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संस्कार विधि (महर्षि दयानन्द सरस्वती - षोडश वैदिक संस्कार एवं गुरुकुल विधान सटीक)

संस्कार विधि (महर्षि दयानन्द सरस्वती - षोडश वैदिक संस्कार एवं गुरुकुल विधान सटीक)

Sanskar Vidhi of Maharshi Dayananda Saraswati

महर्षि स्वामी दयानन्द सरस्वती द्वारा

DevanagariHindipublished318 पृष्ठ

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पृष्ठ 110

१०६ संस्कारविधिः बारह-बारह वर्षपर्यन्त ब्रह्मचर्य अर्थात् ४८ वर्ष तक वा जबतक साङ्गोपाङ्ग चारों वेद पूरे होवें, तबतक अखण्डित ब्रह्मचर्य कर ॥ ६ ॥ आचार्य के अधीन धर्माचरण में रहा कर, परन्तु यदि आचार्य अधर्माचरण वा अधर्म करने का उपदेश करे, उसको तू कभी मत मान और उसका आचरण मत कर ॥ ७ ॥ क्रोध और मिथ्याभाषण करना छोड़ दे ॥ ८ ॥ आठ* प्रकार के मैथुन को छोड़ देना ॥ ९ ॥ भूमि में शयन करना, पलङ्ग आदि पर कभी न सोना ॥ १० ॥ कौशीलव अर्थात् गाना, बजाना, तथा नृत्य आदि निन्दित कर्म, गन्ध और अञ्जन का सेवन मत कर ॥ ११ ॥ अति स्नान, अति भोजन, अधिक निद्रा, अधिक जागरण, निन्दा, लोभ, मोह, भय, शोक का ग्रहण कभी मत कर ॥ १२ ॥ रात्रि के चौथे प्रहर में जाग, आवश्यक शौचादि, दन्तधावन, स्नान, सन्ध्योपासन, ईश्वर की स्तुति-प्रार्थना और उपासना, योगाभ्यास का आचरण नित्य किया कर ॥ १३ ॥ क्षौर मत करा ॥ १४ ॥ मांस, रूखा, शुष्क, अन्न मत खा और मद्यादि मत पी ॥ १५ ॥ बैल, घोड़ा, हाथी, ऊँट आदि की सवारी मत कर ॥ १६ ॥ गाँव में निवास, जूता और छत्र का धारण मत कर ॥ १७ ॥ लघुशङ्का के बिना उपस्थ इन्द्रिय के स्पर्श से वीर्यस्खलन कभी न करके, वीर्य को शरीर में रखके निरन्तर ऊर्ध्वरेता अर्थात् वीर्य को नीचे मत गिरने दे, इस प्रकार यत्न से वर्ता कर ॥ १८ ॥ तैलादि से अङ्गमर्दन, उबटना, अतिखट्टा इमली आदि, अतितीखा लालमिर्ची आदि, कसेला हरड़े आदि, क्षार, अधिक. लवण आदि और रेचक जमालगोटा आदि द्रव्यों क़ा सेवन मत कर ॥ १९ ॥ नित्य युक्ति से आहार-विहार करके विद्या-ग्रहण में यत्नशील हो ॥ २० ॥ सुशील, थोड़ा बोलनेवाला,

  • स्त्री का ध्यान, कथा, स्पर्श, क्रीड़ा, दर्शन, आलिङ्गन, एकान्तवास और समागम, यह आठ प्रकार का मैथुन कहाता है, जो इनको छोड़ देता है, वही ब्रह्मचारी होता है।