संस्कार विधि (महर्षि दयानन्द सरस्वती - षोडश वैदिक संस्कार एवं गुरुकुल विधान सटीक)
Sanskar Vidhi of Maharshi Dayananda Saraswati
महर्षि स्वामी दयानन्द सरस्वती द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंवेदारम्भप्रकरणम्. १०३ तीसरी बार— ओं भूर्भुव॒: स्व॒: तत्स॑वि॒तुर्वरे॑ण्यं॒ भर्गो॑ दे॒वस्य॑ धीमहि। धियो॒ यो न॑: प्रचो॒दया॑त्॥ धीरे-धीरे इस मन्त्र को बुलवाके संक्षेप से इसका अर्थ भी नीचे लिखे प्रमाणे आचार्य सुनावे— अर्थ:—(ओ३म्) यह मुख्य परमेश्वर का नाम है, जिस नाम के साथ अन्य सब नाम लग जाते हैं। (भू:) जो प्राण का भी प्राण, (भुव:) सब दुःखों से छुड़ानेहारा, (स्व:) स्वयं सुखस्वरूप और अपने उपासकों को सब सुखों की प्राप्ति करानेहारा है, उस (सवितु:) सब जगत् की उत्पत्ति करनेवाले, सूर्यादि प्रकाशकों के भी प्रकाशक, समग्र ऐश्वर्य के दाता, (देवस्य) कामना करने योग्य, सर्वत्र विजय करानेहारे परमात्मा का जो (वरेण्यम्) अतिश्रेष्ठ ग्रहण और ध्यान करने योग्य (भर्ग:) सब क्लेशों को भस्म करनेवाला, पवित्र, शुद्ध स्वरूप है, (तत्) उसे हम लोग (धीमहि) धारण करें। (य:) वह परमात्मा (न:) हमारी (धिय:) बुद्धियों को उत्तम गुण-कर्म- स्वभावों में (प्रचोदयात्) प्रेरित करे। इसी प्रयोजन के लिए इस जगदीश्वर की स्तुतिप्रार्थनोपासना करना और इससे भिन्न किसी को उपास्य, इष्टदेव, उसके तुल्य वा उससे अधिक नहीं मानना चाहिए। इस प्रकार अर्थ सुनाये पश्चात्— ओं मम व्रते ते हृदयं दधामि मम चित्तमनुचित्तं ते अस्तु। मम वाचमेकव्रतो जुषस्व बृहस्पतिष्ट्वा नियुनक्तु मह्यम्॥ इस मन्त्र से बालक और आचार्य पूर्ववत् दृढ़ प्रतिज्ञा करके— ओम् इयं दुरुक्तं परिबाधमाना वर्णं पवित्रं पुनती म आगात्। प्राणापानाभ्यां बलमादधाना स्वसा देवी सुभगा मेखलेयम्॥