संस्कार विधि (महर्षि दयानन्द सरस्वती - षोडश वैदिक संस्कार एवं गुरुकुल विधान सटीक)
Sanskar Vidhi of Maharshi Dayananda Saraswati
महर्षि स्वामी दयानन्द सरस्वती द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंगृहाश्रमप्रकरणम् २०१ कर्म करते हुए (त्वयि) तुझ (नरे) मनुष्य में (इतः) इस हेतु से (अन्यथा) उलटा पापरूप (कर्म) दुःखद कर्म (न लिप्यते) लिप्यमान कभी नहीं होता और तुम पापरूप कर्म में लिप्त कभी मत होओ। इस उत्तम कर्म से कुछ भी दुःख (नास्ति) नहीं होता, इसलिए तुम स्त्री-पुरुष सदा पुरुषार्थी होकर उत्तम कर्मों से अपनी और दूसरों की सदा उन्नति किया करो ॥१॥ पुनः स्त्री-पुरुष सदा निम्नलिखित मन्त्रों के अनुकूल इच्छा और आचरण किया करें। वे मन्त्र ये हैं— भूर्भुव॒: स्वः॑ सु॒प्रजाः॑ प्र॒जाभि॑: स्याथ्ꣳ सु॒वीरो॑ वी॒रैः सु॒पोषः॑ पोषैः॑। नर्य॑ प्र॒जां मे॑ पाहि शꣳस्य॑ प॒शून् मे॑ पा॒ह्यथ॑र्य पि॒तुं मे॑ पाहि॥२॥ गृहा॒ मा बि॑भीत॒ मा वे॑पध्व॒मूर्जं॒ बिभ्र॑त॒ऽएम॑सि। ऊर्जं॒ बिभ्र॑द्वः सु॒मनाः॑ सु॒मेधा गृ॒हानैमि॒ मन॑सा मोद॑मानः ॥ ३ ॥ —यजु० अ० ३। मन्त्र ३७, ४१ ॥ अर्थ—हे स्त्री वा पुरुष ! मैं तेरे वा अपने के सम्बन्ध से (भूर्भुवः स्वः) शारीरिक, वाचिक और मानस, अर्थात् त्रिविध सुख से युक्त होके (प्रजाभिः) मनुष्यादि उत्तम प्रजाओं के साथ (सुप्रजाः) उत्तम प्रजायुक्त (स्याम्) होऊँ। (वीरैः) उत्तम पुत्र, बन्धु, सम्बन्धी और भृत्यों से सह वर्त्तमान (सुवीरः) उत्तम वीरों से सहित होऊँ। (पोषैः) उत्तम पुष्टिकारक व्यवहारों से (सुपोषः) उत्तम पुष्टियुक्त होऊँ। हे (नर्य) मनुष्यों में सज्जन वीर स्वामिन्! (मे) मेरी (प्रजाम्) प्रजा की (पाहि) रक्षा कीजिए। हे (शंस्य) प्रशंसा करने योग्य स्वामिन्! आप (मे) मेरे (पशून्) पशुओं की (पाहि) रक्षा कीजिए। हे (अथर्य) अहिंसक, दयालो स्वामिन्! (मे) मेरे (पितुम्) अन्न आदि की (पाहि) रक्षा कीजिए। वैसे हे नारी! प्रशंसनीय गुणयुक्त तू मेरी प्रजा, मेरे पशु और मेरे अन्न की सदा रक्षा किया कर ॥२॥