संस्कार विधि (महर्षि दयानन्द सरस्वती - षोडश वैदिक संस्कार एवं गुरुकुल विधान सटीक)
Sanskar Vidhi of Maharshi Dayananda Saraswati
महर्षि स्वामी दयानन्द सरस्वती द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें१०२ संस्कारविधिः ओं मयि मेधां मयि प्रजां मय्यग्निस्तेजो दधातु। मयि मेधां मयि प्रजां मयीन्द्र इन्द्रियं दधातु। मयि मेधां मयि प्रजां मयि सूर्यो भ्राजो दधातु। यत्ते अग्ने .तेजोस्तेनाहं तेजस्वी भूयासम्। यत्ते अग्ने वर्चस्तेनाहं वर्चस्वी भूयासम्। यत्ते अग्ने हरस्तेनाहं हरस्वी भूयासम्॥ इन मन्त्रों से बालक परमेश्वर का उपस्थान करके कुण्ड की उत्तरबाजू की ओर जाके जानू को भूमि में टेकके पूर्वाभिमुख बैठे और आचार्य बालक के सम्मुख पश्चिमाभिमुख बैठे। बालकोक्तिः—अधीहि भो॒: सावित्रीं भो अनुब्रूहि॥ अर्थात् आचार्य से बालक कहे कि—‘हे आचार्य! प्रथम एक ओंकार, पश्चात् तीन महाव्याहृति, तत्पश्चात् सावित्री—ये त्रिक अर्थात् तीनों मिलके परमात्मा के वाचक मन्त्र का मुझे उपदेश कीजिए’। तत्पश्चात् आचार्य एक वस्त्र अपने और बालक के कन्धे पर रखके अपने हाथ से बालक के दोनों हाथों की अंगुलियों को पकड़के नीचे लिखे प्रमाणे बालक को तीन बार करके गायत्री मन्त्रोपदेश करे। प्रथम बार— ओं भूर्भुव॒ः स्व॒ः तत्स॑वि॒तुर्वरे॑ण्यम्। इतना टुकड़ा एक-एक पद का शुद्ध उच्चारण बालक से कराके, दूसरी बार— ओं भूर्भुव॒ः स्व॒ः तत्स॑वि॒तुर्वरे॑ण्यं॒ भर्गो॑ दे॒वस्य॑ धीमहि। एक-एक पद से यथावत् धीरे-धीरे उच्चारण करवाके,