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संस्कार विधि (महर्षि दयानन्द सरस्वती - षोडश वैदिक संस्कार एवं गुरुकुल विधान सटीक)

संस्कार विधि (महर्षि दयानन्द सरस्वती - षोडश वैदिक संस्कार एवं गुरुकुल विधान सटीक)

Sanskar Vidhi of Maharshi Dayananda Saraswati

महर्षि स्वामी दयानन्द सरस्वती द्वारा

DevanagariHindipublished318 पृष्ठ

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पृष्ठ 105

वेदारम्भप्रकरणम् १०१ सान्यनिराकरिष्णुर्यशस्वी तेजस्वी ब्रह्मवर्चस्यन्नादो भूयास ँ स्वाहा ॥ इस मन्त्र से समिधा वेदीस्थ अग्नि के मध्य में छोड़ देना। इसी प्रकार दूसरी ओर तीसरी समिधा छोड़े। पुनः पृष्ठ १०० में लिखे प्रमाणे (ओम् अग्ने सुश्रवः सुश्रवसं०) इस मन्त्र से वेदीस्थ अग्नि को इकट्ठा करके पृष्ठ ३२ में लिखे प्रमाणे (ओम् अदितेऽनुमन्यस्व०) इत्यादि चार मन्त्रों से कुण्ड के सब ओर जलसेचन करके बालक वेदी के पश्चिम में पूर्वाभिमुख बैठके वेदी की अग्नि पर दोनों हाथों को थोड़ा-सा तपाके हाथ में जल लगा— ओं तनूपा अग्नेऽसि तन्वं मे पाहि ॥ १ ॥ ओम् आयुर्दा अग्नेऽस्यायुर्मे देहि ॥ २ ॥ ओं वर्चोदा अग्नेऽसि वर्चो मे देहि ॥ ३ ॥ ओं अग्ने यन्मे तन्वाऽऊनं तन्म आपृण ॥ ४ ॥ ओं मेधां मे देवः सविता आदधातु ॥ ५ ॥ ओं मेधां मे देवी सरस्वती आदधातु ॥ ६ ॥ ओं मेधामश्विनौ देवावाधत्तां पुष्करस्रजौ ॥ ७ ॥ इन सात मन्त्रों से सात बार किञ्चित् हथेली उष्ण कर जल-स्पर्श करके मुख-स्पर्श करना। तत्पश्चात् बालक— ओं वाक् च म आप्यायताम् ॥ इस मन्त्र से मुख। ओं प्राणश्च म आप्यायताम् ॥ इस मन्त्र से नासिका द्वार। ओं चक्षुश्च म आप्यायताम् ॥ इस मन्त्र से दोनों नेत्र। ओं श्रोत्रञ्च म आप्यायताम् ॥ इस मन्त्र से दोनों कान। ओम् यशो बलञ्च म आप्यायताम् ॥ इस मन्त्र से दोनों बाहुओं को स्पर्श करे।