संस्कार विधि (महर्षि दयानन्द सरस्वती - षोडश वैदिक संस्कार एवं गुरुकुल विधान सटीक)
Sanskar Vidhi of Maharshi Dayananda Saraswati
महर्षि स्वामी दयानन्द सरस्वती द्वारा
पृष्ठ 104, कुल 318 में से
संदर्भ में पढ़ें१०० संस्कारविधिः ( उद्बुध्य-स्वाग्ने० ) इस मन्त्र से अग्नि को प्रदीप्त करके, प्रदीप्त समिधा पर पृष्ठ ३१ में लिखे प्रमाणे ( ओं अयन्त इध्म० ) इत्यादि चार मन्त्रों से समिदाधान, पृष्ठ ३२ में लिखे प्रमाणे ( ओं अदितेऽनुमन्यस्व० ) इत्यादि तीन मन्त्रों से कुण्ड के तीनों ओर और ( ओम् देव सवितः० ) इस मन्त्र से कुण्ड के चारों ओर जल छिटकाके, पृष्ठ ३२-३३ में लिखे प्रमाणे आघारावाज्य- भागाहुति चार, व्याहृति आहुति चार और पृष्ठ ३४-३५ में लिखे प्रमाणे आज्याहुति आठ मिलके सोलह आज्याहुति देने के पश्चात् प्रधान* होमाहुति दिलाके, पश्चात् पृष्ठ ३३ में लिखे प्रमाणे व्याहृति आहुति चार और स्विष्टकृद् आहुति एक तथा पृष्ठ ३५ में लिखे प्रमाणे प्राजापत्याहुति एक मिलकर छह आज्याहुति बालक के हाथ से दिलानी। तत्पश्चात्— ओम् अग्ने सुश्रवः सुश्रवसं मां कुरु। यथा त्वमग्ने सुश्रवः सुश्रवा असि। एवं मां सुश्रवः सौश्रवसं कुरु। यथा त्वमग्ने देवानां यज्ञस्य निधिपा असि। एवमहं मनुष्याणां वेदस्य निधिपो भूयासम् ॥ इस मन्त्र से वेदी के अग्नि को इकट्ठा करना। तत्पश्चात् बालक कुण्ड की प्रदक्षिणा करके, पृष्ठ ३२ में लिखे प्रमाणे (अदितेऽनुमन्यस्व०) इत्यादि चार मन्त्रों से कुण्ड के सब ओर जलसिंचन करके, बालक कुण्ड के दक्षिण की ओर उत्तराभिमुख खड़ा रहकर, घृत में भिजोके एक समिधा हाथ में ले— ओम् अग्नये समिधमाहार्षं बृहते जातवेदसे। यथा त्वमग्ने समिधा समिध्यसऽ एवमहमायुषा मेधया वर्चसा प्रजया पशुभिर्ब्रह्मवर्चसेन समिन्धे जीवपुत्रो ममाचार्यो मेधाव्यहम-
- 'प्रधान होम' उसको कहते हैं, जो संस्कार में मुख्य करके किया जाता है।