा ॥ इदं सूर्याय—इदन्न मम ॥ ३ ॥ ओम् चन्द्र व्रतपते० स्वाहा ॥ इदं चन्द्राय—इदन्न मम ॥ ४ ॥ ओम् व्रतानां व्रतपते० स्वाहा ॥ इदमिन्द्राय व्रतपतये—इदन्न मम ॥ ५ ॥
- इसके आगे 'व्रतं चरिष्यामि' इत्यादि सम्पूर्ण मन्त्र बोलना चाहिए।