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संस्कार विधि (महर्षि दयानन्द सरस्वती - षोडश वैदिक संस्कार एवं गुरुकुल विधान सटीक)

Sanskar Vidhi of Maharshi Dayananda Saraswati

महर्षि स्वामी दयानन्द सरस्वती द्वारा

DevanagariHindipublished318 पृष्ठ

४. समावर्तन (स्नातक दीक्षांत समारोह) एवं विवाह संस्कार विधान

१९२ संस्कारविधिः गृहाश्रम में (अग्रे) प्रथम (देवाः) विद्वान् लोग (पत्नीः) उत्तम स्त्रियों को (न्यपद्यन्त) प्राप्त होते हैं और (तनूभिः) शरीरों से (तन्वः) शरीरों को (समस्पृशन्त) स्पर्श करते हैं, वैसे (विश्वरूपा) विविध सुन्दररूप को धारण करनेहारी, (महित्वा) सत्कार को प्राप्त होके (सूर्येव) सूर्य की कान्ति के समान (पत्या) अपने स्वामी के साथ मिलके (प्रजावती) प्रजा को प्राप्त होनेवाली (सम्भव) अच्छे प्रकार हो ॥ ७ ॥ हे स्त्री-पुरुषो ! तुम (पितरौ) बालकों के जनक (ऋत्विये) ऋतुसमय में सन्तानों को (संसृजेथाम्) अच्छे प्रकार उत्पन्न करो। (माता) जननी (च) और (पिता) जनक दोनों (रेतः) वीर्य को मिलाकर गर्भाधान करनेवाले (भवाथः) होओ। हे पुरुष ! (एनाम्) इस (योषाम्) अपनी स्त्री को (मर्यः इव) प्राप्त होनेवाले पति के समान (अधि रोहय) सन्तानों से बढ़ा और दोनों (इह) इस गृहाश्रम में मिलके (प्रजाम्) प्रजा को (कृण्वाथाम्) उत्पन्न करो, (पुष्यतम्) पालन-पोषण करो और पुरुषार्थ से (रयिम्) धन को प्राप्त होओ ॥ ८ ॥ हे (पूषन्) वृद्धिकारक पुरुष ! (यस्याम्) जिसमें (मनुष्याः) मनुष्य लोग (बीजम्) वीर्य को (वपन्ति) बोते हैं, (या) जो (नः) हमारी (उशती) कामना करती हुई (ऊरू) ऊरू को सुन्दरता से (विश्रयाति) विशेषकर आश्रय करती है, (यस्याम्) जिमें (उशन्तः) सन्तानों की कामना करते हुए हम (शेपः) उपस्थेन्द्रिय का (प्रहरेम) प्रहरण करते हैं, (ताम्) उस (शिवतमाम्) अतिशय कल्याण करनेवाली स्त्री को सन्तानोत्पत्ति के लिए (एरयस्व) प्रेम से प्रेरणा कर ॥ ९ ॥ स्यो॒नाद् योने॒रधि॑ बु॒ध्यमा॑नौ ह॒सामु॒दौ मह॑सा॒ मोद॑मानौ । सु॒गू सु॑पु॒त्रौ सु॑गृ॒हौ तराथो॒ जीवावु॒षसो॑ विभा॒तीः ॥ १० ॥

गृहाश्रमप्रकरणम् १९३ इ॒हेमावि॑न्द्र॒ सं नु॑द च॒क्रवा॒केव॑ दम्प॑ती । प्र॒जयै॑नौ स्वस्तुकौ विश्व॒मायु॒र्व्य॑श्नुताम् ॥ ११ ॥ ज॒नियन्ति॑ ना॒व॑ग्रवः पु॒त्रियन्ति॑ सु॒दान॑वः । अरि॑ष्टा॒सू सचेवहि बृ॒हते वाज॑सातये ॥ १२ ॥ अर्थ—हे स्त्री और पुरुष ! जैसे सूर्य (विभातीः) सुन्दर प्रकाशयुक्त (उषसः) प्रभातवेला को प्राप्त होता है, वैसे (स्योनात्) सुख से (योनेः) घर के मध्य में (अधि बुध्यमानौ) सन्तानोत्पत्ति आदि की क्रिया को अच्छे प्रकार जाननेवाले, सदा (हसामुदौ) हास्य और आनन्दयुक्त, (महसा) बड़े प्रेम से (मोदमानौ) अत्यन्त प्रसन्न हुए, (सुगू) उत्तम चाल चलने से धर्मयुक्त व्यवहार में अच्छे प्रकार चलनेवाले, (सुपुत्रौ) उत्तम पुत्रवाले, (सुगृहौ) श्रेष्ठ गृहादि सामग्रीयुक्त (जीवौ) उत्तम प्रकार जीवों को धारण करते हुए (तराथः) गृहाश्रम के व्यवहारों के पार होओ ॥ १० ॥ हे (इन्द्र) परमैश्वर्ययुक्त विद्वान् राजन् ! आप (इह) इस संसार में (इमौ) इन स्त्री-पुरुषों को समय पर विवाह करने की आज्ञा और ऐसी व्यवस्था दीजिए कि जिससे कोई स्त्री- पुरुष पृष्ठ ११२-१२६ में लिखे प्रमाण से पूर्व वा अन्यथा विवाह न कर सकें, वैसे (सं नुद) सबको प्रसिद्धि से प्रेरणा कीजिए, जिससे ब्रह्मचर्यपूर्वक शिक्षा को पाके (दम्पती) जाया और पति (चक्रवाकेव) चकवा-चकवी के समान एक-दूसरे से प्रेमबद्ध रहें और गर्भाधानसंस्कारोक्तविधि से (प्रजया) उत्पन्न हुई प्रजा से (एनौ) ये दोनों (स्वस्तकौ) सुखयुक्त होके (विश्वम्) सम्पूर्ण—सौ वर्षपर्यन्त (आयुः) आयु को (व्यश्नुताम्) प्राप्त होवें ॥ ११ ॥ हे मनुष्यो ! जैसे (सुदानवः) विद्यादि उत्तम गुणों के दान करनेवाले (अग्रवः) उत्तम स्त्री-पुरुष (जनियन्ति) पुत्रोत्पत्ति

१९४ संस्कारविधिः करते और (पुत्रियन्ति) पुत्र की कामना करते हैं, वैसे (नौ) हमारे भी सन्तान उत्तम होवें तथा (अरिष्टासू) बल, प्राण का नाश न करनेवाले होकर (बृहते) बड़े (वाजसातये) परोपकार के अर्थ विज्ञान और अन्न आदि के दान के लिए (सचेवहि) कटिबद्ध सदा रहें, जिससे हमारे सन्तान भी उत्तम होवें ॥ १२ ॥ प्र बु॒ध्यस्व सु॒बुधा॒ बुध्य॑माना दी॒र्घायु॒त्वाय॑ श॒तशा॑रदाय । गृ॒हान् ग॑च्छ गृ॒हप॑त्नी यथासौ दी॒र्घं त॒ आयु॑: स॒वि॒ता कृ॒णोतु॑ ॥ १३ ॥ स॒हृद॑यं सांम॑न॒स्यम॑विद्वे॒षं कृ॒णोमि॑ वः । अ॒न्यो अ॒न्यम॒भि ह॑र्यत व॒त्सं जा॒तमि॑वा॒घ्न्या ॥ १४ ॥ अर्थ—हे पत्नि ! तू (शतशारदाय) शतवर्षपर्यन्त (दीर्घायुत्वाय) दीर्घकाल जीने के लिए (सुबुधा) उत्तम बुद्धियुक्त, (बुध्यमाना) संज्ञान होकर (गृहान्) मेरे घरों को (गच्छ) प्राप्त हो और (गृहपत्नी) मुझ घर के स्वामी की स्त्री (यथा) जैसे (ते) तेरा (दीर्घम्) दीर्घकाल-पर्यन्त (आयुः) जीवन (आसः) होवे, वैसे (प्रबुध्यस्व) प्रकृष्ट ज्ञान और उत्तम व्यवहार को यथावत् जान । इस अपनी आशा को (सविता) सब जगत् की उत्पत्ति और सम्पूर्ण ऐश्वर्य को देनेवाला परमात्मा (कृणोतु) अपनी कृपा से सदा सिद्ध करे । जिससे तू और मैं सदा उन्नतिशील होकर आनन्द में रहें ॥ १३ ॥ हे गृहस्थो ! मैं ईश्वर तुमको जैसी आज्ञा देता हूँ, वैसा ही वर्त्तमान करो, जिससे तुम्हें अक्षय सुख हो, अर्थात् (वः) तुम्हारा (सहृदयम्) जैसी अपने लिए सुख की इच्छा करते और दुःख नहीं चाहते हो, वैसे माता-पिता, सन्तान, स्त्री-पुरुष, भृत्य, मित्र, पड़ोसी और अन्य सबसे समान हृदय रहो । (सांमनस्यम्) मन से सम्यक् प्रसन्नता और (अविद्वेषम्) वैर-विरोधादिरहित व्यवहार को तुम्हारे लिए (कृणोमि) स्थिर करता हूँ। तुम

गृहआश्रमप्रकरणम् १९५ (अघ्न्या) हनन न करने योग्य गाय (वत्सं जातमिव) उत्पन्न हुए बछड़े पर वात्सल्यभाव से जैसे वर्तती है, वैसे (अन्यो अन्यम्) एक-दूसरे से (अभिहर्यत) प्रेमपूर्वक कामना से वर्त्ता करो ॥ १४ ॥ अनु॑व्रतः पि॒तुः पु॒त्रो मा॒त्रा भ॑वतु संम॑नाः। जा॒या पत्ये॒ मधु॑मतीं वाचं॑ वदतु शन्ति॒वाम् ॥ १५ ॥ मा भ्राता॒ भ्रातरं॑ द्विक्ष॒न्मा स्वसा॑रमु॒त स्वसा॑। स॒म्यञ्चः॒ सव्र॑ता भू॒त्वा वाचं॑ वदत भ॒द्रया॑ ॥ १६ ॥ अर्थ—हे गृहस्थो! जैसे तुम्हारा (पुत्रः) पुत्र (मात्रा) माता के साथ (संमनाः) प्रीतियुक्त मनवाला, (अनुव्रतः) अनुकूल आचरणयुक्त, (पितुः) और पिता के सम्बन्ध में भी इसी प्रकार का प्रेमवाला (भवतु) होवे, वैसे तुम भी पुत्रों के साथ सदा वर्त्ता करो। जैसे (जाया) स्त्री (पत्ये) पति की प्रसन्नता के लिए (मधुमतीम्) माधुर्यगुणयुक्त (वाचम्) वाणी को (वदतु) कहे, वैसे पति भी (शन्तिवान्) शान्त होकर अपनी पत्नी से सदा मधुर भाषण किया करे ॥ १५ ॥ हे गृहस्थो! तुम्हारे में (भ्राता) भाई (भ्रातरम्) भाई के साथ (मा द्विक्षत्) द्वेष कभी न करे। (उत) और (स्वसा) बहिन (स्वसारम्) बहिन से द्वेष कभी (मा) न करे तथा बहिन- भाई भी परस्पर द्वेष मत करो, किन्तु (सम्यञ्चः) सम्यक् प्रेमादि गुणों से युक्त (सव्रताः) समान गुण-कर्म-स्वभाववाले (भूत्वा) होकर (भद्रया) मङ्गलकारक रीति से एक-दूसरे के साथ (वाचम्) सुखदायक वाणी को (वदत) बोला करो ॥ १६ ॥ येन॑ दे॒वा न वि॒यन्ति॒ नो च॑ वि॒द्विष॒ते मि॒थः । तत्कृ॑ण्मो॒ ब्रह्म॑ वो गृ॒हे सं॒ज्ञानं॒ पुरु॑षेभ्यः ॥ १७ ॥ अर्थ—हे गृहस्थो! मैं ईश्वर (येन) जिस प्रकार के व्यवहार

१९६ संस्कारविधिः से (देवाः) विद्वान् लोग (मिथः) परस्पर (न वियन्ति) पृथक् भाववाले नहीं होते, (च) और (नो विद्विषते) परस्पर में द्वेष कभी नहीं करते, (तत्) वही कर्म (वः) तुम्हारे (गृहे) घर में (कृण्मः) निश्चित करता हूँ। (पुरुषेभ्यः) पुरुषों को (संज्ञानम्) अच्छे प्रकार चिताता हूँ कि तुम लोग परस्पर प्रीति से वर्त्तकर बड़े (ब्रह्म) धनैश्वर्य को प्राप्त होओ॥ १७॥ ज्याय॑स्वन्तश्चित्तिनो॒ मा वि यौ॑ष्ट॒ संरा॑धयन्तः॒ सधुरा॑श्चरन्तः॑। अ॒न्यो अ॒न्यस्मै॑ व॒ल्गु वद॑न्त॒ एतं॑ स॒ध्रीची॑नान्त्वः संम॑नसस्कृणोमि॥ १८॥ अर्थ—हे गृहस्थादि मनुष्यो! तुम (ज्यायस्वन्तः) उत्तम विद्यादिगुणयुक्त, (चित्तिनः) विद्वान्, संज्ञान, (सधुराः) धुरन्धर होकर (चरन्तः) विचरते और (संराधयन्तः) परस्पर मिलके धन-धान्य, राज्यसमृद्धि को प्राप्त होते हुए (मा वियौष्ट) विरोधी वा पृथक्-पृथक् भाव मत करो। (अन्यः) एक (अन्यस्मै) दूसरे के लिए (वल्गु) सत्य, मधुर भाषण (वदन्तः) कहते हुए एक-दूसरे को (एत) प्राप्त होओ। इसीलिए (सध्रीचीनान्) समान लाभाऽलाभ से एक-दूसरे के सहायक, (संमनसः) एकमत्यवाले (वः) तुमको (कृणोमि) करता हूँ, अर्थात् मैं ईश्वर तुमको जो आज्ञा देता हूँ, इसको आलस्य छोड़कर किया करो॥ १८॥ समा॒नी प्र॒पा स॒ह वो॑ऽन्नभा॒गः स॑मा॒ने योक्त्रे॑ स॒ह वो॑ युनज्मि। स॒म्यञ्चो॒ऽग्निं स॑प॒र्यता॑रा॒ नाभि॑मि॒वाभि॑तः॥ १९॥ स॒ध्रीची॑नान्त्वः संम॑नसस्कृणोम्ये॑क॑श्रुष्टीन्त्संव॑नने॒न सर्वा॑न्। दे॒वाइ॑वा॒मृतं॒ रक्ष॑माणाः सा॒यं प्रा॒तः सौम॑नसो वो॑ अस्तु॥ २०॥ —अथर्व० कां० ३। सू० ३०। मन्त्र १–७॥

गृहाश्रमप्रकरणम् १९७ अर्थ—हे गृहस्थादि मनुष्यो ! मुझ ईश्वर की आज्ञा से तुम्हारा (प्रपा) जलपान, स्नानादि का स्थान आदि व्यवहार (समानी) एक-सा हो। (वः) तुम्हारा (अन्नभागः) खान-पान (सह) साथ हुआ करे। (वः) तुम्हारे (समाने) एक-से (योक्त्रे) अश्वादि यान के जोते (सह) संगी हों और तुमको मैं धर्मादि व्यवहार में भी एकीभूत करके (युनज्मि) नियुक्त करता हूँ। जैसे (अराः) चक्र के आरे (अभितः) चारों ओर से (नाभिमिव) बीच के नालरूप काष्ठ में लगे रहते हैं, अथवा जैसे ऋत्विज् लोग और यजमान यज्ञ में मिलके (अग्निम्) अग्नि आदि के सेवन से जगत् का उपकार करते हैं, वैसे (सम्यञ्चः) सम्यक् प्राप्तिवाले तुम मिलके धर्मयुक्त कर्मों को और (सपर्यत) एक-दूसरे का हित सिद्ध किया करो॥ १९॥ हे गृहस्थादि मनुष्यो ! मैं ईश्वर (वः) तुमको (सध्रीचीनान्) सह वर्त्तमान, (संमनसः) परस्पर के लिए हितैषी, (एकश्रुष्टीन्) एक ही धर्मकृत्य में शीघ्र प्रवृत्त होनेवाले (सर्वान्) सबको (संवननेन) धर्मकृत्य के सेवन के साथ एक-दूसरे के उपकार में नियुक्त (कृणोमि) करता हूँ। तुम (देवाइव) विद्वानों के समान (अमृतम्) व्यावहारिक वा पारमार्थिक सुख की (रक्षमाणाः) रक्षा करते हुए (सायंप्रातः) सन्ध्या और प्रातःकाल, अर्थात् सब समय में एक-दूसरे से प्रेमपूर्वक मिला करो। ऐसे करते हुए (वः) तुम्हारा (सौमनसः) मन का आनन्दयुक्त शुद्धभाव (अस्तु) सदा बना रहे॥ २०॥ श्रमेण॒ तप॑सा सृष्टा ब्रह्म॑णा वित्त ऋ॒ते श्रि॒ताः॥ २१॥ स॒त्येनावृ॑ताः श्रिया॒ प्रावृ॑ता यश॑सा परी॑वृताः॥ २२॥ स्व॒धया॒ परि॑हिताः श्र॒द्धया॒ पर्यू॑ढा दी॒क्षया॑ गु॒प्ता य॒ज्ञे प्रति॑ष्ठिता लो॒को नि॒धन॑म्॥ २३॥

१९८ संस्कारविधिः अर्थ— हे स्त्री-पुरुषो! मैं ईश्वर तुम्हें आज्ञा देता हूँ कि तुम सब गृहस्थ मनुष्य (श्रमेण) परिश्रम तथा (तपसा) प्राणायाम से (सृष्टाः) संयुक्त, (ब्रह्मणा) वेदविद्या, परमात्मा और धनादि से (वित्ते) भोगने योग्य धनादि के प्रयत्न में और (ऋते) यथार्थ पक्षपातरहित न्यायरूप धर्म में (श्रिताः) चलनेवाले सदा बने रहो ॥ २१ ॥ (सत्येन) सत्यभाषणादि कर्मों से (आवृताः) चारों ओर से युक्त, (श्रिया) शोभा तथा लक्ष्मी से (प्रावृताः) युक्त, (यशसा) कीर्ति और धन से (परीवृताः) सब ओर से संयुक्त रहा करो ॥ २२ ॥ (स्वधया) अपने ही अन्नादि पदार्थ के धारण से (परिहिताः) सबके हितकारी, (श्रद्धया) सत्य धारण में श्रद्धा से (पर्युढाः) सब ओर से सबको सत्याचरण प्राप्त करानेवाले, (दीक्षया) नाना प्रकार के ब्रह्मचर्य, सत्यभाषणादि व्रत धारण से (गुप्ताः) सुरक्षित, (यज्ञे) विद्वानों के सत्कार, शिल्पविद्या और शुभ गुणों के दान में (प्रतिष्ठिताः) प्रतिष्ठा को प्राप्त हुआ करो और इन्हीं कर्मों से (निधनम् लोकः) इस मनुष्यलोक को प्राप्त होके मृत्युपर्यन्त सदा आनन्द में रहो ॥ २३ ॥ ओज॑श्च॒ तेज॑श्च॒ सह॑श्च॒ बलं॑ च॒ वाक् चेन्द्रि॒यं च॒ श्रीश्च॒ धर्म॑श्च ॥ २४ ॥ अर्थ— हे मनुष्यो ! तुम जो (ओजः) पराक्रम (च) और इसकी सामग्री, (तेजः) तेजस्वीपन (च) और इसकी सामग्री, (सहः) स्तुति-निन्दा, हानि-लाभ तथा शोकादि का सहन (च) और इसके साधन, (बलं च) बल और इसके साधन, (वाक् च) सत्य, प्रिय वाणी और इसके अनुकूल व्यवहार, (इन्द्रियं च) शान्त, धर्मयुक्त अन्तःकरण और शुद्धात्मा तथा जितेन्द्रियता, (श्रीश्च) लक्ष्मी, सम्पत्ति और इसकी प्राप्ति का धर्मयुक्त उद्योग,

गृहाश्रमप्रकरणम् १९९ (धर्मश्च) पक्षपातरहित न्यायाचरण, वेदोक्त धर्म और जो इसके साधन वा लक्षण हैं, उन्हें प्राप्त होके इन्हीं में सदा वर्त्ता करो॥ २४॥ ब्रह्म॑ च क्ष॒त्रं च॒ राष्ट्रं च॒ विश॑श्च॒ त्विषि॑श्च॒ यश॑श्च॒ वर्च॑श्च॒ द्रवि॑णं च॥ २५॥ आयु॑श्च रू॒पं च॒ नाम॑ च॒ कीर्ति॑श्च॒ प्रा॒णश्चा॑पा॒नश्च॒ चक्षु॑श्च॒ श्रोत्रं॑ च॥ २६॥ पय॑श्च॒ रस॑श्चान्नं॒ चान्नाद्यं॑ च ऋ॒तं च॑ स॒त्यं चे॒ष्टं च॑ पू॒र्तं च॑ प्र॒जा च॑ प॒शव॑श्च॥ २७॥ —अथर्व० कां० १२। अ० ५। वर्ग १-२॥ अर्थ—हे गृहस्थादि मनुष्यो! तुमको योग्य है कि (ब्रह्म च) पूर्ण विद्यादि शुभ गुणयुक्त मनुष्य और सबके उपकारक शम-दमादि गुणयुक्त ब्रह्मकुल, (क्षत्रं च) विद्यादि उत्तम गुणयुक्त तथा विनय और शौर्यादि गुणों से युक्त क्षत्रियकुल (राष्ट्रं च) राज्य और उसका न्याय से पालन, (विशश्च) उत्तमे प्रजा और उनकी उन्नति, (त्विषिश्च) सद्विद्यादि से तेज, आरोग्य, शरीर और आत्मा के बल से प्रकाशमान और इसकी उन्नति से (यशश्च) कीर्तियुक्त तथा इसके साधनों को प्राप्त हुआ करो। (वर्चश्च) पढ़ी हुई विद्या का विचार और उसका नित्य पढ़ना, (द्रविणं च) द्रव्योपार्जन, उसकी रक्षा और धर्मयुक्त परोपकार में व्यय करने आदि कर्मों को सदा किया करो॥ २५॥ हे स्त्री-पुरुषो! तुम अपना (आयुः) जीवन बढ़ाओ, (च) और सब जीवन में धर्मयुक्त उत्तम कर्म ही किया करो। (रूपं च) विषयासक्ति, कुपथ्य, रोग और अधर्माचरण को छोड़के अपने स्वरूप को अच्छा रक्खो और वस्त्राभूषण भी धारण किया

२०० संस्कारविधिः करो, (नाम च) नामकरण के पृष्ठ ७३-७६ में लिखे प्रमाणे शास्त्रोक्त संज्ञाधारण और उसके नियमों को भी (कीर्तिश्च) सत्याचरण से प्रशंसा का धारण और गुणों में दोषारोपणरूप निन्दा को छोड़ दो। (प्राणश्च) चिरकालपर्यन्त जीवन का धारण और उसके युक्ताहार-विहारादि साधन, (अपानश्च) सब दुःख दूर करने का उपाय और उसकी सामग्री, (चक्षुश्च) प्रत्यक्ष और अनुमान, उपमान, (श्रोत्रं च) शब्दप्रमाण और उसकी सामग्री को धारण किया करो ॥ २६ ॥ हे गृहस्थ लोगो ! (पयश्च) उत्तम जल, दूध और इसका शोधन और युक्ति से सेवन, (रसश्च) घृत, दूध, मधु आदि और इसका युक्ति से आहार-विहार, (अन्नं च) उत्तम चावल आदि अन्न और उसके उत्तम संस्कार किये (अन्नाद्यं च) खाने के योग्य पदार्थ और उसके साथ उत्तम दाल, शाक, कढ़ी आदि, (ऋतं च) सत्य मानना और सत्य मनवाना, (सत्यं च) सत्य बोलना और बुलवाना (इष्टं च) यज्ञ करना और कराना, (पूर्त्तं च) यज्ञ की सामग्री पूरी करना तथा जलाशय और आराम- वाटिका आदि का बनाना और बनवाना, (प्रजा च) प्रजा की उत्पत्ति, पालन और उन्नति सदा करनी तथा करानी, (पशवश्च) गाय आदि पशुओं का पालन और उन्नति सदा करनी तथा करानी चाहिए ॥ २७ ॥ कु॒र्वन्ने॒वेह कर्मा॑णि जिजीवि॒षेच्छ॒तँ समा॑:। ए॒वं त्वयि॒ नान्यथेतो॑ऽस्ति॒ न कर्म॑ लिप्यते॒ नरे॑ ॥ १ ॥ —य० अ० ४० । मन्त्र २ ॥ अर्थ—मैं परमात्मा सब मनुष्यों के लिए आज्ञा देता हूँ कि सब मनुष्य (इह) इस संसार में शरीर से समर्थ होके (कर्माणि) सत्कर्मों को (कुर्वन्नेव) करता-ही-करता (शतं समा:) सौ वर्षपर्यन्त (जिजीविषेत्) जीने की इच्छा करे, आलसी और प्रमादी कभी न होवे। (एवम्) इसी प्रकार उत्तम

गृहाश्रमप्रकरणम् २०१ कर्म करते हुए (त्वयि) तुझ (नरे) मनुष्य में (इतः) इस हेतु से (अन्यथा) उलटा पापरूप (कर्म) दुःखद कर्म (न लिप्यते) लिप्यमान कभी नहीं होता और तुम पापरूप कर्म में लिप्त कभी मत होओ। इस उत्तम कर्म से कुछ भी दुःख (नास्ति) नहीं होता, इसलिए तुम स्त्री-पुरुष सदा पुरुषार्थी होकर उत्तम कर्मों से अपनी और दूसरों की सदा उन्नति किया करो ॥१॥ पुनः स्त्री-पुरुष सदा निम्नलिखित मन्त्रों के अनुकूल इच्छा और आचरण किया करें। वे मन्त्र ये हैं— भूर्भुव॒: स्वः॑ सु॒प्रजाः॑ प्र॒जाभि॑: स्याथ्ꣳ सु॒वीरो॑ वी॒रैः सु॒पोषः॑ पोषैः॑। नर्य॑ प्र॒जां मे॑ पाहि शꣳस्य॑ प॒शून् मे॑ पा॒ह्यथ॑र्य पि॒तुं मे॑ पाहि॥२॥ गृहा॒ मा बि॑भीत॒ मा वे॑पध्व॒मूर्जं॒ बिभ्र॑त॒ऽएम॑सि। ऊर्जं॒ बिभ्र॑द्वः सु॒मनाः॑ सु॒मेधा गृ॒हानैमि॒ मन॑सा मोद॑मानः ॥ ३ ॥ —यजु० अ० ३। मन्त्र ३७, ४१ ॥ अर्थ—हे स्त्री वा पुरुष ! मैं तेरे वा अपने के सम्बन्ध से (भूर्भुवः स्वः) शारीरिक, वाचिक और मानस, अर्थात् त्रिविध सुख से युक्त होके (प्रजाभिः) मनुष्यादि उत्तम प्रजाओं के साथ (सुप्रजाः) उत्तम प्रजायुक्त (स्याम्) होऊँ। (वीरैः) उत्तम पुत्र, बन्धु, सम्बन्धी और भृत्यों से सह वर्त्तमान (सुवीरः) उत्तम वीरों से सहित होऊँ। (पोषैः) उत्तम पुष्टिकारक व्यवहारों से (सुपोषः) उत्तम पुष्टियुक्त होऊँ। हे (नर्य) मनुष्यों में सज्जन वीर स्वामिन्! (मे) मेरी (प्रजाम्) प्रजा की (पाहि) रक्षा कीजिए। हे (शंस्य) प्रशंसा करने योग्य स्वामिन्! आप (मे) मेरे (पशून्) पशुओं की (पाहि) रक्षा कीजिए। हे (अथर्य) अहिंसक, दयालो स्वामिन्! (मे) मेरे (पितुम्) अन्न आदि की (पाहि) रक्षा कीजिए। वैसे हे नारी! प्रशंसनीय गुणयुक्त तू मेरी प्रजा, मेरे पशु और मेरे अन्न की सदा रक्षा किया कर ॥२॥

२०२ संस्कारविधिः हे (गृहाः) गृहस्थ लोगो ! तुम विधिपूर्वक गृहाश्रम में प्रवेश करने से (मा बिभीत) मत डरो, (मा वेपध्वम्) मत कंपायमान होओ। (ऊर्ज्जम्) अन्न, पराक्रम तथा विद्यादि शुभगुण से युक्त होकर गृहाश्रम को (बिभ्रतः) धारण करते हुए तुम लोगों को हम सत्योपदेशक विद्वान् लोग (एमसि) प्राप्त होते और सत्योपदेश करते हैं और अन्न-पानाच्छादन, स्थान से तुम्हीं हमारा निर्वाह करते हो, इसलिए तुम्हारा गृहाश्रम व्यवहार में निवास सर्वोत्कृष्ट है। हे वरानने! जैसे मैं तेरा पति (मनसा) अन्तःकरण से (मोदमानः) आनन्दित (सुमनाः) प्रसन्न मन (सुमेधाः) उत्तम बुद्धि से युक्त तुझे और हे मेरे पूजनीयतम पिता आदि लोगो ! (वः) तुम्हारे लिए (ऊर्ज्जम्) पराक्रम तथा अन्नादि ऐश्वर्य को (बिभ्रत्) धारण करता हुआ तुम (गृहान्) गृहस्थों को (आ एमि) सब प्रकार से प्राप्त होता हूँ, उसी प्रकार तुम लोग भी मुझसे प्रसन्न होके वर्त्त करो ॥ ३ ॥ येषा॑म॒ध्येति॑ प्र॒वस॒न् येषु॑ सौमन॒सो ब॒हुः । गृ॒हानुप॑ह्वयामहे ते नौ॑ जानन्तु जान॒तः ॥ ४ ॥ उप॑हूताऽ इ॒ह गाव॒ऽ उप॑हूता अ॒जाव॑यः । अथो॒ऽअन्न॑स्य की॒लाल॒ऽ उप॑हूतो गृ॒हेषु॑ नः। क्षेमा॑य वः शान्त्यै॒ प्रप॑द्ये शि॒वः॒ शग्मः॒ शंयोः॒ शंयोः ॥ ५ ॥ —यजुः० अध्याय ३ । मं० ४२, ४३॥ अर्थ—हे गृहस्थो ! (प्रवसन्) परदेश को गया हुआ मनुष्य (येषाम्) जिनका (अध्येति) स्मरण करता है, (येषु) जिन गृहस्थों में (बहुः) बहुत (सौमनसः) प्रीति होती है, उन (गृहान्) गृहस्थों की हम विद्वान् लोग (उपह्वयामहे) प्रशंसा करते और उनको प्रीति से समीपस्थ बुलाते हैं। (ते) वे गृहस्थ लोग (जानतः) उन्हें जाननेवाले (नः) हम लोगों को (जानन्तु) सुहृद्

गृहाश्रमप्रकरणम् २०३ जानें। वैसे तुम गृहस्थ और हम संन्यासी लोग आपस में मिलके पुरुषार्थ से व्यवहार और परमार्थ की उन्नति सदा किया करें ॥४॥ हे गृहस्थो ! (नः) अपने (गृहेषु) घरों में जिस प्रकार (गावः) गौ आदि उत्तम पशु (उपहूताः) समीपस्थ हों तथा (अजावयः) बकरी, भेड़ आदि दूध देनेवाले पशु (उपहूताः) समीपस्थ हों, (अथो) इसके अनन्तर (अन्नस्य) अन्नादि पदार्थों के मध्य में उत्तम (कीलालः) अन्नादि पदार्थ (उपहूतः) प्राप्त होवे, हम लोग वैसा प्रयत्न किया करें। हे गृहस्थो ! मैं उपदेशक वा राजा (इह) इस गृहाश्रम में (वः) तुम्हारे (क्षेमाय) रक्षण तथा (शान्त्यै) निरुपद्रवता करने के लिए (प्रपद्ये) प्राप्त होता हूँ। मैं और आप लोग प्रीति से मिलके (शिवम्) कल्याण (शग्मम्) व्यावहारिक सुख और (शंयोः शंयोः) पारमार्थिक सुख को प्राप्त होके अन्य सब लोगों को सदा सुख दिया करें ॥५॥ सन्तुष्टो भार्यया भर्त्ता भर्त्रा भार्या तथैव च। यस्मिन्नेव कुले नित्यं कल्याणं तत्र वै ध्रुवम् ॥ १ ॥ यदि हि स्त्री न रोचेत पुमांसं न प्रमोदयेत्। अप्रमोदात् पुनः पुंसः प्रजनं न प्रवर्त्तते ॥ २ ॥ —मनु० ॥ अर्थ—हे गृहस्थो ! जिस कुल में भार्या से पति प्रसन्न और पति से भार्या सदा प्रसन्न रहती है, उसी कुल में निश्चित कल्याण होता है और दोनों परस्पर अप्रसन्न रहें तो उस कुल में नित्य कलह वास करता है ॥ १ ॥ यदि स्त्री-पुरुष पर रुचि न रक्खे वा पुरुष को प्रहर्षित न करे तो अप्रसन्नता से पुरुष के शरीर में कामोत्पत्ति कभी न होके सन्तान नहीं होते और यदि होते हैं तो दुष्ट होते हैं ॥ २ ॥ स्त्रियां तु रोचमानायां सर्वं तद् रोचते कुलम्। तस्यां त्वरोचमानायां सर्वमेव न रोचते ॥ ३ ॥ —मनु० ॥

२०४ संस्कारविधिः अर्थ—यदि पुरुष स्त्री को प्रसन्न नहीं करता, तो उस स्त्री के अप्रसन्न रहने से सब कुलभर अप्रसन्न=शोकातुर रहता है और जब पुरुष से स्त्री प्रसन्न रहती है, तब सब कुल आनन्दरूप दीखता है॥३॥ पितृभिर्भ्रातृभिश्चैताः पतिभिर्देवैस्तथा। पूज्या भूषयितव्याश्च बहुकल्याणमीप्सुभिः ॥४॥ यत्र नार्यस्तु पूज्यन्ते रमन्ते तत्र देवताः। यत्रैतास्तु न पूज्यन्ते सर्वास्तत्राफलाः क्रियाः॥५॥ शोचन्ति जामयो यत्र विनश्यत्याशु तत्कुलम्। न शोचन्ति तु यत्रैता वर्द्धते तद्धि सर्वदा ॥६॥ जामयो यानि गेहानि शपन्त्यप्रतिपूजिताः। तानि कृत्याहतानीव विनश्यन्ति समन्ततः ॥७॥ —मनु०॥ अर्थ—पिता, भ्राता, पति और देवर को योग्य है कि अपनी कन्या, बहिन, स्त्री और भौजाई आदि स्त्रियों की सदा पूजा करें, अर्थात् यथायोग्य मधुर भाषण, भोजन, वस्त्र, आभूषण आदि से उन्हें प्रसन्न रखें, जिन्हें कल्याण की इच्छा हो वे स्त्रियों को क्लेश कभी न देवें ॥४॥ जिस कुल में नारियों की पूजा, अर्थात् सत्कार होता है, उस कुल में दिव्य गुण, दिव्य भोग और उत्तम सन्तान होते हैं और जिस कुल में स्त्रियों की पूजा नहीं होती, वहाँ जानों उनकी सब क्रिया निष्फल हैं॥५॥ जिस कुल में स्त्रियाँ अपने-अपने पुरुषों के वेश्यागमन वा व्यभिचारादि दोषों से शोकातुर रहती हैं, वह कुल शीघ्र नाश को प्राप्त हो जाता है और जिस कुल में स्त्रियाँ पुरुषों के उत्तमाचरणों से प्रसन्न रहती हैं, वह कुल सर्वदा बढ़ता रहता है॥६॥ जिन कुल और घरों में अपूजित, अर्थात् सत्कार को न

गृहाश्रमप्रकरणम् २०५ प्राप्त होकर स्त्रियाँ जिन गृहस्थों को शाप देती हैं, वे कुल तथा गृहस्थ जैसे विष देकर बहुतों को एक बार नाश कर देवें, वैसे चारों ओर से नष्ट-भ्रष्ट हो जाते हैं॥७॥ तस्मादेताः सदा पूज्या भूषणाच्छादनाशनैः। भूतिकामैर्न रैर्नित्यं सत्कारेषूत्सवेषु च॥८॥ —मनु० ॥ अर्थ—इस कारण ऐश्वर्य की इच्छा करनेवाले पुरुषों को योग्य है कि सत्कार के अवसरों और उत्सवों में स्त्रियों की भूषण, वस्त्र, खान-पान आदि से सदा पूजा, अर्थात् सत्कार कर प्रसन्न रखें॥८॥ सदा प्रहृष्टया भाव्यं गृहकार्येषु दक्षया। सुसंस्कृतोपस्करया व्यये चामुक्तहस्तया॥९॥ —मनु० ॥ अर्थ—स्त्री को योग्य है कि सदा आनन्दित होके चतुरता से गृहकार्यों में वर्त्तमान रहे तथा अन्नादि के उत्तम संस्कार, पात्र, वस्त्र, गृह आदि के संस्कार और घर के भोजनादि में जितना धन आदि नित्य लगे, उस व्यय के यथायोग्य करने में सदा प्रसन्न रहें॥९॥ एताश्चान्याश्च लोकेऽस्मिन्नपकृष्टप्रसूतयः। उत्कर्षं योषितः प्राप्ताः स्वैः स्वैर्भर्तृगुणैः शुभैः ॥१०॥ अर्थ—यदि स्त्रियाँ दुष्टाचारयुक्त भी हों, तथापि इस संसार में बहुत स्त्रियाँ अपने-अपने पतियों के शुभ गुणों से उत्कृष्ट हो गईं, होती हैं और होंगी भी। इसलिए यदि पुरुष श्रेष्ठ हों तो स्त्रियाँ श्रेष्ठ और पुरुष दुष्ट हों तो स्त्रियाँ दुष्ट हो जाती हैं। इससे प्रथम मनुष्यों को उत्तम होके अपनी स्त्रियों को उत्तम करना चाहिए॥१०॥ प्रजनार्थं महाभागाः पूजार्हा गृहदीप्तयः। स्त्रियः श्रियश्च गेहेषु न विशेषोऽस्ति कश्चन॥११॥

२०६ संस्कारविधिः उत्पादनमपत्यस्य जातस्य परिपालनम्। प्रत्यहं लोकयात्रायाः प्रत्यक्षं स्त्रीनिबन्धनम्॥१२॥ अपत्यं धर्मकार्याणि शुश्रूषा रतिरुत्तमा। दाराधीनस्तथा स्वर्गः पितॄणामात्मनश्च ह॥१३॥ यथा वायुं समाश्रित्य वर्तन्ते सर्वजन्तवः। तथा गृहस्थमाश्रित्य वर्त्तन्ते सर्व आश्रमाः॥१४॥ —मनु०॥ अर्थ—हे पुरुषो! सन्तानोत्पत्ति के लिए महाभाग्योदय करनेहारी, पूजा के योग्य, गृहाश्रम को प्रकाशित करनेवाली, सन्तानोत्पत्ति करने-करानेवाली घरों में जो स्त्रियाँ हैं वे श्री, अर्थात् लक्ष्मीस्वरूप होती हैं, क्योंकि लक्ष्मी, शोभा, धन और स्त्रियों में कुछ भेद नहीं है॥११॥ हे पुरुषो! अपत्यों की उत्पत्ति, उत्पन्न का पालन करने आदि लोकव्यवहार का नित्यप्रति, जोकि गृहाश्रम का कार्य होता है, निबन्ध करनेवाली प्रत्यक्ष स्त्री ही है॥१२॥ सन्तानोत्पत्ति, धर्म-कार्य, उत्तम सेवा और रति तथा अपना और पितरों का जितना सुख है, वह सब स्त्री ही के अधीन होता है॥१३॥ जैसे वायु के आश्रय से सब जीवों का वर्त्तमान सिद्ध होता है, वैसे ही गृहस्थ के आश्रय से ब्रह्मचारी, वानप्रस्थ और संन्यासी, अर्थात् सब आश्रमों का निर्वाह होता है॥१४॥ यस्मात् त्रयोऽप्याश्रमिणो दानेनान्नेन चान्वहम्। गृहस्थेनैव धार्यन्ते तस्माज्ज्येष्ठाश्रमो गृही॥१५॥ स संधार्यः प्रयत्नेन स्वर्गमक्षयमिच्छता। सुखं चेहेच्छता नित्यं योऽधार्यो दुर्बलेन्द्रियैः॥१६॥ सर्वेषामपि चैतेषां वेदस्मृतिविधानतः। गृहस्थ उच्यते श्रेष्ठः त्रीनेतान् बिभर्ति हि॥१७॥

गृहाश्रमप्रकरणम् २०७ अर्थ—जिससे ब्रह्मचारी, वानप्रस्थ और संन्यासी—इन तीन आश्रमियों को अन्न, वस्त्रादि दान से नित्यप्रति गृहस्थ धारण, पोषण करता है, इसलिए व्यवहार में गृहाश्रम सबसे बड़ा है॥ १५ ॥ हे स्त्री-पुरुषो ! जो तुम अक्षय* मुक्ति-सुख और इस संसार के सुख की इच्छा रखते हो तो जो दुर्बलेन्द्रिय और निर्बुद्धि पुरुषों के धारण करने योग्य नहीं है, उस गृहाश्रम को नित्य प्रयत्न से धारण करो ॥ १६ ॥ वेद और स्मृति के प्रमाण से सब आश्रमों के बीच में गृहाश्रम श्रेष्ठ है, क्योंकि यही आश्रम ब्रह्मचारी आदि तीनों आश्रमों का धारण और पालन करता है ॥ १७ ॥ यथा नदीनदाः सर्वे सागरे यान्ति संस्थितिम्। तथैवाश्रमिणः सर्वे गृहस्थे यान्ति संस्थितिम् ॥ १८ ॥ उपासते ये गृहस्थाः परपाकमबुद्धयः । तेन ते प्रेत्य पशुतां व्रजन्त्यन्नादिदायिनाम् ॥ १९ ॥ आसनावसथौ शय्यामनुव्रज्यामुपासनाम्। उत्तमेषूत्तमं कुर्याद्धीनं हीने समे समम् ॥ २० ॥ पाषण्डिनो विकर्मस्थान्वैडालव्रतिकाञ्छठान्। हैतुकान्वकवृत्तींश्च वाङ्मात्रेणापि नार्चयेत् ॥ २१ ॥ अर्थ—हे मनुष्यो ! जैसे सब बड़े-बड़े नद और नदी सागर में जाकर स्थिर होते हैं, वैसे ही सब आश्रमी गृहस्थ ही को प्राप्त होके स्थिर होते हैं ॥ १८ ॥ यदि गृहस्थ होके पराये घर में भोजनादि की इच्छा करते हैं तो वे बुद्धिहीन गृहस्थ अन्य से प्रतिग्रहरूप पाप करके जन्मान्तर में अन्नादि के दाताओं के पशु बनते हैं, क्योंकि अन्य

  • अक्षय इतना ही मात्र है कि जितना समय मुक्ति का है, उतने समय में दुःख का संयोग, जैसा विषयेन्द्रिय के संयोगजन्य सुख में होता है, वैसा नहीं होता।

२०८ संस्कारविधिः से अन्नादि का ग्रहण करना अतिथियों का काम है, गृहस्थों का नहीं ॥ १९ ॥ जब गृहस्थ के समीप अतिथि आवें तब आसन, निवास, शय्या, पश्चाद्गमन और समीप में बैठना आदि सत्कार जैसे का वैसा, अर्थात् उत्तम का उत्तम, मध्यम का मध्यम और निकृष्ट का निकृष्ट करे। ऐसा न हो कि सब अन्न बारा बसेरी, कस्तूरी और धूड़ को बराबर कभी न समझे ॥ २० ॥ किन्तु जो पाखण्डी, वेदनिन्दक, नास्तिक—ईश्वर, वेद और धर्म को न माने, अधर्माचरण करनेहारे, हिंसक, शठ, मिथ्याभिमानी, कुतर्की और बकवृत्ति, अर्थात् पराये पदार्थ हरने वा बहकाने में बगुले के समान अतिथिवेशधारी बनके आवें, उनका वचनमात्र से भी सत्कार गृहस्थ कभी न करे ॥ २१ ॥ दशसूनासमं चक्रं दशचक्रसमो ध्वजः। दशध्वजममो वेषो दशवेषसमो नृपः ॥ २२ ॥ न लोकवृत्तं वर्तेत वृत्तिहेतोः कथंचन। अजिह्यामशठां शुद्धां जीवेद् ब्राह्मणजीविकाम् ॥ २३ ॥ सत्यधर्मार्यवृत्तेषु शौचे चैवारमेत् सदा। शिष्याँश्च शिष्याद् धर्मेण वाग्बाहूदरसंयतः ॥ २४ ॥ परित्यजेदर्थकामौ यौ स्यातां धर्मवर्जितौ। धर्मं चाप्यसुखोदर्कं लोकविक्रुष्टमेव च ॥ २५ ॥ —मनु० ॥ अर्थ—दश हत्या के समान चक्र अर्थात् कुम्हार, गाड़ी से जीविका करनेवाले, दश चक्र के समान ध्वज अर्थात् धोबी, मद्य को निकालकर बेचनेवाले, दश ध्वज के समान वेष, अर्थात् वेश्या, भडुआ, भाँड, दूसरे की नकल अर्थात् पाषाणमूर्तियों के पूजक (=पुजारी) आदि और दश वेष के समान अन्यायकारी जो राजा होता है, उनके अन्न आदि का ग्रहण अतिथि लोग कभी न करें ॥ २२ ॥

गृहाश्रमप्रकरणम् २०९ गृहस्थ जीविका के लिए भी कभी शास्त्रविरुद्ध लोकाचार का बर्त्ताव न वर्त्तें, किन्तु जिसमें किसी प्रकार की कुटिलता, मूर्खता, मिथ्यापन वा अधर्म न हो, उस वेदोक्त कर्म-सम्बन्धी जीविका को करे ॥ २३ ॥ सत्य धर्म, आर्य अर्थात् आप्त पुरुषों के व्यवहार और शौच = पवित्रता ही में सदा गृहस्थ लोग प्रवृत्त रहें और सत्यवाणी बोलते हुए, भोजनादि के लोभरहित, हस्तपादादि की कुचेष्टा छोड़कर धर्म से शिष्यों और सन्तानों को उत्तम शिक्षा सदा किया करें ॥ २४ ॥ यदि बहुत-सा धन, राज्य-प्राप्ति और अपनी कामना अधर्म से सिद्ध होती हो तो भी अधर्म को सर्वथा छोड़ देवें और वेदविरुद्ध धर्माभास जिसके करने से उत्तरकाल में दुःख और संसार की उन्नति का नाश हो, वैसा नाममात्र का धर्म कभी न किया करें ॥ २५ ॥ सर्वेषामेव शौचानामर्थशौचं परं स्मृतम्। योऽर्थे शुचिर्हि स शुचिर्न मृद्वारिशुचिः शुचिः ॥ २६ ॥ क्षान्त्या शुध्यन्ति विद्वांसो दानेनाकार्यकारिणः। प्रच्छन्नपापा जप्येन तपसा वेदवित्तमाः ॥ २७ ॥ अद्भिर्गात्राणि शुध्यन्ति मनः सत्येन शुध्यति। विद्यातपोभ्यां भूतात्मा बुद्धिर्ज्ञानेन शुध्यति ॥ २८ ॥ दशावरा वा परिषद् यं धर्मं परिकल्पयेत्। त्र्यवरा वापि वृत्तस्था तं धर्मं न विचालयेत् ॥ २९ ॥ दण्डः शास्ति प्रजाः सर्वा दण्ड एवाभिरक्षति। दण्डः सुप्तेषु जागर्त्ति दण्डं धर्मं विदुर्बुधाः ॥ ३० ॥ तस्याहुः संप्रणेतारं राजानं सत्यवादिनम्। समीक्ष्यकारिणं प्राज्ञं धर्मकामार्थकोविदम् ॥ ३१ ॥ —मनु० ॥

२१० संस्कारविधिः अर्थः—जो धर्म ही से पदार्थों का सञ्चय करना है, वही सब पवित्रताओं में उत्तम पवित्रता है, अर्थात् जो अन्याय से किसी पदार्थ का ग्रहण नहीं करता, वही पवित्र है, और जल- मृत्तिकादि से जो पवित्रता होती है, वह धर्म के सदृश उत्तम नहीं है॥२६॥ विद्वान् लोग क्षमा से, दुष्कर्मकारी सत्संग और विद्यादि शुभ गुणों के दान से, गुप्त पाप करनेवाले विचार से पापों को त्याग कर और ब्रह्मचर्य तथा सत्यभाषणादि से वेदवित् उत्तम विद्वान् शुद्ध होते हैं॥२७॥ जल से ऊपर के अङ्ग पवित्र होते हैं, आत्मा और मन नहीं। मन तो सत्य मानने, सत्य बोलने और सत्य करने से शुद्ध और जीवात्मा विद्या, योगाभ्यास और धर्माचरण ही से पवित्र तथा बुद्धि ज्ञान से ही शुद्ध होती है, जल मृत्तिकादि से नहीं॥२८॥ गृहस्थ लोग छोटों, बड़ों वा राजकार्यों के सिद्ध करने में कम-से-कम दश, अर्थात् ऋग्वेदज्ञ, यजुर्वेदज्ञ, सामवेदज्ञ, हैतुक (=नैयायिक), तर्ककर्त्ता, नैरुक्त (=निरुक्तशास्त्रज्ञ), धर्माध्यापक, ब्रह्मचारी, स्नातक और वानप्रस्थ विद्वानों, अथवा अतिन्यूनता करे तो तीन वेदवित् (=ऋग्वेदज्ञ, यजुर्वेदज्ञ और सामवेदज्ञ) विद्वानों की सभा से कर्त्तव्याकर्त्तव्य, धर्म और अधर्म का जैसा निश्चय हो, वैसा ही आचरण किया करें॥२९॥ और जैसा विद्वान् लोग दण्ड ही को धर्म जानते हैं, वैसा सब लोग जानें, क्योंकि दण्ड ही प्रजा का शासन, अर्थात् नियम में रखनेवाला, दण्ड ही सबका सब ओर से रक्षक और दण्ड ही सोते हुओं में जागता है। चोरादि दुष्ट भी दण्ड ही के भय से पापकर्म नहीं कर सकते॥३०॥ दण्ड को अच्छे प्रकार चलानेवाले उस राजा को श्रेष्ठ कहते हैं जो सत्यवादी, विचार करके ही कार्य का कर्त्ता, बुद्धिमान्,

गृहाश्रमप्रकरणम् २११ विद्वान्, धर्म, काम और अर्थ का यथावत् जाननेहारा हो ॥ ३१ ॥ सोऽसहायेन मूढेन लुब्धेनाकृतबुद्धिना। न शक्यो न्यायतो नेतुं सक्तेन विषयेषु च ॥ ३२ ॥ शुचिना सत्यसन्धेन यथाशास्त्रानुसारिणा। प्रणेतुं शक्यते दण्डः सुसहायेन धीमता ॥ ३३ ॥ अदण्ड्यान्दण्डयन्राजा दण्ड्याँश्चैवाप्यदण्डयन्। अयशो महदाप्नोति नरकं चैव गच्छति ॥ ३४ ॥ अर्थ—जो राजा उत्तम सहायसहित, मूढ़, लोभी, जिसने ब्रह्मचर्यादि उत्तम कर्मों से विद्या और बुद्धि की उन्नति नहीं की, जो विषयों में फँसा हुआ है, उससे वह दण्ड कभी न्यायपूर्वक नहीं चल सकता ॥ ३२ ॥ इसलिए जो पवित्र, सत्पुरुषों का संगी, राजनीतिशास्त्र के अनुकूल चलनेवाला, धार्मिक पुरुषों के सहाय से युक्त, बुद्धिमान् राजा हो, वही इस दण्ड को धारण करके चला सकता है ॥ ३३ ॥ जो राजा अनपराधियों को दण्ड देता और अपराधियों को दण्ड नहीं देता है, वह इस जन्म में बड़ी अपकीर्ति को प्राप्त होता और मरे पश्चात् नरक, अर्थात् महादुःख को पाता है ॥ ३४ ॥ मृगयाक्षा दिवास्वप्नः परिवादः स्त्रियो मदः। तौर्यत्रिकं वृथाट्या च कामजो दशको गणः ॥ ३५ ॥ पैशुन्यं साहसं द्रोह ईर्ष्याऽसूयार्थदूषणम्। वाग्दण्डजं च पारुष्यं क्रोधजोऽपि गणोऽष्टकः ॥ ३६ ॥ द्वयोरप्येतयोर्मूलं यं सर्वे कवयो विदुः। तं यत्नेन जयेल्लोभं तज्जावेतावुभौ गणौ ॥ ३७॥ अर्थ—मृगया अर्थात् शिकार खेलना, द्यूत और प्रसन्नता के लिए भी चौपड़ आदि खेलना, दिन में सोना, हँसी-ठट्ठा, मिथ्यावाद करना, स्त्रियों के साथ सदा अधिक निवास में मोहित होना, मद्यपानादि नशाओं का करना, गाना, बजाना, नाचना वा इनको देखना और वृथा इधर-उधर घूमते फिरना, ये दश दुर्गुण