संस्कार विधि (महर्षि दयानन्द सरस्वती - षोडश वैदिक संस्कार एवं गुरुकुल विधान सटीक)
Sanskar Vidhi of Maharshi Dayananda Saraswati
महर्षि स्वामी दयानन्द सरस्वती द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंवेदारम्भप्रकरणम् ११९ ही पश्चात् सिद्धि को प्राप्त होता है॥५॥ जिसका ब्राह्मणपन (सम्मान नहीं चाहना वा इन्द्रियों को वश में रखना आदि) बिगड़ा वा जिसका विशेष प्रभाव (वर्णाश्रम के गुण-कर्म) बिगड़े हैं, उस पुरुष के वेद पढ़ना, त्याग (संन्यास) लेना, यज्ञ (अग्निहोत्रादि) करना, नियम (ब्रह्मचर्याश्रम आदि) करना, तप (निन्दा-स्तुति और हानि-लाभ आदि द्वन्द्वों का सहन) करना आदि कर्म कदापि सिद्ध नहीं हो सकते। इसलिए ब्रह्मचारी को चाहिए कि अपने नियम-धर्मों का यथावत् पालन करके सिद्धि को प्राप्त होवे॥६॥ ब्रह्मचारी पुरुष सब इन्द्रियों को वश में कर और आत्मा के साथ मन को संयुक्त करके योगाभ्यास से शरीर को किञ्चित्- किञ्चित् पीड़ा देता हुआ अपने सब प्रयोजनों को सिद्ध करे॥७॥ बुद्धिमान् ब्रह्मचारी को चाहिए कि यमों का सेवन नित्य करे, केवल नियमों का नहीं, क्योंकि यमों१ को न करता हुआ और केवल नियमों२ का सेवन करता हुआ भी अपने कर्त्तव्य से पतित हो जाता है। इसलिए यमसेवनपूर्वक नियमसेवन नित्य किया करे॥८॥ अभिवादन करने का जिसका स्वभाव और विद्या वा अवस्था में वृद्ध पुरुषों का जो नित्य सेवन करता है, उसकी अवस्था, विद्या, कीर्ति और बल इन चारों की नित्य उन्नति हुआ करती हैं। इसलिए ब्रह्मचारी को चाहिए कि आचार्य, माता- १. अहिंसासत्यास्तेयब्रह्मचर्यापरिग्रहा यमाः। निर्वैरता, सत्य बोलना, चोरीत्याग, वीर्यरक्षण और विषयभोग में घृणा से ५ यम हैं। २. शौचसन्तोषतपःस्वाध्यायेश्वरप्रणिधानानि नियमाः। शौच, सन्तोष, तप (हानि लाभ आदि द्वन्द्व का सहना) स्वाध्याय (वेद का पढ़ना), ईश्वरप्रणिधान (सर्वस्व ईश्वरार्पण) ये पाँच नियम कहाते हैं।