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संस्कार विधि (महर्षि दयानन्द सरस्वती - षोडश वैदिक संस्कार एवं गुरुकुल विधान सटीक)

Sanskar Vidhi of Maharshi Dayananda Saraswati

महर्षि स्वामी दयानन्द सरस्वती द्वारा

DevanagariHindipublished318 पृष्ठ

१०६ संस्कारविधिः बारह-बारह वर्षपर्यन्त ब्रह्मचर्य अर्थात् ४८ वर्ष तक वा जबतक साङ्गोपाङ्ग चारों वेद पूरे होवें, तबतक अखण्डित ब्रह्मचर्य कर ॥ ६ ॥ आचार्य के अधीन धर्माचरण में रहा कर, परन्तु यदि आचार्य अधर्माचरण वा अधर्म करने का उपदेश करे, उसको तू कभी मत मान और उसका आचरण मत कर ॥ ७ ॥ क्रोध और मिथ्याभाषण करना छोड़ दे ॥ ८ ॥ आठ* प्रकार के मैथुन को छोड़ देना ॥ ९ ॥ भूमि में शयन करना, पलङ्ग आदि पर कभी न सोना ॥ १० ॥ कौशीलव अर्थात् गाना, बजाना, तथा नृत्य आदि निन्दित कर्म, गन्ध और अञ्जन का सेवन मत कर ॥ ११ ॥ अति स्नान, अति भोजन, अधिक निद्रा, अधिक जागरण, निन्दा, लोभ, मोह, भय, शोक का ग्रहण कभी मत कर ॥ १२ ॥ रात्रि के चौथे प्रहर में जाग, आवश्यक शौचादि, दन्तधावन, स्नान, सन्ध्योपासन, ईश्वर की स्तुति-प्रार्थना और उपासना, योगाभ्यास का आचरण नित्य किया कर ॥ १३ ॥ क्षौर मत करा ॥ १४ ॥ मांस, रूखा, शुष्क, अन्न मत खा और मद्यादि मत पी ॥ १५ ॥ बैल, घोड़ा, हाथी, ऊँट आदि की सवारी मत कर ॥ १६ ॥ गाँव में निवास, जूता और छत्र का धारण मत कर ॥ १७ ॥ लघुशङ्का के बिना उपस्थ इन्द्रिय के स्पर्श से वीर्यस्खलन कभी न करके, वीर्य को शरीर में रखके निरन्तर ऊर्ध्वरेता अर्थात् वीर्य को नीचे मत गिरने दे, इस प्रकार यत्न से वर्ता कर ॥ १८ ॥ तैलादि से अङ्गमर्दन, उबटना, अतिखट्टा इमली आदि, अतितीखा लालमिर्ची आदि, कसेला हरड़े आदि, क्षार, अधिक. लवण आदि और रेचक जमालगोटा आदि द्रव्यों क़ा सेवन मत कर ॥ १९ ॥ नित्य युक्ति से आहार-विहार करके विद्या-ग्रहण में यत्नशील हो ॥ २० ॥ सुशील, थोड़ा बोलनेवाला,

  • स्त्री का ध्यान, कथा, स्पर्श, क्रीड़ा, दर्शन, आलिङ्गन, एकान्तवास और समागम, यह आठ प्रकार का मैथुन कहाता है, जो इनको छोड़ देता है, वही ब्रह्मचारी होता है।

वेदारम्भप्रकरणम् १०७ सभा में बैठनेयोग्य गुण ग्रहण कर॥ २१ ॥ मेखला और दण्ड का धारण, भिक्षाचरण, अग्निहोत्र, स्नान, सन्ध्योपासन, आचार्य का प्रियाचरण, प्रातःसायं आचार्य को नमस्कार करना ये तेरे नित्य करने के कर्म और जो निषेध किये वे नित्य न करने के कर्म हैं॥ २२ ॥ जब पिता यह उपदेश कर चुके, तब बालक पिता को नमस्कार कर, हाथ जोड़के कहे कि—'जैसा आपने उपदेश किया है, मैं वैसा ही करूँगा।' तत्पश्चात् ब्रह्मचारी यज्ञकुण्ड की प्रदक्षिणा करके, कुण्ड के पश्चिम भाग में खड़ा रहके, माता-पिता, भाई-बहिन, मामा, मौसी, चाचा आदि से लेके जो भिक्षा देने में नकार न करें, उनसे भिक्षा* माँगे और जितनी भिक्षा मिले, उसे आचार्य के आगे धर दे। तत्पश्चात् आचार्य उसमें से कुछ थोड़ा-सा अन्न लेके वह सब भिक्षा बालक को दे देवे और वह बालक उस भिक्षा को अपने भोजन के लिए रख छोड़े। तत्पश्चात् बालक को शुभासन पर बैठाके पृष्ठ ३६-३७ में लिखे प्रमाणे महावामदेव्यगान करना। तत्पश्चात् बालक पूर्व रक्खी हुई भिक्षा का भोजन करे। पश्चात् सायंकाल तक विश्राम और गृहाश्रम-संस्कार में लिखा सन्ध्योपासन आचार्य बालक के हाथ से करावे। और पश्चात् ब्रह्मचारीसहित आचार्य कुण्ड के पश्चिम भाग में आसन पर पूर्वाभिमुख बैठे और स्थालीपाक अर्थात् पृष्ठ २८

  • ब्राह्मण का बालक यदि पुरुष से भिक्षा माँगे तो "भवान् भिक्षां ददातु" और जो स्त्री से माँगे तो "भवती भिक्षां ददातु" और क्षत्रिय का बालक "भिक्षां भवान् ददातु" और स्त्री से "भिक्षां भवती ददातु", वैश्य का बालक "भिक्षां ददातु भवान्" और "भिक्षां ददातु भवती" ऐसा वाक्य बोले।

१०८ संस्कारविधिः में लिखे प्रमाणे भात बना, उसमें घी डाल पात्र में रख पृष्ठ ३१ में लिखे प्रमाणे समिदाधान कर, पुनः समिधा प्रदीप्त कर आघारावाज्यभागाहुति चार और व्याहृति आहुति चार दोनों मिलके आठ आज्याहुति देनी। तत्पश्चात् ब्रह्मचारी खड़ा होके पृष्ठ १०० में लिखे प्रमाणे (ओम् अग्ने सुश्रवः) इस मन्त्र से [वेदीस्थ अग्नि को इकट्ठा करके, पृष्ठ १०० में लिखे प्रमाणे (ओम् अग्नये समिध०) इस मन्त्र से तीन समिधाओं की आहुति देवे। तत्पश्चात् बालक बैठके यज्ञकुण्ड को अग्नि से अपना हाथ तपा, पृष्ठ १०१ में लिखे प्रमाणे पूर्ववत् मुख का स्पर्श करके अङ्गस्पर्श करे। तत्पश्चात् पृष्ठ २८ में लिखे प्रमाणे बनाये हुए भात को बालक आचार्य को होम और भोजन के लिए देवे। पुनः आचार्य उस भात में से आहुति के अनुमान भात को स्थाली में लेके, उसमें घी मिला— ओं सद॑स॒स्पति॒मद्भुतं प्रियमिन्द्र॑स्य॒ काम्य॑म्। स॒निं मे॒धाम॑यासिष॒ स्वाहा॑॥ इदं सदसस्पतये इदन्न मम॥ १॥ ओं तत्स॑वि॒तुर्वरे॑ण्यं॒ भर्गो॑ दे॒वस्य॑ धीमहि। धियो॒ यो न॑ः प्रचो॒दया॑त् स्वाहा॑॥ इदं सवित्रे—इदन्न मम॥ २॥ ओम् ऋषिभ्यः स्वाहा॥ इदम् ऋषिभ्यः—इदन्न मम॥ ३॥ इन तीन मन्त्रों से तीन और पृष्ठ ३३ में लिखे प्रमाणे (ओं यदस्य कर्मणो०) इस मन्त्र से चौथी आहुति देवे। तत्पश्चात् पृष्ठ ३३ में लिखे प्रमाणे व्याहृति आहुति चार और पृष्ठ ३४- ३५ में लिखे प्रमाणे (ओं त्वन्नो०) इन आठ मन्त्रों से आठ आज्याहुति मिलके बारह आज्याहुति देके ब्रह्मचारी शुभासन पर

वेदारम्भप्रकरणम् १०९ पूर्वाभिमुख बैठके, पृष्ठ ३६-३७ में लिखे प्रमाणे महावामदेव्यगान आचार्य के साथ करके— 'अमुकगोत्रोत्पन्नोऽहं भो भवन्तमभिवादये ॥' ऐसा वाक्य बोलके आचार्य का वन्दन करे और आचार्य— 'आयुष्मान् विद्यावान् भव सौम्य ॥' ऐसा आशीर्वाद देके, पश्चात् होम से बचे हुए हविष्य अन्न और दूसरे भी सुन्दर मिष्टान्न का भोजन आचार्य के साथ अर्थात् पृथक्-पृथक् बैठके करें। तत्पश्चात् हस्त-मुख प्रक्षालन करके, जो निमन्त्रण से संस्कार में आये हों, उन्हें यथायोग्य भोजन करा, तत्पश्चात् स्त्रियों को स्त्री और पुरुषों को पुरुष प्रीतिपूर्वक विदा करें और सब जने बालक को निम्नलिखित— 'हे बालक ! त्वमीश्वरकृपया विद्वान् शरीरात्मबलयुक्तः कुशली वीर्यवान् अरोगः सर्वा विद्या अधीत्याऽस्मान् दिदृक्षुः सन्नागम्याः ॥' ऐसा आशीर्वाद देके अपने-अपने घर को चले जाएँ। तत्पश्चात् ब्रह्मचारी तीन दिन तक भूमि में शयन, प्रातःसायं पृष्ठ १०० में लिखे प्रमाणे (अग्ने सुश्रवः०) इस मन्त्र से वेदीस्थ अग्नि को इकट्ठा कर, (अग्नये समिध०) इस मन्त्र से समिधा होम और पृष्ठ १०१ में लिखे प्रमाणे मुख आदि अङ्गस्पर्श आचार्य करावे तथा तीन दिन तक पृष्ठ १०८ में लिखे प्रमाणे (सदसस्पति०) इत्यादि चार स्थालीपाक की आहुति पूर्वोक्त रीति से ब्रह्मचारी के हाथ से करवावे और तीन दिन तक क्षार- लवणरहित पदार्थ का भोजन ब्रह्मचारी किया करे। तत्पश्चात् पाठशाला में जाके गुरु के समीप विद्याभ्यास करने के समय की प्रतिज्ञा करे तथा आचार्य भी करे।

११० संस्कारविधिः आ॒चार्य॑ उप॒नय॑मानो ब्रह्मचारिणं॑ कृणुते॒ गर्भ॑म॒न्तः। तं रात्री॑स्ति॒स्र उदरे॑ बिभर्त्ति॒ तं जा॒तं द्रष्टुम॒भिसंय॑न्ति दे॒वाः॥ १॥ इ॒यं समि॒त्पृथिवी द्यौर्द्वितीया॒तान्तरि॑क्षं स॒मिधा॑ पृणाति। ब्र॒ह्म॒चारी स॒मिधा॒ मेख॑लया॒ श्रमे॑ण लो॒काँस्तप॑सा पिपर्ति॥ २॥ ब्र॒ह्म॒चर्ये॑ति समिधा॒ समि॑द्धः काष्णं॑ वसा॑नो दीक्षि॒तो दी॒र्घश्म॑श्रुः। स स॒द्य ए॑ति॒ पूर्व॑स्मा॒दुत्तरं॑ समु॒द्रं लो॒कान्त्सं॒गृह्य॑ मुहु॑रा॒चरि॑क्रत्॥ ३॥ ब्र॒ह्म॒चर्ये॑ण॒ तप॑सा राजा॑ रा॒ष्ट्रं वि र॑क्षति। आ॒चार्यो॑ ब्र॒ह्म॒चर्ये॑ण ब्रह्मचारिण॑मिच्छते॥ ४॥ ब्र॒ह्म॒चर्ये॑ण क॒न्या॒३॑ युवानं॑ विन्दते॒ पति॑म्॥ ५॥ ब्र॒ह्म॒चारी ब्रह्म॒ भ्राज॑द्विभर्त्ति॒ तस्मि॒न् दे॒वा अधि॒ विश्वे॑ स॒मोताः॑। प्रा॒णा॒पा॒नौ ज॒नय॒न्नाद् व्या॒नं वाचं॑ म॒नो हृद॑यं॒ ब्रह्म॑ मे॒धाम्॥ ६॥ —अथर्व० कां० ११। सू० ५॥ संक्षेप से भाषार्थः—आचार्य ब्रह्मचारी को प्रतिज्ञापूर्वक समीप रखके तीन रात्रिपर्यन्त गृहाश्रम के प्रकरण में लिखे सन्ध्योपासनादि सत्पुरुषों के आचार की शिक्षा कर, उसके आत्मा के भीतर गर्भरूप विद्या स्थापन करने के लिए उसे धारण कर और पूर्ण विद्वान् बना देता है और जब वह पूर्ण ब्रह्मचर्य और विद्या को पूर्ण करके घर को आता है, तब उसे देखने के लिए सब विद्वान् लोग सम्मुख जाकर बड़ा मान्य करते हैं॥ १॥ जो यह ब्रह्मचारी वेदारम्भ के समय तीन समिधा अग्नि में होमकर, ब्रह्मचर्य के व्रत का नियमपूर्वक सेवन करके, विद्या पूर्ण करने को दृढ़ोत्साही होता है, वह जानो पृथिवी, सूर्य और अन्तरिक्ष के सदृश सबका पालन करता है, क्योंकि वह

वेदारम्भप्रकरणम् १११ समिदाधान, मेखलादि चिह्नों का धारण और परिश्रम से विद्या पूर्ण करके, इस ब्रह्मचर्यानुष्ठानरूप तप से सब लोगों को सद्गुण और आनन्द से तृप्त कर देता है॥ २ ॥ जब विद्या से प्रकाशित और मृगचर्मादि धारण कर दीक्षित होके दीर्घश्मश्रुः=४० वर्ष तक दाढ़ी, मूँछ आदि पञ्च केशों का धारण करनेवाला ब्रह्मचारी होता है, वह पूर्व समुद्ररूप ब्रह्मचर्यानुष्ठान को पूर्ण करके गुरुकुल से उत्तर समुद्र अर्थात् गृहाश्रम को शीघ्र प्राप्त होता है। वह सब लोकों का संग्रह करके बारम्बार पुरुषार्थ और जगत् को सत्योपदेश से आनन्दित कर देता है॥ ३॥ वही राजा उत्तम होता है, जो पूर्ण ब्रह्मचर्यरूप तपश्चरण से पूर्ण विद्वान्, सुशिक्षित, सुशील, जितेन्द्रिय होकर राज्य का विविध प्रकार से पालन करता है और वही विद्वान् ब्रह्मचारी की इच्छा करता और आचार्य हो सकता है, जो यथावत् ब्रह्मचर्य से सम्पूर्ण विद्याओं को पढ़ता है॥ ४ ॥ जैसे लड़के पूर्ण ब्रह्मचर्य और पूर्ण विद्या पढ़, पूर्ण जवान होके अपने सदृश कन्या से विवाह करें, वैसे कन्या भी अखण्ड ब्रह्मचर्य से पूर्ण विद्या पढ़, पूर्ण युवति हो, अपने तुल्य पूर्ण युवावस्थावाले पति को प्राप्त होवे॥ ५॥ जब ब्रह्मचारी ब्रह्म अर्थात् साङ्गोपाङ्ग चारों वेदों को शब्द, अर्थ और सम्बन्ध के ज्ञानपूर्वक धारण करता है, तभी प्रकाशमान होता, उसमें सम्पूर्ण दिव्य गुण निवास करते और सब विद्वान् उससे मित्रता करते हैं। वह ब्रह्मचारी ब्रह्मचर्य ही से प्राण, दीर्घजीवन, दुःख-क्लेशों का नाश, सम्पूर्ण विद्याओं में व्यापकता, उत्तम वाणी, पवित्र आत्मा, शुद्ध हृदय, परमात्मा और श्रेष्ठ प्रजा को धारण करके, सब मनुष्यों के हित के लिए सब विद्याओं का प्रकाश करता है॥ ६॥

१९२ संस्कारविधिः ब्रह्मचर्यकालः इसमें छान्दोग्योपनिषद् के तृतीय प्रपाठक के सोलहवें खण्ड का प्रमाण— मातृमान् पितृमानाचार्यवान् पुरुषो वेद ॥ १ ॥ पुरुषो वाव यज्ञस्तस्य यानि चतुर्विँशतिर्वर्षाणि तत् प्रातःसवनं चतुर्विँशत्यक्षरा गायत्री गायत्रं प्रातःसवनं तदस्य वसवोऽन्वायत्ताः प्राणा वाव वसव एते हीदँसर्वं वासयन्ति ॥ २ ॥ तं चेदेतस्मिन् वयसि किञ्चिदुपतपेत् स ब्रूयात् प्राणा वसव इदं मे प्रातःसवनं माध्यन्दिनँसवनमनुसन्तनुतेति माहं प्राणानां वसूनां मध्ये यज्ञो विलोप्सीयेत्युद्धैव तत एत्यगदो ह भवति ॥ ३ ॥ अथ यानि चतुश्चत्वारिँशद्वर्षाणि तन्माध्यन्दिनँ सवनं चतुश्चत्वारिँशदक्षरा त्रिष्टुप् त्रैष्टुभं माध्यन्दिनँ सवनं तदस्य रुद्रा अन्वायत्ताः प्राणा वाव रुद्रा एते हीदँ सर्वँ रोदयन्ति ॥ ४ ॥ तं चेदेतस्मिन् वयसि किञ्चिदुपतपेत् स ब्रूयात् प्राणा रुद्रा इदं मे माध्यन्दिनँ सवनं तृतीयसवनमनुसन्तनुतेति माहं प्राणानाँ रुद्राणां मध्ये यज्ञो विलोप्सीयेत्युद्धैव तत एत्यगदो ह भवति ॥ ५ ॥ अथ यान्यष्टाचत्वारिँशद्वर्षाणि तत् तृतीयसवनमष्टा- चत्वारिँ शदक्षरा जगती जागतं तृतीयसवनं तदस्यादित्या अन्वायत्ताः प्राणा वावादित्या एते हीदँसर्वमाददते ॥ ६ ॥

वेदारम्भप्रकरणम् ११३ तं चेदेतस्मिन् वयसि किञ्चिदुपतपेत् स ब्रूयात् प्राणा आदित्या इदं मे तृतीयसवनमायुरनुसन्तनुतेति माहं प्राणानामादित्यानां मध्ये यज्ञो विलोप्सीयेत्युद्धैव तत एत्यगदो हैव भवति ॥ ७ ॥ अर्थ:—जब बालक को पाँच वर्ष की आयु तक माता, पाँच ये आठ तक पिता, आठ से अड़तालीस, चवालीस, चालीस, छत्तीस, तीस तक अथवा पच्चीस वर्ष तक, तथा कन्या को आठ से चौबीस, बाईस, बीस, अठारह, अथवा सोलह वर्ष तक आचार्य की शिक्षा प्राप्त हो, तभी वे विद्यावान् होकर धर्म-अर्थ-काम-मोक्ष के व्यवहारों में अतिचतुर होते हैं ॥ १ ॥ इस मनुष्य-देह को यज्ञ अर्थात् इसे अच्छे प्रकार आयु, बल आदि से सम्पन्न करने के लिए छोटे-से-छोटा पक्ष यह है कि पुरुष चौबीस वर्षपर्यन्त ब्रह्मचर्य और सोलह वर्ष तक कन्या यथावत् पूर्ण ब्रह्मचर्याश्रम करे। जैसे चौबीस अक्षर का गायत्री छन्द होता है, वैसे करे, वह प्रातःसवन कहाता है। जिससे इस मनुष्य-देह के मध्य वसुरूप प्राण प्राप्त होते हैं, जो बलवान् होकर सब शुभ गुणों को शरीर, आत्मा और मन के बीच वास कराते हैं ॥ २ ॥ जो कोई इस पच्चीस वर्ष के आयु से पूर्व ब्रह्मचारी को विवाह वा विषयभोग करने का उपदेश करे, उसको वह ब्रह्मचारी यह उत्तर देवे कि—देख ! यदि मेरे प्राण, मन और इन्द्रिय पच्चीस वर्ष तक ब्रह्मचर्य से बलवान् न हुए तो मध्यम सवन जोकि आगे चवालीस वर्ष तक का ब्रह्मचर्य कहा है, उसको पूर्ण करने के लिए मुझमें सामर्थ्य न हो सकेगा। प्रथम कोटि का ब्रह्मचर्य मध्यम कोटि के ब्रह्मचर्य को सिद्ध करता है, इसलिए क्या

१९४ संस्कारविधिः मैं तुम्हारे सदृश मूर्ख हूँ जो इस शरीर, प्राण, अन्तःकरण और आत्मा के संयोगरूप सब शुभ गुण-कर्म और स्वभाव के साधन करनेवाले इस संघात को शीघ्र नष्ट करके अपने मनुष्य-देह धारण के फल से विमुख रहूँ? और सब आश्रमों के मूल, सब उत्तम कर्मों में उत्तम कर्म और सबके मुख्य कारण ब्रह्मचर्य को खण्डित करके महादुःखसागर में कभी डूबूँ? किन्तु जो प्रथम आयु में ब्रह्मचर्य करता है, वह ब्रह्मचर्य के सेवन से विद्या को प्राप्त होके निश्चित रोगरहित होता है। इसलिए तुम मूर्ख लोगों के कहने से ब्रह्मचर्य का लोप मैं कभी न करूँगा ॥ ३ ॥ और जो चवालीस वर्ष तक, अर्थात् जैसा चवालीस अक्षर का त्रिष्टुप् छन्द होता है, तद्वत् जो मध्यम ब्रह्मचर्य करता है, वह ब्रह्मचारी रुद्ररूप प्राणों को प्राप्त होता है कि जिसके आगे किसी दुष्ट की दुष्टता नहीं चलती और वह सब दुष्ट कर्म करनेवालों को सदा रुलाता रहता है ॥ ४ ॥ यदि मध्यम ब्रह्मचर्य के सेवन करनेवाले से कोई कहे कि तू इस ब्रह्मचर्य को छोड़ विवाह करके आनन्द को प्राप्त हो, उसको वह ब्रह्मचारी यह उत्तर देवे कि—जो सुख अधिक ब्रह्मचर्याश्रम के सेवन से होता और विषय-सम्बन्धी भी अधिक आनन्द होता है, वह ब्रह्मचर्य को न करने से स्वप्न में भी प्राप्त नहीं होता, क्योंकि सांसारिक व्यवहार, विषय और परमार्थ- सम्बन्धी पूर्ण सुख को ब्रह्मचारी ही प्राप्त होता है, अन्य कोई नहीं। इसलिए मैं इस सर्वोत्तम सुख-प्राप्ति के साधन ब्रह्मचर्य का लोप न करके विद्वान्, बलवान्, आयुष्मान्, धर्मात्मा होके सम्पूर्ण आनन्द को प्राप्त होऊँगा। तुम्हारे निर्बुद्धियों के कहने से शीघ्र विवाह करके स्वयं और अपने कुल को नष्ट-भ्रष्ट कभी न करूँगा ॥ ५ ॥ अब अड़तालीस वर्षपर्यन्त, जैसाकि अड़तालीस अक्षर का जगती छन्द होता है, वैसे इस उत्तम ब्रह्मचर्य से पूर्णविद्या,

वेदारम्भप्रकरणम् १९५ पूर्णबल, पूर्णप्रज्ञा, पूर्ण शुभ गुण-कर्म-स्वभावयुक्त, सूर्यवत् प्रकाशमान होकर ब्रह्मचारी सब विद्याओं को ग्रहण करता है॥६॥ यदि कोई इस सर्वोत्तम धर्म से गिराना चाहे, उससे ब्रह्मचारी उत्तर देवे कि—अरे छोकरों के छोकरे ! मुझसे दूर रहो। तुम्हारे दुर्गन्धरूप भ्रष्ट वचनों से मैं दूर रहता हूँ। मैं इस उत्तम ब्रह्मचर्य का लोप कभी न करूँगा। इसको पूर्ण करके सर्वरोगों से रहित, सर्वविद्यादि शुभ गुण-कर्म-स्वभावसहित होऊँगा। इस मेरी शुभ प्रतिज्ञा को परमात्मा अपनी कृपा से पूर्ण करे। जिससे मैं तुम निर्बुद्धियों को उपदेश और विद्या पढ़ाके विशेष तुम्हारे बालकों को आनन्दयुक्त कर सकूँ ॥७॥ चतस्रोऽवस्थाः शरीरस्य वृद्धियौवनं सम्पूर्णता किञ्चित् परिहाणिश्चेति। तत्राषोडशाद् वृद्धिः। आपञ्च- विंशतेर्यौवनम्। आचत्वारिंशतस्सम्पूर्णता। ततः किञ्चित् परिहाणिश्चेति ॥ १ ॥ पञ्चविंशे ततो वर्षे पुमान्नारी तु षोडशे। समत्वागतवीर्यौ तौ जानीयात् कुशलो भिषक् ॥ २ ॥ यह धन्वन्तरिजीकृत सुश्रुतग्रन्थ का प्रमाण है॥ अर्थः—इस मनुष्य देह की चार अवस्थाएँ हैं—एक वृद्धि, दूसरी यौवन, तीसरी सम्पूर्णता, चौथी किञ्चित्परिहाणि। इनमें सोलहवें वर्ष तक वृद्धि होती है। जो कोई इस वृद्धि की अवस्था में वीर्यादि धातुओं का नाश करेगा, वह कुल्हाड़े से काटे वृक्ष वा डण्डे से फूटे घड़े के समान अपने सर्वस्व का नाश करके पश्चात्ताप करेगा। पुनः उसके हाथ में सुधार कुछ भी न रहेगा। दूसरी युवावस्था पच्चीसवें वर्ष तक होती है। जो कोई इसको यथावत् संरक्षित न करेगा, वह अपनी भाग्यशीलता को नष्ट कर देवेगा। तीसरी पूर्ण युवावस्था चालीसवें वर्ष में होती है।

१९६ संस्कारविधिः जो कोई ब्रह्मचारी होकर पुनः ऋतुगामी, पर-स्त्रीत्यागी, एकस्त्रीव्रत, गर्भ रहे पश्चात् एक वर्षपर्यन्त ब्रह्मचारी न रहेगा, वह भी बना- बनाया धूल में मिल जाएगा और चौथी चालीसवें वर्ष से यावत् निर्वीर्य न हो, तवात् किञ्चित् हानिरूप अवस्था है। जो किञ्चित् हानि के बदले वीर्य की अधिक हानि करेगा, वह राजयक्ष्मा और भगन्दरादि रोगों से पीड़ित हो जाएगा और जो इन चारों अवस्थाओं को यथोक्त सुरक्षित रक्खेगा, वह सदा आनन्दित होकर सब संसार को सुखी कर सकेगा ॥ १ ॥ अब इसमें इतना विशेष समझना चाहिए कि स्त्री और पुरुष के शरीर में पूर्वोक्त चारों अवस्थाओं का एक-सा समय नहीं है, किन्तु जितना सामर्थ्य पच्चीसवें वर्ष में पुरुष के शरीर में होता है उतना सामर्थ्य स्त्री के शरीर में सोलहवें वर्ष में हो जाता है। यदि बहुत शीघ्र विवाह करना चाहे तो २५ वर्ष का पुरुष और १६ वर्ष की कन्या दोनों तुल्य सामर्थ्यवाले होते हैं। इसलिए इस अवस्था में जो विवाह करना, वह अधम विवाह है और जो सत्रहवें वर्ष की कन्या और ३० वर्ष का पुरुष, अठारह वर्ष की कन्या और ३६ वर्ष का पुरुष, उन्नीस वर्ष की कन्या और ३८ वर्ष का पुरुष विवाह करे तो इसको मध्यम समय जानो और जो बीस, इक्कीस, बाईस, तेईस वा चौबीस वर्ष की स्त्री और चालीस, बयालीस, चवालीस, छयालीस और अड़तालीस वर्ष का पुरुष होकर विवाह करे, वह सर्वोत्तम है। हे ब्रह्मचारिन्! इन बातों को तू ध्यान में रख, जोकि तुझे आगे के आश्रमों में काम आवेंगी। जो मनुष्य अपने सन्तान, कुल, सम्बन्धी और देश की उन्नति करना चाहें, वे इन पूर्वोक्त और आगे कही हुई बातों का यथावत् आचरण करें ॥ २ ॥ श्रोत्रं त्वक् चक्षुषी जिह्वा नासिका चैव पञ्चमी । पायूपस्थं हस्तपादं वाक् चैव दशमी स्मृता ॥ १ ॥

३. उपनयन (यज्ञोपवीत) एवं वेदारम्भ संस्कार (गुरुकुल प्रवेश एवं ब्रह्मचर्य नियम)

वेदारम्भप्रकरणम् ११७ बुद्धीन्द्रियाणि पञ्चैषां श्रोत्रादीन्यनुपूर्वशः। कर्मेन्द्रियाणि पञ्चैषां पाय्वादीनि प्रचक्षते ॥२॥ एकादशं मनो ज्ञेयं स्वगुणेनोभयात्मकम्। यस्मिन् जिते जितावेतौ भवतः पञ्चकौ गणौ ॥३॥ इन्द्रियाणां विचरतां विषयेष्वपहारिषु। संयमे यत्नमातिष्ठेद् विद्वान् यन्तेव वाजिनाम् ॥४॥ इन्द्रियाणां प्रसङ्गेन दोषमृच्छत्यसंशयम्। संनियम्य तु तान्येव ततः सिद्धिं नियच्छति ॥५॥ वेदास्त्यागश्च यज्ञाश्च नियमाश्च तपांसि च। न विप्रभावदुष्टस्य सिद्धिं गच्छन्ति कर्हिचित् ॥६॥ वशे कृत्वेन्द्रियग्रामं संयम्य च मनस्तथा। सर्वान् संसाधयेदर्थानक्षिण्वन् योगतस्तनुम् ॥७॥ यमान्सेवेत सततं न नियमान्केवलान्बुधः। यमान्पतत्यकुर्वाणो नियमान्केवलान्भजन् ॥८॥ अभिवादनशीलस्य नित्यं वृद्धोपसेविनः। चत्वारि तस्य वर्द्धन्त आयुर्विद्या यशो बलम् ॥९॥ अज्ञो भवति वै बालः पिता भवति मन्त्रदः। अज्ञं हि बालमित्याहुः पितेत्येव तु मन्त्रदम् ॥१०॥ न हायनैर्न पलितैर्न वित्तेन न बन्धुभिः। ऋषयश्चक्रिरे धर्मं योऽनूचानः स नो महान् ॥११॥ न तेन वृद्धो भवति येनास्य पलितं शिरः। यो वै युवाप्यधीयानस्तं देवाः स्थविरं विदुः ॥१२॥ यथा काष्ठमयो हस्ती यथा चर्ममयो मृगः। यश्च विप्रोऽनधीयानस्त्रयस्ते नाम बिभ्रति ॥१३॥

११८ संस्कारविधिः सम्मानाद् ब्राह्मणो नित्यमुद्विजेत विषादिव । अमृतस्येव चाकाङ्क्षेदवमानस्य सर्वदा ॥ १४ ॥ वेदमेव सदाभ्यस्येत् तपस्तप्स्यन् द्विजोत्तमः । वेदाभ्यासो हि विप्रस्य तपः परमिहोच्यते ॥ १५ ॥ योऽनधीत्य द्विजो वेदमन्यत्र कुरुते श्रमम् । स जीवन्नेव शूद्रत्वमाशु गच्छति सान्वयः ॥ १६ ॥ यथा खनन् खनित्रेण नरो वार्य्यधिगच्छति । तथा गुरुगतां विद्यां शुश्रूषुरधिगच्छति ॥ १७ ॥ श्रद्दधानः शुभां विद्यामाददीतावरादपि । अन्त्यादपि परं धर्मं स्त्रीरत्नं दुष्कुलादपि ॥ १८ ॥ विषादप्यमृतं ग्राह्यं बालादपि सुभाषितम् । विविधानि च शिल्पानि समादेयानि सर्वतः ॥ १९ ॥ —मनु० ॥ अर्थः—कान, त्वचा, नेत्र, जीभ, नासिका, गुदा, उपस्थ (मूत्र का मार्ग) हाथ, पग, वाणी—ये दस इन्द्रियाँ इस शरीर में हैं ॥ १ ॥ इनमें कान आदि पाँच ज्ञानेन्द्रिय और गुदा आदि पाँच कर्मेन्द्रिय कहाते हैं ॥ २ ॥ ग्यारहवाँ इन्द्रिय मन है। वह अपने स्मृति आदि गुणों से दोनों प्रकार के इन्द्रियों से सम्बन्ध करता है कि जिस मन के जीतने में ज्ञानेन्द्रिय तथा कर्मेन्द्रिय दोनों जीत लिये जाते हैं ॥ ३ ॥ जैसे सारथि घोड़े को कुपथ में नहीं जाने देता, वैसे विद्वान् ब्रह्मचारी आकर्षण करनेवाले विषयों में जाते हुए इन्द्रियों को रोकने में सदा प्रयत्न किया करे ॥ ४ ॥ ब्रह्मचारी इन्द्रियों के साथ मन लगाने से निःसन्देह दोषी हो जाता है और उन पूर्वोक्त १० इन्द्रियों को वश में करके

वेदारम्भप्रकरणम् ११९ ही पश्चात् सिद्धि को प्राप्त होता है॥५॥ जिसका ब्राह्मणपन (सम्मान नहीं चाहना वा इन्द्रियों को वश में रखना आदि) बिगड़ा वा जिसका विशेष प्रभाव (वर्णाश्रम के गुण-कर्म) बिगड़े हैं, उस पुरुष के वेद पढ़ना, त्याग (संन्यास) लेना, यज्ञ (अग्निहोत्रादि) करना, नियम (ब्रह्मचर्याश्रम आदि) करना, तप (निन्दा-स्तुति और हानि-लाभ आदि द्वन्द्वों का सहन) करना आदि कर्म कदापि सिद्ध नहीं हो सकते। इसलिए ब्रह्मचारी को चाहिए कि अपने नियम-धर्मों का यथावत् पालन करके सिद्धि को प्राप्त होवे॥६॥ ब्रह्मचारी पुरुष सब इन्द्रियों को वश में कर और आत्मा के साथ मन को संयुक्त करके योगाभ्यास से शरीर को किञ्चित्- किञ्चित् पीड़ा देता हुआ अपने सब प्रयोजनों को सिद्ध करे॥७॥ बुद्धिमान् ब्रह्मचारी को चाहिए कि यमों का सेवन नित्य करे, केवल नियमों का नहीं, क्योंकि यमों१ को न करता हुआ और केवल नियमों२ का सेवन करता हुआ भी अपने कर्त्तव्य से पतित हो जाता है। इसलिए यमसेवनपूर्वक नियमसेवन नित्य किया करे॥८॥ अभिवादन करने का जिसका स्वभाव और विद्या वा अवस्था में वृद्ध पुरुषों का जो नित्य सेवन करता है, उसकी अवस्था, विद्या, कीर्ति और बल इन चारों की नित्य उन्नति हुआ करती हैं। इसलिए ब्रह्मचारी को चाहिए कि आचार्य, माता- १. अहिंसासत्यास्तेयब्रह्मचर्यापरिग्रहा यमाः। निर्वैरता, सत्य बोलना, चोरीत्याग, वीर्यरक्षण और विषयभोग में घृणा से ५ यम हैं। २. शौचसन्तोषतपःस्वाध्यायेश्वरप्रणिधानानि नियमाः। शौच, सन्तोष, तप (हानि लाभ आदि द्वन्द्व का सहना) स्वाध्याय (वेद का पढ़ना), ईश्वरप्रणिधान (सर्वस्व ईश्वरार्पण) ये पाँच नियम कहाते हैं।

१२० संस्कारविधिः पिता, अतिथि, महात्मा आदि अपने बड़ों को नित्य नमस्कार और उनका सेवन किया करे ॥९॥ अज्ञ अर्थात् जो कुछ नहीं पढ़ा, वह निश्चय करके बालक होता और जो मन्त्रद, अर्थात् दूसरे को विचार देनेवाला, विद्या पढ़ा, विद्याविचार में निपुण है, वह पिता-स्थानीय होता है, क्योंकि जिस कारण सत्पुरुषों ने अज्ञ जन को बालक कहा और मन्त्रद को पिता ही कहा है, इससे प्रथम ब्रह्मचर्याश्रम सम्पन्न होकर ज्ञानवान्, विद्यावान् अवश्य होना चाहिए ॥१०॥ धर्मवेत्ता ऋषिजनों ने न वर्षों, न पके केशों, वा झूलते हुए अङ्गों, न धन और न बन्धुजनों से बड़प्पन माना, किन्तु यही धर्म निश्चय किया कि जो हम लोगों में वाद-विवाद में उत्तर देनेवाला, अर्थात् वक्ता हो वह बड़ा है। इससे ब्रह्मचर्याश्रम- सम्पन्न होकर विद्यावान् होना चाहिए। जिससे कि संसार में बड़प्पन, प्रतिष्ठा पावें और दूसरों को उत्तर देने में अति निपुण हों ॥११॥ उस कारण से वृद्ध नहीं होता कि जिससे इसका शिर झूल जाए, केश पक जावें, किन्तु जो जवान भी पढ़ा हुआ विद्वान् है, उसको विद्वानों ने वृद्ध जाना और माना है। इससे ब्रह्मचर्याश्रम-सम्पन्न होकर विद्या पढ़नी चाहिए ॥१२॥ जैसे काठ का कठपूतला हाथी वा जैसे चमड़े का बनाया हुआ मृग हो, वैसे बिना पढ़ा हुआ विप्र, अर्थात् ब्राह्मण वा बुद्धिमान् जन होता है । उक्त वे हाथी, मृग और विप्र तीनों नाममात्र धारण करते हैं। इस कारण ब्रह्मचर्याश्रम-सम्पन्न होकर विद्या पढ़नी चाहिए ॥१३॥ ब्राह्मण विष के समान उत्तम मान से नित्य उदासीनता रक्खे और अमृत के समान अपमान की आकांक्षा सर्वदा करे, अर्थात् ब्रह्मचर्यादि आश्रमों के लिए भिक्षामात्र माँगते भी कभी मान की इच्छा न करे ॥१४॥

वेदारम्भप्रकरणम् १२१ द्विजोत्तम अर्थात् ब्राह्मणादिकों में उत्तम, सज्जन पुरुष सर्वकाल तपश्चर्या करता हुआ वेद ही का अभ्यास करे । जिस कारण ब्राह्मण वा बुद्धिमान् जन को वेदाभ्यास करना इस संसार में परम तप कहा है, इससे ब्रह्मचर्याश्रम-सम्पन्न होकर अवश्य वेदविद्याध्ययन करे ॥ १५ ॥ जो ब्रह्मण-क्षत्रिय और वैश्य वेद को न पढ़कर अन्य शास्त्रों में श्रम करता है, वह जीवता ही अपने वंश के सहित शूद्रपन को प्राप्त हो जाता है । इससे ब्रह्मचर्याश्रम-सम्पन्न होकर वेदविद्या अवश्य पढ़े ॥ १६ ॥ जैसे फावड़े से खोदता हुआ मनुष्य जल को प्राप्त होता है, वैसे गुरु की सेवा करनेवाला पुरुष गुरुजनों ने जो पाई हुई विद्या है, उसको प्राप्त होता है । इस कारण ब्रह्मचर्याश्रम-सम्पन्न होकर गुरुजन की सेवा कर उनसे सुने और वेद पढ़े ॥ १७ ॥ उत्तम विद्या की श्रद्धा करता हुआ पुरुष अपने से न्यून से भी विद्या पावे तो ग्रहण करे । नीच जाति से भी उत्तम धर्म का ग्रहण करे और निन्द्य कुल से भी स्त्रियों में उत्तम स्त्री का ग्रहण करे, यह नीति है । इससे गृहस्थाश्रम से पूर्व-पूर्व ब्रह्मचर्याश्रम-सम्पन्न होकर कहीं से न कहीं से उत्तम विद्या पढ़े, उत्तम धर्म सीखे और ब्रह्मचर्य के अनन्तर गृहाश्रम में उत्तम स्त्री से विवाह करे, क्योंकि ॥ १८ ॥ विष से भी अमृत का ग्रहण करना, बालक से भी उत्तम वचन को लेना और नाना प्रकार के शिल्प काम—सबसे अच्छे प्रकार ग्रहण करने चाहिएँ । इस कारण ब्रह्मचर्याश्रम-सम्पन्न होकर देश-देश पर्यटन कर उत्तम गुण सीखे ॥ १९ ॥ यान्यनवद्यानि कर्माणि तानि सेवितव्यानि, नो इतराणि । यान्यस्माकꣳसुचरितानि तानि त्वयोपास्यानि, नो इतराणि । एके चास्मच्छ्रेयाꣳसो ब्राह्मणाः, तेषां त्वयासनेन प्रश्व- सितव्यम् ॥ १ ॥ —तैत्तिरी० प्रपा० ७। अनु० ११ ॥

१२२ संस्कारविधिः ऋतं तपः सत्यं तपः श्रुतं तपः शान्तं तपो दमस्त- पश्शमस्तपो दानं तपो यज्ञस्तपो ब्रह्म भूर्भुवः सुवर्ब्रह्मैत- दुपास्वैतत्तपः॥ २॥ —तैत्तिरी० प्रपा० १०। अनु० ८॥ अर्थः—हे शिष्य! जो आनन्दित, पापरहित, अर्थात् अन्याय, अधर्माचरणरहित, न्याय-धर्माचरणसहित कर्म हैं, उन्हीं का सेवन तू किया करना, इनसे विरुद्ध अधर्माचरण कभी मत करना। हे शिष्य! जो तेरे माता-पिता, आचार्य आदि हम लोगों के अच्छे, धर्मयुक्त, उत्तम कर्म हैं, उन्हीं का आचरण तू कर और जो हमारे दुष्ट कर्म हों, उनका आचरण कभी मत कर। हे ब्रह्मचारिन्! जो हमारे मध्य में धर्मात्मा, श्रेष्ठ ब्रह्मवित् विद्वान् हैं, उन्हीं के समीप बैठना, संग करना और उन्हीं का विश्वास किया कर॥ १॥ हे शिष्य! तू जो यथार्थ का ग्रहण, सत्य मानना, सत्य बोलना, वेदादि सत्यशास्त्रों का सुनना, अपने मन को अधर्माचरण में न जाने देना, श्रोत्रादि इन्द्रियों को दुष्टाचार से रोक श्रेष्ठाचार में लगाना, क्रोधादि के त्याग से शान्त रहना, विद्या आदि शुभ गुणों का दान करना, अग्निहोत्रादि और विद्वानों का संग कर। जितने भूमि, अन्तरिक्ष और सूर्यादि लोकों में पदार्थ हैं, उनका यथाशक्ति ज्ञान कर और योगाभ्यास, प्राणायाम, एक ब्रह्म—परमात्मा की उपासना कर। ये सब कर्म करना ही तप कहाता है॥ २॥ ऋतञ्च स्वाध्यायप्रवचने च। सत्यञ्च स्वाध्यायप्रवचने च। तपश्च स्वाध्या०। दमश्च स्वाध्या०। शमश्च स्वाध्या०। अग्नयश्च स्वाध्या०। अग्निहोत्रं च स्वाध्या०। सत्यमिति सत्यवचा राथीतरः। तप इति तपोनित्यः पौरुशिष्टिः। स्वाध्यायप्रवचने एवेति नाको मौद्गल्यः। तद्धि तपस्तद्धि तपः॥ ३॥ —तैत्तिरी० प्रपा० ७। अनु० ९॥ अर्थः—हे ब्रह्मचारिन्! तू सत्य धारण कर, पढ़ और पढ़ाया कर और सत्योपदेश करना कभी मत छोड़, सदा सत्य बोल, पढ़ और पढ़ाया कर। हर्ष-शोकादि छोड़, प्राणायाम-योगाभ्यास

वेदारम्भप्रकरणम् १२३ कर तथा पढ़ और पढ़ाया भी कर। अपने इन्द्रियों को बुरे कामों से हटा अच्छे कामों में चला, विद्या का ग्रहण कर और कराया कर। अपने अन्तःकरण और आत्मा को अन्यायाचरण से हटा न्यायाचरण में प्रवृत्त कर और कराया कर तथा पढ़ और सदा पढ़ाया कर। अग्निविद्या के सेवनपूर्वक विद्या को पढ़ और पढ़ाया कर । अग्निहोत्र करता हुआ पढ़ और पढ़ाया कर। 'सत्यवादी होना तप'—सत्यवचा राथीतर आचार्य; 'न्यायाचरण में कष्ट सहना तप'—तपो नित्य पौरुशिष्टि आचार्य; 'और धर्म में चलके पढ़ना-पढ़ाना और सत्योपदेश करना ही तप है' यह नाक मौद्गल्य आचार्य का मत है और सब आचार्यों के मत में यही पूर्वोक्त तप, यही पूर्वोक्त तप है, ऐसा तू जान ॥ ३ ॥ इत्यादि उपदेश तीन दिन के भीतर आचार्य वा बालक का पिता करे। तत्पश्चात् घर को छोड़ गुरुकुल में जावे। यदि पुत्र हो तो पुरुषों की पाठशाला और कन्या हो तो स्त्रियों की पाठशाला में भेजें। यदि घर में वर्णोच्चारण की शिक्षा यथावत् न हुई हो तो आचार्य बालकों को और कन्याओं को स्त्री पाणिनिमुनिकृत वर्णोच्चारणशिक्षा एक महीने के भीतर पढ़ा देवें। पुनः पाणिनिमुनिकृत अष्टाध्यायी का पाठ पदच्छेद, अर्थसहित आठ महीने में, अथवा एक वर्ष में पढ़ाकर, धातुपाठ और दश लकारों के रूप सधवाना तथा दश प्रक्रिया भी सधवानी। पुनः पाणिनिमुनिकृत लिङ्गानुशासन और उणादिगण, गणपाठ तथा अष्टाध्यायीस्थ ण्वुल् और तृच् प्रत्ययाद्यन्त सुबन्तरूप छह महीने के भीतर सधवा देवें। पुनः दूसरी बार अष्टाध्यायी पदार्थोंक्ति, समास, शङ्का-समाधान, उत्सर्ग अपवाद* अन्वयपूर्वक पढ़ावें और संस्कृतभाषण का भी अभ्यास कराते जाएँ। आठ महीने

  • जिस सूत्र का अधिक विषय हो वह उत्सर्ग और जो किसी सूत्र के बड़े विषय में से थोड़े में प्रवृत्त हो वह अपवाद कहाता है।

१२४ संस्कारविधि: के भीतर इतना पढ़ना-पढ़ाना चाहिए। तत्पश्चात् पतञ्जलिमुनिकृत महाभाष्य, जिसमें वर्ण उच्चारणशिक्षा, अष्टाध्यायी, धातुपाठ, गणपाठ, उणादिगण, लिङ्गानुशासन इन छह ग्रन्थों की व्याख्या यथावत् लिखी है, डेढ़ वर्ष में अर्थात् अठारह महीने में इसको पढ़ना-पढ़ाना। इस प्रकार शिक्षा और व्याकरणशास्त्र को तीन वर्ष पाँच महीने वा नौ महीने, अथवा ४ वर्ष के भीतर पूरा कर सब संस्कृतविद्या के मर्मस्थलों को समझने के योग्य होवे। तत्पश्चात् यास्कमुनिकृत निघण्टु निरुक्त तथा कात्यायनादि मुनिकृत कोश डेढ़ वर्ष के भीतर पढ़के, अव्यार्थ आप्तमुनिकृत वाच्यवाचक सम्बन्धरूप यौगिक*, योगरूढ़ि और रूढ़ि तीन प्रकार के शब्दों के अर्थ यथावत् जानें। तत्पश्चात् पिङ्गलाचार्यकृत पिङ्गलसूत्र छन्दोग्रन्थ भाष्यसहित तीन महीने में पढ़ और तीन महीने में श्लोकादिरचनविद्या को सीखें। पुनः यास्कमुनिकृत काव्यालङ्कारसूत्र, वात्स्यायनमुनिकृत भाष्यसहित आकाङ्क्षा, योग्यता, आसत्ति और तात्पर्यार्थ अन्वयसहित पढ़के, इसी के साथ मनुस्मृति, विदुरनीति और किसी प्रकरण में से १० सर्ग वाल्मीकीय रामायण के, ये सब एक वर्ष के भीतर पढ़ें और पढ़ावें तथा एक वर्ष में सूर्यसिद्धान्तादि में से किसी एक सिद्धान्त से गणितविद्या, जिसमें बीजगणित, रेखागणित और पाटीगणित, जिसको अङ्कगणित भी कहते हैं, पढ़ें और पढ़ावें। निघण्टु से लेके ज्योतिषपर्यन्त वेदाङ्गों को चार वर्ष के भीतर पढ़ें। तत्पश्चात् जैमिनिमुनिकृत सूत्र पूर्वमीमांसा व्यासमुनिकृत व्याख्यासहित, कणादमुनिकृत वैशेषिकसूत्ररूप शास्त्र को गौतममुनिकृत प्रशस्तपादभाष्यसहित, वात्स्यायनमुनिकृत भाष्य-

  • यौगिक—जो क्रिया के साथ सम्बन्ध रक्खे। जैसे पाचक याजकादि। योगरूढ़ि—जैसे पङ्कजादि। रूढ़ि—जैसे धन, वन इत्यादि।

वेदारम्भप्रकरणम् १२५ सहित गौतम मुनिकृत सूत्ररूप न्यायशास्त्र, व्यासमुनिकृतभाष्य- सहित पतञ्जलिमुनिकृत योगसूत्र योगशास्त्र, भागुरिमुनिकृत- भाष्ययुक्त कपिलाचार्यकृत सूत्रस्वरूप सांख्यशास्त्र, जैमिनि वा बौधायन आदि मुनिकृत व्याख्यासहित व्यासमुनिकृत शारीरक- सूत्र तथा ईश, केन, कठ, प्रश्न, मुण्डक, माण्डूक्य, ऐतरेय, तैत्तिरीय, छान्दोग्य और बृहदारण्यक दश उपनिषद्, व्यासादिमुनिकृत व्याख्यासहित वेदान्तशास्त्र, इन छह शास्त्रों को दो वर्ष के भीतर पढ़ लेवें। तत्पश्चात् बह्वृच् ऐतरेय ऋग्वेद का ब्राह्मण, आश्वलायनकृत श्रौत तथा गृह्यसूत्र* और कल्पसूत्र पद-क्रम और व्याकरणादि के सहाय से छन्द, स्वर, पदार्थ, अन्वय, भावार्थसहित ऋग्वेद का पठन तीन वर्ष के भीतर करें। इसी प्रकार यजुर्वेद को शतपथब्राह्मण और पदादि के सहित दो वर्ष, तथा सामब्राह्मण और पदादि तथा गानसहित सामवेद को दो वर्ष, तथा गोपथब्राह्मण और पदादि के सहित अथर्ववेद को दो वर्ष के भीतर पढ़ें और पढ़ावें। सब मिलके ९ [नौ] वर्षों के भीतर चारों वेदों को पढ़ना और पढ़ाना चाहिए। पुनः ऋग्वेद का उपवेद आयुर्वेद, जिसको वैद्यकशास्त्र कहते हैं, जिसमें धन्वन्तरिजीकृत सुश्रुत और निघण्टु तथा पतञ्जलि ऋषिकृत चरक आदि आर्षग्रन्थ हैं, इनको तीन वर्ष के भीतर पढ़ें। जैसे सुश्रुत में शस्त्र लिखे हैं, बनाकर शरीर के सब अवयवों को चीरके देखें तथा जो उसमें शारीरकादि विद्या लिखी है, उसका साक्षात् करें। तत्पश्चात् यजुर्वेद का उपवेद धनुर्वेद, जिसको शस्त्रास्त्र- विद्या कहते हैं, जिसमें अङ्गिरा आदि ऋषिकृत ग्रन्थ हैं, जो

  • ब्राह्मण वा जो सूत्र वेदविरुद्ध हिंसापरक हो, उसका प्रमाण न करना।