संस्कार विधि (महर्षि दयानन्द सरस्वती - षोडश वैदिक संस्कार एवं गुरुकुल विधान सटीक)
Sanskar Vidhi of Maharshi Dayananda Saraswati
महर्षि स्वामी दयानन्द सरस्वती द्वारा
पृष्ठ 204, कुल 318 में से
संदर्भ में पढ़ें२०० संस्कारविधिः करो, (नाम च) नामकरण के पृष्ठ ७३-७६ में लिखे प्रमाणे शास्त्रोक्त संज्ञाधारण और उसके नियमों को भी (कीर्तिश्च) सत्याचरण से प्रशंसा का धारण और गुणों में दोषारोपणरूप निन्दा को छोड़ दो। (प्राणश्च) चिरकालपर्यन्त जीवन का धारण और उसके युक्ताहार-विहारादि साधन, (अपानश्च) सब दुःख दूर करने का उपाय और उसकी सामग्री, (चक्षुश्च) प्रत्यक्ष और अनुमान, उपमान, (श्रोत्रं च) शब्दप्रमाण और उसकी सामग्री को धारण किया करो ॥ २६ ॥ हे गृहस्थ लोगो ! (पयश्च) उत्तम जल, दूध और इसका शोधन और युक्ति से सेवन, (रसश्च) घृत, दूध, मधु आदि और इसका युक्ति से आहार-विहार, (अन्नं च) उत्तम चावल आदि अन्न और उसके उत्तम संस्कार किये (अन्नाद्यं च) खाने के योग्य पदार्थ और उसके साथ उत्तम दाल, शाक, कढ़ी आदि, (ऋतं च) सत्य मानना और सत्य मनवाना, (सत्यं च) सत्य बोलना और बुलवाना (इष्टं च) यज्ञ करना और कराना, (पूर्त्तं च) यज्ञ की सामग्री पूरी करना तथा जलाशय और आराम- वाटिका आदि का बनाना और बनवाना, (प्रजा च) प्रजा की उत्पत्ति, पालन और उन्नति सदा करनी तथा करानी, (पशवश्च) गाय आदि पशुओं का पालन और उन्नति सदा करनी तथा करानी चाहिए ॥ २७ ॥ कु॒र्वन्ने॒वेह कर्मा॑णि जिजीवि॒षेच्छ॒तँ समा॑:। ए॒वं त्वयि॒ नान्यथेतो॑ऽस्ति॒ न कर्म॑ लिप्यते॒ नरे॑ ॥ १ ॥ —य० अ० ४० । मन्त्र २ ॥ अर्थ—मैं परमात्मा सब मनुष्यों के लिए आज्ञा देता हूँ कि सब मनुष्य (इह) इस संसार में शरीर से समर्थ होके (कर्माणि) सत्कर्मों को (कुर्वन्नेव) करता-ही-करता (शतं समा:) सौ वर्षपर्यन्त (जिजीविषेत्) जीने की इच्छा करे, आलसी और प्रमादी कभी न होवे। (एवम्) इसी प्रकार उत्तम