संस्कार विधि (महर्षि दयानन्द सरस्वती - षोडश वैदिक संस्कार एवं गुरुकुल विधान सटीक)
Sanskar Vidhi of Maharshi Dayananda Saraswati
महर्षि स्वामी दयानन्द सरस्वती द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें१२० संस्कारविधिः पिता, अतिथि, महात्मा आदि अपने बड़ों को नित्य नमस्कार और उनका सेवन किया करे ॥९॥ अज्ञ अर्थात् जो कुछ नहीं पढ़ा, वह निश्चय करके बालक होता और जो मन्त्रद, अर्थात् दूसरे को विचार देनेवाला, विद्या पढ़ा, विद्याविचार में निपुण है, वह पिता-स्थानीय होता है, क्योंकि जिस कारण सत्पुरुषों ने अज्ञ जन को बालक कहा और मन्त्रद को पिता ही कहा है, इससे प्रथम ब्रह्मचर्याश्रम सम्पन्न होकर ज्ञानवान्, विद्यावान् अवश्य होना चाहिए ॥१०॥ धर्मवेत्ता ऋषिजनों ने न वर्षों, न पके केशों, वा झूलते हुए अङ्गों, न धन और न बन्धुजनों से बड़प्पन माना, किन्तु यही धर्म निश्चय किया कि जो हम लोगों में वाद-विवाद में उत्तर देनेवाला, अर्थात् वक्ता हो वह बड़ा है। इससे ब्रह्मचर्याश्रम- सम्पन्न होकर विद्यावान् होना चाहिए। जिससे कि संसार में बड़प्पन, प्रतिष्ठा पावें और दूसरों को उत्तर देने में अति निपुण हों ॥११॥ उस कारण से वृद्ध नहीं होता कि जिससे इसका शिर झूल जाए, केश पक जावें, किन्तु जो जवान भी पढ़ा हुआ विद्वान् है, उसको विद्वानों ने वृद्ध जाना और माना है। इससे ब्रह्मचर्याश्रम-सम्पन्न होकर विद्या पढ़नी चाहिए ॥१२॥ जैसे काठ का कठपूतला हाथी वा जैसे चमड़े का बनाया हुआ मृग हो, वैसे बिना पढ़ा हुआ विप्र, अर्थात् ब्राह्मण वा बुद्धिमान् जन होता है । उक्त वे हाथी, मृग और विप्र तीनों नाममात्र धारण करते हैं। इस कारण ब्रह्मचर्याश्रम-सम्पन्न होकर विद्या पढ़नी चाहिए ॥१३॥ ब्राह्मण विष के समान उत्तम मान से नित्य उदासीनता रक्खे और अमृत के समान अपमान की आकांक्षा सर्वदा करे, अर्थात् ब्रह्मचर्यादि आश्रमों के लिए भिक्षामात्र माँगते भी कभी मान की इच्छा न करे ॥१४॥