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संस्कार विधि (महर्षि दयानन्द सरस्वती - षोडश वैदिक संस्कार एवं गुरुकुल विधान सटीक)

Sanskar Vidhi of Maharshi Dayananda Saraswati

महर्षि स्वामी दयानन्द सरस्वती द्वारा

DevanagariHindipublished318 पृष्ठ

गृहाश्रमप्रकरणम् २०१ कर्म करते हुए (त्वयि) तुझ (नरे) मनुष्य में (इतः) इस हेतु से (अन्यथा) उलटा पापरूप (कर्म) दुःखद कर्म (न लिप्यते) लिप्यमान कभी नहीं होता और तुम पापरूप कर्म में लिप्त कभी मत होओ। इस उत्तम कर्म से कुछ भी दुःख (नास्ति) नहीं होता, इसलिए तुम स्त्री-पुरुष सदा पुरुषार्थी होकर उत्तम कर्मों से अपनी और दूसरों की सदा उन्नति किया करो ॥१॥ पुनः स्त्री-पुरुष सदा निम्नलिखित मन्त्रों के अनुकूल इच्छा और आचरण किया करें। वे मन्त्र ये हैं— भूर्भुव॒: स्वः॑ सु॒प्रजाः॑ प्र॒जाभि॑: स्याथ्ꣳ सु॒वीरो॑ वी॒रैः सु॒पोषः॑ पोषैः॑। नर्य॑ प्र॒जां मे॑ पाहि शꣳस्य॑ प॒शून् मे॑ पा॒ह्यथ॑र्य पि॒तुं मे॑ पाहि॥२॥ गृहा॒ मा बि॑भीत॒ मा वे॑पध्व॒मूर्जं॒ बिभ्र॑त॒ऽएम॑सि। ऊर्जं॒ बिभ्र॑द्वः सु॒मनाः॑ सु॒मेधा गृ॒हानैमि॒ मन॑सा मोद॑मानः ॥ ३ ॥ —यजु० अ० ३। मन्त्र ३७, ४१ ॥ अर्थ—हे स्त्री वा पुरुष ! मैं तेरे वा अपने के सम्बन्ध से (भूर्भुवः स्वः) शारीरिक, वाचिक और मानस, अर्थात् त्रिविध सुख से युक्त होके (प्रजाभिः) मनुष्यादि उत्तम प्रजाओं के साथ (सुप्रजाः) उत्तम प्रजायुक्त (स्याम्) होऊँ। (वीरैः) उत्तम पुत्र, बन्धु, सम्बन्धी और भृत्यों से सह वर्त्तमान (सुवीरः) उत्तम वीरों से सहित होऊँ। (पोषैः) उत्तम पुष्टिकारक व्यवहारों से (सुपोषः) उत्तम पुष्टियुक्त होऊँ। हे (नर्य) मनुष्यों में सज्जन वीर स्वामिन्! (मे) मेरी (प्रजाम्) प्रजा की (पाहि) रक्षा कीजिए। हे (शंस्य) प्रशंसा करने योग्य स्वामिन्! आप (मे) मेरे (पशून्) पशुओं की (पाहि) रक्षा कीजिए। हे (अथर्य) अहिंसक, दयालो स्वामिन्! (मे) मेरे (पितुम्) अन्न आदि की (पाहि) रक्षा कीजिए। वैसे हे नारी! प्रशंसनीय गुणयुक्त तू मेरी प्रजा, मेरे पशु और मेरे अन्न की सदा रक्षा किया कर ॥२॥

२०२ संस्कारविधिः हे (गृहाः) गृहस्थ लोगो ! तुम विधिपूर्वक गृहाश्रम में प्रवेश करने से (मा बिभीत) मत डरो, (मा वेपध्वम्) मत कंपायमान होओ। (ऊर्ज्जम्) अन्न, पराक्रम तथा विद्यादि शुभगुण से युक्त होकर गृहाश्रम को (बिभ्रतः) धारण करते हुए तुम लोगों को हम सत्योपदेशक विद्वान् लोग (एमसि) प्राप्त होते और सत्योपदेश करते हैं और अन्न-पानाच्छादन, स्थान से तुम्हीं हमारा निर्वाह करते हो, इसलिए तुम्हारा गृहाश्रम व्यवहार में निवास सर्वोत्कृष्ट है। हे वरानने! जैसे मैं तेरा पति (मनसा) अन्तःकरण से (मोदमानः) आनन्दित (सुमनाः) प्रसन्न मन (सुमेधाः) उत्तम बुद्धि से युक्त तुझे और हे मेरे पूजनीयतम पिता आदि लोगो ! (वः) तुम्हारे लिए (ऊर्ज्जम्) पराक्रम तथा अन्नादि ऐश्वर्य को (बिभ्रत्) धारण करता हुआ तुम (गृहान्) गृहस्थों को (आ एमि) सब प्रकार से प्राप्त होता हूँ, उसी प्रकार तुम लोग भी मुझसे प्रसन्न होके वर्त्त करो ॥ ३ ॥ येषा॑म॒ध्येति॑ प्र॒वस॒न् येषु॑ सौमन॒सो ब॒हुः । गृ॒हानुप॑ह्वयामहे ते नौ॑ जानन्तु जान॒तः ॥ ४ ॥ उप॑हूताऽ इ॒ह गाव॒ऽ उप॑हूता अ॒जाव॑यः । अथो॒ऽअन्न॑स्य की॒लाल॒ऽ उप॑हूतो गृ॒हेषु॑ नः। क्षेमा॑य वः शान्त्यै॒ प्रप॑द्ये शि॒वः॒ शग्मः॒ शंयोः॒ शंयोः ॥ ५ ॥ —यजुः० अध्याय ३ । मं० ४२, ४३॥ अर्थ—हे गृहस्थो ! (प्रवसन्) परदेश को गया हुआ मनुष्य (येषाम्) जिनका (अध्येति) स्मरण करता है, (येषु) जिन गृहस्थों में (बहुः) बहुत (सौमनसः) प्रीति होती है, उन (गृहान्) गृहस्थों की हम विद्वान् लोग (उपह्वयामहे) प्रशंसा करते और उनको प्रीति से समीपस्थ बुलाते हैं। (ते) वे गृहस्थ लोग (जानतः) उन्हें जाननेवाले (नः) हम लोगों को (जानन्तु) सुहृद्

गृहाश्रमप्रकरणम् २०३ जानें। वैसे तुम गृहस्थ और हम संन्यासी लोग आपस में मिलके पुरुषार्थ से व्यवहार और परमार्थ की उन्नति सदा किया करें ॥४॥ हे गृहस्थो ! (नः) अपने (गृहेषु) घरों में जिस प्रकार (गावः) गौ आदि उत्तम पशु (उपहूताः) समीपस्थ हों तथा (अजावयः) बकरी, भेड़ आदि दूध देनेवाले पशु (उपहूताः) समीपस्थ हों, (अथो) इसके अनन्तर (अन्नस्य) अन्नादि पदार्थों के मध्य में उत्तम (कीलालः) अन्नादि पदार्थ (उपहूतः) प्राप्त होवे, हम लोग वैसा प्रयत्न किया करें। हे गृहस्थो ! मैं उपदेशक वा राजा (इह) इस गृहाश्रम में (वः) तुम्हारे (क्षेमाय) रक्षण तथा (शान्त्यै) निरुपद्रवता करने के लिए (प्रपद्ये) प्राप्त होता हूँ। मैं और आप लोग प्रीति से मिलके (शिवम्) कल्याण (शग्मम्) व्यावहारिक सुख और (शंयोः शंयोः) पारमार्थिक सुख को प्राप्त होके अन्य सब लोगों को सदा सुख दिया करें ॥५॥ सन्तुष्टो भार्यया भर्त्ता भर्त्रा भार्या तथैव च। यस्मिन्नेव कुले नित्यं कल्याणं तत्र वै ध्रुवम् ॥ १ ॥ यदि हि स्त्री न रोचेत पुमांसं न प्रमोदयेत्। अप्रमोदात् पुनः पुंसः प्रजनं न प्रवर्त्तते ॥ २ ॥ —मनु० ॥ अर्थ—हे गृहस्थो ! जिस कुल में भार्या से पति प्रसन्न और पति से भार्या सदा प्रसन्न रहती है, उसी कुल में निश्चित कल्याण होता है और दोनों परस्पर अप्रसन्न रहें तो उस कुल में नित्य कलह वास करता है ॥ १ ॥ यदि स्त्री-पुरुष पर रुचि न रक्खे वा पुरुष को प्रहर्षित न करे तो अप्रसन्नता से पुरुष के शरीर में कामोत्पत्ति कभी न होके सन्तान नहीं होते और यदि होते हैं तो दुष्ट होते हैं ॥ २ ॥ स्त्रियां तु रोचमानायां सर्वं तद् रोचते कुलम्। तस्यां त्वरोचमानायां सर्वमेव न रोचते ॥ ३ ॥ —मनु० ॥

२०४ संस्कारविधिः अर्थ—यदि पुरुष स्त्री को प्रसन्न नहीं करता, तो उस स्त्री के अप्रसन्न रहने से सब कुलभर अप्रसन्न=शोकातुर रहता है और जब पुरुष से स्त्री प्रसन्न रहती है, तब सब कुल आनन्दरूप दीखता है॥३॥ पितृभिर्भ्रातृभिश्चैताः पतिभिर्देवैस्तथा। पूज्या भूषयितव्याश्च बहुकल्याणमीप्सुभिः ॥४॥ यत्र नार्यस्तु पूज्यन्ते रमन्ते तत्र देवताः। यत्रैतास्तु न पूज्यन्ते सर्वास्तत्राफलाः क्रियाः॥५॥ शोचन्ति जामयो यत्र विनश्यत्याशु तत्कुलम्। न शोचन्ति तु यत्रैता वर्द्धते तद्धि सर्वदा ॥६॥ जामयो यानि गेहानि शपन्त्यप्रतिपूजिताः। तानि कृत्याहतानीव विनश्यन्ति समन्ततः ॥७॥ —मनु०॥ अर्थ—पिता, भ्राता, पति और देवर को योग्य है कि अपनी कन्या, बहिन, स्त्री और भौजाई आदि स्त्रियों की सदा पूजा करें, अर्थात् यथायोग्य मधुर भाषण, भोजन, वस्त्र, आभूषण आदि से उन्हें प्रसन्न रखें, जिन्हें कल्याण की इच्छा हो वे स्त्रियों को क्लेश कभी न देवें ॥४॥ जिस कुल में नारियों की पूजा, अर्थात् सत्कार होता है, उस कुल में दिव्य गुण, दिव्य भोग और उत्तम सन्तान होते हैं और जिस कुल में स्त्रियों की पूजा नहीं होती, वहाँ जानों उनकी सब क्रिया निष्फल हैं॥५॥ जिस कुल में स्त्रियाँ अपने-अपने पुरुषों के वेश्यागमन वा व्यभिचारादि दोषों से शोकातुर रहती हैं, वह कुल शीघ्र नाश को प्राप्त हो जाता है और जिस कुल में स्त्रियाँ पुरुषों के उत्तमाचरणों से प्रसन्न रहती हैं, वह कुल सर्वदा बढ़ता रहता है॥६॥ जिन कुल और घरों में अपूजित, अर्थात् सत्कार को न

गृहाश्रमप्रकरणम् २०५ प्राप्त होकर स्त्रियाँ जिन गृहस्थों को शाप देती हैं, वे कुल तथा गृहस्थ जैसे विष देकर बहुतों को एक बार नाश कर देवें, वैसे चारों ओर से नष्ट-भ्रष्ट हो जाते हैं॥७॥ तस्मादेताः सदा पूज्या भूषणाच्छादनाशनैः। भूतिकामैर्न रैर्नित्यं सत्कारेषूत्सवेषु च॥८॥ —मनु० ॥ अर्थ—इस कारण ऐश्वर्य की इच्छा करनेवाले पुरुषों को योग्य है कि सत्कार के अवसरों और उत्सवों में स्त्रियों की भूषण, वस्त्र, खान-पान आदि से सदा पूजा, अर्थात् सत्कार कर प्रसन्न रखें॥८॥ सदा प्रहृष्टया भाव्यं गृहकार्येषु दक्षया। सुसंस्कृतोपस्करया व्यये चामुक्तहस्तया॥९॥ —मनु० ॥ अर्थ—स्त्री को योग्य है कि सदा आनन्दित होके चतुरता से गृहकार्यों में वर्त्तमान रहे तथा अन्नादि के उत्तम संस्कार, पात्र, वस्त्र, गृह आदि के संस्कार और घर के भोजनादि में जितना धन आदि नित्य लगे, उस व्यय के यथायोग्य करने में सदा प्रसन्न रहें॥९॥ एताश्चान्याश्च लोकेऽस्मिन्नपकृष्टप्रसूतयः। उत्कर्षं योषितः प्राप्ताः स्वैः स्वैर्भर्तृगुणैः शुभैः ॥१०॥ अर्थ—यदि स्त्रियाँ दुष्टाचारयुक्त भी हों, तथापि इस संसार में बहुत स्त्रियाँ अपने-अपने पतियों के शुभ गुणों से उत्कृष्ट हो गईं, होती हैं और होंगी भी। इसलिए यदि पुरुष श्रेष्ठ हों तो स्त्रियाँ श्रेष्ठ और पुरुष दुष्ट हों तो स्त्रियाँ दुष्ट हो जाती हैं। इससे प्रथम मनुष्यों को उत्तम होके अपनी स्त्रियों को उत्तम करना चाहिए॥१०॥ प्रजनार्थं महाभागाः पूजार्हा गृहदीप्तयः। स्त्रियः श्रियश्च गेहेषु न विशेषोऽस्ति कश्चन॥११॥

२०६ संस्कारविधिः उत्पादनमपत्यस्य जातस्य परिपालनम्। प्रत्यहं लोकयात्रायाः प्रत्यक्षं स्त्रीनिबन्धनम्॥१२॥ अपत्यं धर्मकार्याणि शुश्रूषा रतिरुत्तमा। दाराधीनस्तथा स्वर्गः पितॄणामात्मनश्च ह॥१३॥ यथा वायुं समाश्रित्य वर्तन्ते सर्वजन्तवः। तथा गृहस्थमाश्रित्य वर्त्तन्ते सर्व आश्रमाः॥१४॥ —मनु०॥ अर्थ—हे पुरुषो! सन्तानोत्पत्ति के लिए महाभाग्योदय करनेहारी, पूजा के योग्य, गृहाश्रम को प्रकाशित करनेवाली, सन्तानोत्पत्ति करने-करानेवाली घरों में जो स्त्रियाँ हैं वे श्री, अर्थात् लक्ष्मीस्वरूप होती हैं, क्योंकि लक्ष्मी, शोभा, धन और स्त्रियों में कुछ भेद नहीं है॥११॥ हे पुरुषो! अपत्यों की उत्पत्ति, उत्पन्न का पालन करने आदि लोकव्यवहार का नित्यप्रति, जोकि गृहाश्रम का कार्य होता है, निबन्ध करनेवाली प्रत्यक्ष स्त्री ही है॥१२॥ सन्तानोत्पत्ति, धर्म-कार्य, उत्तम सेवा और रति तथा अपना और पितरों का जितना सुख है, वह सब स्त्री ही के अधीन होता है॥१३॥ जैसे वायु के आश्रय से सब जीवों का वर्त्तमान सिद्ध होता है, वैसे ही गृहस्थ के आश्रय से ब्रह्मचारी, वानप्रस्थ और संन्यासी, अर्थात् सब आश्रमों का निर्वाह होता है॥१४॥ यस्मात् त्रयोऽप्याश्रमिणो दानेनान्नेन चान्वहम्। गृहस्थेनैव धार्यन्ते तस्माज्ज्येष्ठाश्रमो गृही॥१५॥ स संधार्यः प्रयत्नेन स्वर्गमक्षयमिच्छता। सुखं चेहेच्छता नित्यं योऽधार्यो दुर्बलेन्द्रियैः॥१६॥ सर्वेषामपि चैतेषां वेदस्मृतिविधानतः। गृहस्थ उच्यते श्रेष्ठः त्रीनेतान् बिभर्ति हि॥१७॥

गृहाश्रमप्रकरणम् २०७ अर्थ—जिससे ब्रह्मचारी, वानप्रस्थ और संन्यासी—इन तीन आश्रमियों को अन्न, वस्त्रादि दान से नित्यप्रति गृहस्थ धारण, पोषण करता है, इसलिए व्यवहार में गृहाश्रम सबसे बड़ा है॥ १५ ॥ हे स्त्री-पुरुषो ! जो तुम अक्षय* मुक्ति-सुख और इस संसार के सुख की इच्छा रखते हो तो जो दुर्बलेन्द्रिय और निर्बुद्धि पुरुषों के धारण करने योग्य नहीं है, उस गृहाश्रम को नित्य प्रयत्न से धारण करो ॥ १६ ॥ वेद और स्मृति के प्रमाण से सब आश्रमों के बीच में गृहाश्रम श्रेष्ठ है, क्योंकि यही आश्रम ब्रह्मचारी आदि तीनों आश्रमों का धारण और पालन करता है ॥ १७ ॥ यथा नदीनदाः सर्वे सागरे यान्ति संस्थितिम्। तथैवाश्रमिणः सर्वे गृहस्थे यान्ति संस्थितिम् ॥ १८ ॥ उपासते ये गृहस्थाः परपाकमबुद्धयः । तेन ते प्रेत्य पशुतां व्रजन्त्यन्नादिदायिनाम् ॥ १९ ॥ आसनावसथौ शय्यामनुव्रज्यामुपासनाम्। उत्तमेषूत्तमं कुर्याद्धीनं हीने समे समम् ॥ २० ॥ पाषण्डिनो विकर्मस्थान्वैडालव्रतिकाञ्छठान्। हैतुकान्वकवृत्तींश्च वाङ्मात्रेणापि नार्चयेत् ॥ २१ ॥ अर्थ—हे मनुष्यो ! जैसे सब बड़े-बड़े नद और नदी सागर में जाकर स्थिर होते हैं, वैसे ही सब आश्रमी गृहस्थ ही को प्राप्त होके स्थिर होते हैं ॥ १८ ॥ यदि गृहस्थ होके पराये घर में भोजनादि की इच्छा करते हैं तो वे बुद्धिहीन गृहस्थ अन्य से प्रतिग्रहरूप पाप करके जन्मान्तर में अन्नादि के दाताओं के पशु बनते हैं, क्योंकि अन्य

  • अक्षय इतना ही मात्र है कि जितना समय मुक्ति का है, उतने समय में दुःख का संयोग, जैसा विषयेन्द्रिय के संयोगजन्य सुख में होता है, वैसा नहीं होता।

२०८ संस्कारविधिः से अन्नादि का ग्रहण करना अतिथियों का काम है, गृहस्थों का नहीं ॥ १९ ॥ जब गृहस्थ के समीप अतिथि आवें तब आसन, निवास, शय्या, पश्चाद्गमन और समीप में बैठना आदि सत्कार जैसे का वैसा, अर्थात् उत्तम का उत्तम, मध्यम का मध्यम और निकृष्ट का निकृष्ट करे। ऐसा न हो कि सब अन्न बारा बसेरी, कस्तूरी और धूड़ को बराबर कभी न समझे ॥ २० ॥ किन्तु जो पाखण्डी, वेदनिन्दक, नास्तिक—ईश्वर, वेद और धर्म को न माने, अधर्माचरण करनेहारे, हिंसक, शठ, मिथ्याभिमानी, कुतर्की और बकवृत्ति, अर्थात् पराये पदार्थ हरने वा बहकाने में बगुले के समान अतिथिवेशधारी बनके आवें, उनका वचनमात्र से भी सत्कार गृहस्थ कभी न करे ॥ २१ ॥ दशसूनासमं चक्रं दशचक्रसमो ध्वजः। दशध्वजममो वेषो दशवेषसमो नृपः ॥ २२ ॥ न लोकवृत्तं वर्तेत वृत्तिहेतोः कथंचन। अजिह्यामशठां शुद्धां जीवेद् ब्राह्मणजीविकाम् ॥ २३ ॥ सत्यधर्मार्यवृत्तेषु शौचे चैवारमेत् सदा। शिष्याँश्च शिष्याद् धर्मेण वाग्बाहूदरसंयतः ॥ २४ ॥ परित्यजेदर्थकामौ यौ स्यातां धर्मवर्जितौ। धर्मं चाप्यसुखोदर्कं लोकविक्रुष्टमेव च ॥ २५ ॥ —मनु० ॥ अर्थ—दश हत्या के समान चक्र अर्थात् कुम्हार, गाड़ी से जीविका करनेवाले, दश चक्र के समान ध्वज अर्थात् धोबी, मद्य को निकालकर बेचनेवाले, दश ध्वज के समान वेष, अर्थात् वेश्या, भडुआ, भाँड, दूसरे की नकल अर्थात् पाषाणमूर्तियों के पूजक (=पुजारी) आदि और दश वेष के समान अन्यायकारी जो राजा होता है, उनके अन्न आदि का ग्रहण अतिथि लोग कभी न करें ॥ २२ ॥

गृहाश्रमप्रकरणम् २०९ गृहस्थ जीविका के लिए भी कभी शास्त्रविरुद्ध लोकाचार का बर्त्ताव न वर्त्तें, किन्तु जिसमें किसी प्रकार की कुटिलता, मूर्खता, मिथ्यापन वा अधर्म न हो, उस वेदोक्त कर्म-सम्बन्धी जीविका को करे ॥ २३ ॥ सत्य धर्म, आर्य अर्थात् आप्त पुरुषों के व्यवहार और शौच = पवित्रता ही में सदा गृहस्थ लोग प्रवृत्त रहें और सत्यवाणी बोलते हुए, भोजनादि के लोभरहित, हस्तपादादि की कुचेष्टा छोड़कर धर्म से शिष्यों और सन्तानों को उत्तम शिक्षा सदा किया करें ॥ २४ ॥ यदि बहुत-सा धन, राज्य-प्राप्ति और अपनी कामना अधर्म से सिद्ध होती हो तो भी अधर्म को सर्वथा छोड़ देवें और वेदविरुद्ध धर्माभास जिसके करने से उत्तरकाल में दुःख और संसार की उन्नति का नाश हो, वैसा नाममात्र का धर्म कभी न किया करें ॥ २५ ॥ सर्वेषामेव शौचानामर्थशौचं परं स्मृतम्। योऽर्थे शुचिर्हि स शुचिर्न मृद्वारिशुचिः शुचिः ॥ २६ ॥ क्षान्त्या शुध्यन्ति विद्वांसो दानेनाकार्यकारिणः। प्रच्छन्नपापा जप्येन तपसा वेदवित्तमाः ॥ २७ ॥ अद्भिर्गात्राणि शुध्यन्ति मनः सत्येन शुध्यति। विद्यातपोभ्यां भूतात्मा बुद्धिर्ज्ञानेन शुध्यति ॥ २८ ॥ दशावरा वा परिषद् यं धर्मं परिकल्पयेत्। त्र्यवरा वापि वृत्तस्था तं धर्मं न विचालयेत् ॥ २९ ॥ दण्डः शास्ति प्रजाः सर्वा दण्ड एवाभिरक्षति। दण्डः सुप्तेषु जागर्त्ति दण्डं धर्मं विदुर्बुधाः ॥ ३० ॥ तस्याहुः संप्रणेतारं राजानं सत्यवादिनम्। समीक्ष्यकारिणं प्राज्ञं धर्मकामार्थकोविदम् ॥ ३१ ॥ —मनु० ॥

२१० संस्कारविधिः अर्थः—जो धर्म ही से पदार्थों का सञ्चय करना है, वही सब पवित्रताओं में उत्तम पवित्रता है, अर्थात् जो अन्याय से किसी पदार्थ का ग्रहण नहीं करता, वही पवित्र है, और जल- मृत्तिकादि से जो पवित्रता होती है, वह धर्म के सदृश उत्तम नहीं है॥२६॥ विद्वान् लोग क्षमा से, दुष्कर्मकारी सत्संग और विद्यादि शुभ गुणों के दान से, गुप्त पाप करनेवाले विचार से पापों को त्याग कर और ब्रह्मचर्य तथा सत्यभाषणादि से वेदवित् उत्तम विद्वान् शुद्ध होते हैं॥२७॥ जल से ऊपर के अङ्ग पवित्र होते हैं, आत्मा और मन नहीं। मन तो सत्य मानने, सत्य बोलने और सत्य करने से शुद्ध और जीवात्मा विद्या, योगाभ्यास और धर्माचरण ही से पवित्र तथा बुद्धि ज्ञान से ही शुद्ध होती है, जल मृत्तिकादि से नहीं॥२८॥ गृहस्थ लोग छोटों, बड़ों वा राजकार्यों के सिद्ध करने में कम-से-कम दश, अर्थात् ऋग्वेदज्ञ, यजुर्वेदज्ञ, सामवेदज्ञ, हैतुक (=नैयायिक), तर्ककर्त्ता, नैरुक्त (=निरुक्तशास्त्रज्ञ), धर्माध्यापक, ब्रह्मचारी, स्नातक और वानप्रस्थ विद्वानों, अथवा अतिन्यूनता करे तो तीन वेदवित् (=ऋग्वेदज्ञ, यजुर्वेदज्ञ और सामवेदज्ञ) विद्वानों की सभा से कर्त्तव्याकर्त्तव्य, धर्म और अधर्म का जैसा निश्चय हो, वैसा ही आचरण किया करें॥२९॥ और जैसा विद्वान् लोग दण्ड ही को धर्म जानते हैं, वैसा सब लोग जानें, क्योंकि दण्ड ही प्रजा का शासन, अर्थात् नियम में रखनेवाला, दण्ड ही सबका सब ओर से रक्षक और दण्ड ही सोते हुओं में जागता है। चोरादि दुष्ट भी दण्ड ही के भय से पापकर्म नहीं कर सकते॥३०॥ दण्ड को अच्छे प्रकार चलानेवाले उस राजा को श्रेष्ठ कहते हैं जो सत्यवादी, विचार करके ही कार्य का कर्त्ता, बुद्धिमान्,

गृहाश्रमप्रकरणम् २११ विद्वान्, धर्म, काम और अर्थ का यथावत् जाननेहारा हो ॥ ३१ ॥ सोऽसहायेन मूढेन लुब्धेनाकृतबुद्धिना। न शक्यो न्यायतो नेतुं सक्तेन विषयेषु च ॥ ३२ ॥ शुचिना सत्यसन्धेन यथाशास्त्रानुसारिणा। प्रणेतुं शक्यते दण्डः सुसहायेन धीमता ॥ ३३ ॥ अदण्ड्यान्दण्डयन्राजा दण्ड्याँश्चैवाप्यदण्डयन्। अयशो महदाप्नोति नरकं चैव गच्छति ॥ ३४ ॥ अर्थ—जो राजा उत्तम सहायसहित, मूढ़, लोभी, जिसने ब्रह्मचर्यादि उत्तम कर्मों से विद्या और बुद्धि की उन्नति नहीं की, जो विषयों में फँसा हुआ है, उससे वह दण्ड कभी न्यायपूर्वक नहीं चल सकता ॥ ३२ ॥ इसलिए जो पवित्र, सत्पुरुषों का संगी, राजनीतिशास्त्र के अनुकूल चलनेवाला, धार्मिक पुरुषों के सहाय से युक्त, बुद्धिमान् राजा हो, वही इस दण्ड को धारण करके चला सकता है ॥ ३३ ॥ जो राजा अनपराधियों को दण्ड देता और अपराधियों को दण्ड नहीं देता है, वह इस जन्म में बड़ी अपकीर्ति को प्राप्त होता और मरे पश्चात् नरक, अर्थात् महादुःख को पाता है ॥ ३४ ॥ मृगयाक्षा दिवास्वप्नः परिवादः स्त्रियो मदः। तौर्यत्रिकं वृथाट्या च कामजो दशको गणः ॥ ३५ ॥ पैशुन्यं साहसं द्रोह ईर्ष्याऽसूयार्थदूषणम्। वाग्दण्डजं च पारुष्यं क्रोधजोऽपि गणोऽष्टकः ॥ ३६ ॥ द्वयोरप्येतयोर्मूलं यं सर्वे कवयो विदुः। तं यत्नेन जयेल्लोभं तज्जावेतावुभौ गणौ ॥ ३७॥ अर्थ—मृगया अर्थात् शिकार खेलना, द्यूत और प्रसन्नता के लिए भी चौपड़ आदि खेलना, दिन में सोना, हँसी-ठट्ठा, मिथ्यावाद करना, स्त्रियों के साथ सदा अधिक निवास में मोहित होना, मद्यपानादि नशाओं का करना, गाना, बजाना, नाचना वा इनको देखना और वृथा इधर-उधर घूमते फिरना, ये दश दुर्गुण

२१२ संस्कारविधिः काम से उत्पन्न होते हैं ॥ ३५ ॥ चुगली खाना, बिना विचारे काम कर बैठना, जिस किसी से वृथा वैर बाँधना, दूसरे की स्तुति सुन वा बढ़ती देखके हृदय में जला करना, दूसरों के गुणों में दोष और दोषों में गुण स्थापन करना, बुरे कामों में धन का लगाना, क्रूर वाणी बोलना और बिना विचारे पक्षपात से किसी को कड़ा दण्ड देना, ये आठ दोष क्रोधी पुरुष में उत्पन्न होते हैं। ये अठारह दुर्गुण हैं, इनको राजा अवश्य छोड़ देवे ॥ ३६ ॥ कामज और क्रोधज अठारह दोषों का मूल जिस लोभ को सब विद्वान् लोग जानते हैं, उसे प्रयत्न से राजा जीते, क्योंकि लोभ ही से पूर्वोक्त अठारह और अन्य भी बहुत-से दोष होते हैं। इसलिए हे गृहस्थ लोगो ! चाहे वह राजा का ज्येष्ठ पुत्र क्यों न हो, परन्तु ऐसे दोषवाले मनुष्य को राजा कभी न करना। यदि भूल से हुआ हो तो उसको राज्य से च्युत करके किसी योग्य पुरुष को, जोकि राजा के कुल का हो, राज्याधिकारी करना, तभी प्रजा में आनन्द-मङ्गल सदा बढ़ता रहेगा ॥ ३७ ॥ सैन्यापत्यं च राज्यं च दण्डनेतृत्वमेव च। सर्वलोकाधिपत्यं च वेदशास्त्रविदर्हति ॥ ३८ ॥ मौलान्शास्त्रविदः शूरान्लब्धलक्षान्कुलोद्गतान्। सचिवान् सप्त चाष्टौ वा प्रकुर्वीत परीक्षितान् ॥ ३९ ॥ अन्यानपि प्रकुर्वीत शुचीन् प्राज्ञानवस्थितान् । सम्यगर्थसमाहर्तॄन् अमात्यान् सुपरीक्षितान् ॥ ४० ॥ अर्थ—जो वेदशास्त्रवित्, धर्मात्मा, जितेन्द्रिय, न्यायकारी और आत्मा के बल से युक्त पुरुष होवे, उसी को सेना, राज्य, दण्डनीति और प्रधान पद का अधिकार देना, अन्य क्षुद्राशयों को नहीं ॥ ३८ ॥ जो अपने राज्य में उत्पन्न, शास्त्रों के जाननेवाले, शूरवीर, जिनका विचार निष्फल न होवे, कुलीन, धर्मात्मा, स्वराज्यभक्त

गृहाश्रमप्रकरणम् २१३ हों, उन सात वा आठ पुरुषों को अच्छी प्रकार परीक्षा करके मन्त्री करे और इन्हीं की सभा में आठवाँ वा नौवाँ राजा हो। ये सब मिलके कर्त्तव्याकर्त्तव्य कामों का विचार किया करें॥ ३९ ॥ इसी प्रकार अन्य भी राज्य और सेना के अधिकारी, जितने पुरुषों से राज्यकार्य सिद्ध हो सके, उतने ही पवित्र, धार्मिक विद्वान्, चतुर, स्थिरबुद्धि पुरुषों को राज्य-सामग्री के वर्धक नियत करे॥ ४० ॥ दूतं चैव प्रकुर्वीत सर्वशास्त्रविशारदम्। इङ्गिताकारचेष्टज्ञं शुचिं दक्षं कुलोद्गतम् ॥ ४१ ॥ अलब्धमिच्छेद् दण्डेन लब्धं रक्षेद्‌वेक्षया। रक्षितं वर्धयेद् वृद्ध्या वृद्धं पात्रेषु निःक्षिपेत् ॥ ४२ ॥ —मनु० ॥ अर्थ—जो सब शास्त्रों में निपुण, नेत्रादि के संकेतस्वरूप तथा चेष्टा से दूसरे के हृदय की बात को जाननेवाला, शुद्ध, बड़ा स्मृतिमान्, देशकाल को जाननेवाला, जिसका स्वस्वरूप सुन्दर, बड़ा वक्ता और अपने कुल में मुख्य हो, उस और स्वराज्य और पर-राज्य के समाचार देनेवाले अन्य दूतों को भी नियत करे ॥ ४१ ॥ राजादि राजपुरुष अलब्ध राज्य की प्राप्ति की इच्छा दण्ड से, और प्राप्त राज्य की रक्षा सँभाल से, रक्षित राज्य और धन को व्यापार और ब्याज से बढ़ा और सुपात्रों के द्वारा सत्यविद्या और सत्यधर्म के प्रचार आदि उत्तम व्यवहारों में बढ़े हुए धन आदि पदार्थों का व्यय करके सबकी उन्नति सदा किया करें ॥ ४२ ॥ विधि—सदा स्त्री-पुरुष दश बजे शयन और रात्रि के पिछले प्रहर वा चार बजे उठके प्रथम हृदय में परमेश्वर का चिन्तन करके धर्म और अर्थ का विचार किया करें और धर्म और अर्थ के अनुष्ठान वा उद्योग करने में यदि कभी पीड़ा भी

२१४ संस्कारविधिः हो, तथापि धर्मयुक्त पुरुषार्थ को कभी न छोड़ें, किन्तु सदा शरीर और आत्मा की रक्षा के लिए युक्त आहार-विहार, औषधसेवन, सुपथ्य आदि से निरन्तर उद्योग करके व्यावहारिक और पारमार्थिक कर्त्तव्य कर्म की सिद्धि के लिए ईश्वर की स्तुति, प्रार्थना, उपासना भी किया करें कि जिससे परमेश्वर की कृपादृष्टि और सहाय से महाकठिन कार्य भी सुगमता से सिद्ध हो सकें। इसके लिए निम्नलिखित मन्त्र हैं— प्रा॒तर॒ग्निं प्रा॒तरिन्द्रं॑ हवामहे प्रा॒तर्मित्रावरु॑णा प्रा॒तर॒श्विना॑। प्रा॒तर्भ गं॑ पू॒षणं॒ ब्रह्म॑ण॒स्पतिं॑ प्रा॒तः सोम॑मु॒त रु॒द्रं हु॑वेम॑॥ १ ॥ प्रा॒त॒र्जितं॒ भग॑मु॒ग्रं हु॑वेम व॒यं पु॒त्रमदि॑ते॒र्यो वि॑ध॒र्त्ता। आ॒ध्रश्चि॒द्यं मन्य॑मानस्तु॒रश्चि॒द्राजा॑ चि॒द्यं भगं॑ भ॒क्षीत्याह॑॥ २ ॥ १. हे स्त्री-पुरुषो! जैसे हम विद्वान् उपदेशक लोग (प्रातः) प्रभात- वेला में (अग्निम्) स्वप्रकाशस्वरूप (प्रातः) (इन्द्रम्) परमैश्वर्य के दाता और परमैश्वर्ययुक्त (प्रातः) (मित्रावरुणा) प्राण-उदान के समान प्रिय और सर्वशक्तिमान् (प्रातः) (अश्विना) सूर्य चन्द्र को जिसने उत्पन्न किया है, उस परमात्मा की (हवामहे) स्तुति करते हैं, और (प्रातः) (भगम्) भजनीय=सेवनीय, ऐश्वर्ययुक्त (पूषणम्) पुष्टिकर्त्ता (ब्रह्मणस्पतिम्) अपने उपासक, वेद और ब्रह्माण्ड के पालन करनेहारे (प्रातः) (सोमम्) अन्तर्यामी प्रेरक (उत) और (रुद्रम्) पापियों को रुलानेहारे और सर्वरोगनाशक जगदीश्वर की (हुवेम) स्तुति-प्रार्थना करते हैं, वैसे प्रातः समय में तुम लोग भी किया करो॥ १ ॥ २. (प्रातः) पाँच घड़ी रात्रि रहे (जितम्) जयशील (भगम्) ऐश्वर्य के दाता (उग्रम्) तेजस्वी (अदितेः) अन्तरिक्ष के (पुत्रम्) पुत्ररूप सूर्य की उत्पत्ति करनेहारे और (यः) जोकि सूर्यादि लोकों का (विधर्त्ता) विशेष करके धारण करनेहारा (आध्रः) सब ओर से धारणकर्त्ता (यं चित्) जिस किसी का भी (मन्यमानः) जाननेहारा (तुरश्चित्) दुष्टों को भी दण्डदाता और (राजा) सबका प्रकाशक

गृहाश्रमप्रकरणम् २१५ भग॒ प्रणे॑त॒र्भग॒ सत्य॑राधो॒ भगे॒मां धिय॒मुद॑वा॒ दद॑न्नः। भग॒ प्र णो॑ जनय॒ गोभि॒रश्वै॒र्भग॒ प्र नृभि॑र्नृ॒वन्तः॑ स्याम१॥३॥ उ॒तेदानीं॒ भग॑वन्तः स्याम॒ोत प्रपि॒त्व उ॒त म॒ध्ये अह्ना॑म्। उ॒तोदि॑ता मघव॒न्त्सूर्य॑स्य व॒यं दे॒वानां॑ सु॒मतौ स्या॑म२॥४॥ है, (यम्) जिस (भगम्) भजनीयस्वरूप को (चित्) भी (भक्षीति) इस प्रकार सेवन करता हूँ, और इसी प्रकार भगवान् परमेश्वर सबको (आह) उपदेश करता है कि तुम, जो मैं सूर्यादि जगत् को बनाने और धारण करनेहारा हूँ, उस मेरी उपासना किया, और मेरी आज्ञा में चला करो, जिससे तुम लोग सदा उन्नतिशील रहो, इससे (वयम्) हमलोग उसकी (हुवेम) स्तुति करते हैं॥२॥ १. हे (भग) भजनीयस्वरूप (प्रणेतः) सबके उत्पादक, सत्याचार में प्रेरक (भग) ऐश्वर्यप्रद (सत्यराधः) सत्य धन को देनेहारे (भग) सत्याचरण करनेहारों को ऐश्वर्यदाता आप परमेश्वर! (नः) हमको (इमाम्) इस (धियम्) प्रज्ञा को (ददत्) दीजिए, और उसके दान से हमारी (उदव) रक्षा कीजिए। हे (भग) आप (गोभिः) गाय आदि और (अश्वैः) घोड़े आदि उत्तम पशुओं के योग से राज्यश्री को (नः) हमारे लिए (प्रजनय) प्रकट कीजिए, हे (भग) आपकी कृपा से हम लोग (नृभिः) उत्तम मनुष्यों से (नृवन्तः) बहुत वीर मनुष्यवाले (प्र स्याम) अच्छे प्रकार होवें॥३॥ २. हे भगवन्! आपकी कृपा (उत) और अपने पुरुषार्थ से हम लोग (इदानीम्) इसी समय (प्रपित्वे) प्रकर्षता, उत्तमता की प्राप्ति में (उत) और (अह्नाम्) इन दिनों के (मध्ये) मध्य में (भगवन्तः) ऐश्वर्ययुक्त और शक्तिमान् (स्याम) होवें, (उत) और हे (मघवन्) परमपूजित असंख्य धन देनेहारे! (सूर्यस्य) सूर्यलोक के (उदिता) उदय में (देवानाम्) पूर्ण विद्वान्, धार्मिक, आप्त लोगों की (सुमतौ) अच्छी उत्तम प्रज्ञा (उत) और सुमति में (वयम्) हम लोग (स्याम) सदा प्रवृत्त रहें॥४॥

२१६ संस्कारविधिः भग॑ एव भग॑वाँ अस्तु देवा॒स्तेन॑ व॒यं भग॑वन्तः स्याम । तं त्वा॑ भग॒ सर्व॒ इज्जो॑हवीति॒ स नो॑ भग पुरए॒त भ॑वे॒ह¹ ॥ ५ ॥ —ऋ० मं० ७ । सू० ४१ ॥ इस प्रकार परमेश्वर की प्रार्थना-उपासना करनी ॥ तत्पश्चात् शौच, दन्तधावन, मुखप्रक्षालन करके स्नान करें। पश्चात् एक कोश वा डेढ़ कोश एकान्त जङ्गल में जाके योगाभ्यास की रीति से परमेश्वर की उपासना कर, सूर्योदय- पर्यन्त अथवा घड़ी, आध घड़ी दिन चढ़े तक घर में आके, सन्ध्योपासनादि नित्यकर्म नीचे लिखे प्रमाणे यथाविधि उचित समय में किया करें। इन नित्य करने के योग्य कर्मों में लिखे हुए मन्त्रों का अर्थ और प्रमाण पञ्चमहायज्ञविधि में देख लेवें। प्रथम शरीरशुद्धि, अर्थात् स्नान-पर्यन्त कर्म करके सन्ध्योपासन का आरम्भ करें। आरम्भ में दक्षिण हस्त में जल लेके— ओम् अमृतोपस्तरणमसि स्वाहा ॥ १ ॥ ओम् अमृतापिधानमसि स्वाहा ॥ २ ॥ ओं सत्यं यशः श्रीम॑यि श्रीः श्रयतां स्वाहा ॥ ३ ॥ १. हे (भग) सकलैश्वर्यसम्पन्न जगदीश्वर ! जिससे (तम्) उस (त्वा) आपकी (सर्वः) सब सज्जन (इज्जोहवीति) निश्चय करके प्रशंसा करते हैं, (सः) सो आप हे (भग) ऐश्वर्यप्रद ! (इह) इस संसार और (नः) हमारे गृहाश्रम में (पुरएता) अग्रगामी और आगे- आगे सत्यकर्मों में बढ़ानेहारे (भव) हूजिए; और जिससे (भग एव) सम्पूर्ण ऐश्वर्ययुक्त और समस्त ऐश्वर्य के दाता होने से आप ही हमारे (भगवान्) पूजनीय देव (अस्तु) हूजिए, (तेन) उसी हेतु से (देवाः वयम्) हम विद्वान् लोग (भगवन्तः) सकलैश्वर्य- सम्पन्न होके सब संसार के उपकार में तन, मन, धन से प्रवृत्त (स्याम) होवें ॥ ५ ॥

गृहाश्रमप्रकरणम् २१७ इन तीन मन्त्रों में से एक-एक से एक-एक आचमन कर, दोनों हाथ धो, कान, आँख, नासिका आदि का शुद्ध जल से स्पर्श करके, शुद्ध देश, पवित्रासन पर जिधर की ओर का वायु हो उधर को मुख करके, नाभि के नीचे से मूलेन्द्रिय को ऊपर संकोच करके हृदय के वायु को बल से बाहर निकालके यथाशक्ति रोके। पश्चात् धीरे-धीरे भीतर लेके भीतर थोड़ा- सा रोके। यह एक प्राणायाम हुआ। इसी प्रकार कम-से-कम तीन प्राणायाम करे। नासिका को हाथ से न पकड़े। इस समय परमेश्वर की स्तुतिप्रार्थनोपासना हृदय में करके— ओं शन्नो॑ दे॒वीर॒भिष्ट॑य॒ऽआपो॑ भवन्तु पी॒तये॑। शंयोर॒भि स्र॑वन्तु नः॥ —यजुः अ० ३६ मं० ३॥ इस मन्त्र को एक बार पढ़के तीन आचमन करे। पश्चात् पात्र में से मध्यमा, अनामिका अंगुलियों से जलस्पर्श करके प्रथम दक्षिण और पश्चात् वाम निम्नलिखित मन्त्रों से स्पर्श करे— ओं वाक् वाक्॥ इस मन्त्र से मुख का दक्षिण और वाम पार्श्व। ओं प्राणः प्राणः॥ इससे दक्षिण और वाम नासिका के छिद्र। ओं चक्षुश्चक्षुः॥ इससे दक्षिण और वाम नेत्र। ओं श्रोत्रं श्रोत्रम्॥ इससे दक्षिण और वाम श्रोत्र। ओं नाभिः॥ इससे नाभि। ओं हृदयम्॥ इससे हृदय। ओं कण्ठः॥ इससे कण्ठ। ओं शिरः॥ इससे मस्तक। ओं बाहुभ्यां यशोबलम्॥ इससे दोनों भुजाओं के मूल स्कन्ध और— ओं करतलकरपृष्ठे॥ इससे दोनों हाथों के ऊपर-तले स्पर्श करके, निम्नलिखित मन्त्रों से मार्जन करे— ओं भूः पुनातु शिरसि॥ इस मन्त्र से शिर पर।

२१८ संस्कारविधिः ओं भुवः पुनातु नेत्रयोः॥ इस मन्त्र से दोनों नेत्रों पर। ओं स्वः पुनातु कण्ठे॥ इस मन्त्र से कण्ठ पर। ओं महः पुनातु हृदये॥ इस मन्त्र से हृदय पर। ओं जनः पुनातु नाभ्याम्॥ इससे नाभि पर। ओं तपः पुनातु पादयोः॥ इससे दोनों पगों पर। ओं सत्यं पुनातु पुनः शिरसि॥ इससे पुनः मस्तक पर। ओं खं ब्रह्म पुनातु सर्वत्र॥ इस मन्त्र से सब अङ्गों पर छींटा देवे। पुनः पूर्वोक्त रीति से प्राणायाम की क्रिया करता जाए और नीचे लिखे मन्त्र का जप भी करता जाए— ओं भूः। ओं भुवः। ओं स्वः। ओं महः। ओं जनः। ओं तपः। ओं सत्यम्॥ इसी रीति से कम-से-कम तीन और अधिक-से-अधिक इक्कीस प्राणायाम करे। तत्पश्चात् सृष्टिकर्त्ता परमात्मा और सृष्टिक्रम का विचार नीचे लिखित मन्त्रों से करे और जगदीश्वर को सर्वव्यापक, न्यायकारी, सर्वत्र, सर्वदा सब जीवों के कर्मों का निश्चित द्रष्टा मानके पाप की ओर अपने आत्मा और मन को कभी न जाने देवे, अपितु उसे सदा धर्मयुक्त कर्मों में वर्तमान रक्खे— ओम् ऋ॒तं च॑ स॒त्यं चा॒भी॑द्धा॒त्तप॒सोऽध्य॑जायत। ततो॒ रात्र्य॑जायत॒ ततः॑ स॒मुद्रो अ॑र्ण॒वः॥१॥ स॒मु॒द्राद॑र्ण॒वादधि॑ संवत्स॒रो अ॑जायत। अ॒हो॒रा॒त्राणि॑ वि॒दध॒द्विश्व॑स्य मिष॒तो व॒शी॥२॥ सूर्या॑च॒न्द्रमसौ॑ धा॒ता य॑थापू॒र्वम॑कल्पयत्। दिवं॑ च पृथि॒वीं चा॒न्तरि॑क्षमथो॒ स्वः॑॥३॥ —ऋ० मं० १०। सू० १९०॥

गृहाश्रमप्रकरणम् २१९ इन मन्त्रों को पढ़के पुनः (शन्नो देवी०) इस मन्त्र से तीन आचमन करके निम्नलिखित मन्त्रों से सर्वव्यापक परमात्मा की स्तुति-प्रार्थना करे— ओं प्रा॒ची दिग॒ग्निरधि॑प॒तिरसि॑तो रक्षिता॑ऽऽदि॒त्या इष॑वः। तेभ्यो॒ नमोऽधि॑पतिभ्यो॒ नमो॑ रक्षि॒तृभ्यो॒ नम॒ इषु॑भ्यो॒ नम॑ एभ्यो अस्तु। यो१ऽस्मान् द्वेष्टि॒ यं व॒यं द्वि॒ष्मस्तं वो॒ जम्भे॑ दध्मः॥१॥ दक्षि॑णा॒ दिगिन्द्रोऽधि॑प॒तिस्ति॒रश्चि॑राजी रक्षिता पि॒तर॒ इष॑वः। तेभ्यो॒ नमोऽधि॑पतिभ्यो॒ नमो॑ रक्षि॒तृभ्यो॒ नम॒ इषु॑भ्यो नम॑ एभ्यो अस्तु। यो१ऽस्मान् द्वेष्टि॒ यं व॒यं द्वि॒ष्मस्तं वो॒ जम्भे॑ दध्मः॥२॥ प्र॒तीची॒ दिग्वरु॑णोऽधि॑प॒तिः पृदा॑कू रक्षितान्न॒मिष॑वः। तेभ्यो॒ नमोऽधि॑पतिभ्यो॒ नमो॑ रक्षि॒तृभ्यो॒ नम॒ इषु॑भ्यो॒ नम॑ एभ्यो अस्तु। यो१ऽस्मान् द्वेष्टि॒ यं व॒यं द्वि॒ष्मस्तं वो॒ जम्भे॑ दध्मः॥३॥ उदी॑ची॒ दिक् सोमोऽधि॑प॒तिः स्व॒जो र॑क्षिताश॒निरिष॑वः। तेभ्यो॒ नमोऽधि॑पतिभ्यो॒ नमो॑ रक्षि॒तृभ्यो॒ नम॒ इषु॑भ्यो॒ नम॑ एभ्यो अस्तु। यो१ऽस्मान् द्वेष्टि॒ यं व॒यं द्वि॒ष्मस्तं वो॒ जम्भे॑ दध्मः॥४॥ ध्रु॒वा दिग्विष्णु॒रधि॑प॒तिः क॒ल्माष॑ग्रीवो रक्षिता वी॒रुध॒ इष॑वः। तेभ्यो॒ नमोऽधि॑पतिभ्यो॒ नमो॑ रक्षि॒तृभ्यो॒ नम॒ इषु॑भ्यो नम॑ एभ्यो अस्तु। यो१ऽस्मान् द्वेष्टि॒ यं व॒यं द्वि॒ष्मस्तं वो॒ जम्भे॑ दध्मः॥५॥ ऊ॒र्ध्वा दिग्बृह॒स्पति॒रधि॑प॒तिः श्वि॒त्रो र॑क्षिता वृ॒र्षमिष॑वः। तेभ्यो॒ नमोऽधि॑पतिभ्यो॒ नमो॑ रक्षि॒तृभ्यो॒ नम॒ इषु॑भ्यो॒ नम॑ एभ्यो अस्तु। यो१ऽस्मान् द्वेष्टि॒ यं व॒यं द्वि॒ष्मस्तं वो॒ जम्भे॑ दध्मः॥६॥ —अथर्व० कां० ३। सू० २७। मं० १-६॥

२२० संस्कारविधिः इन मन्त्रों को पढ़ते जाना और अपने मन से चारों ओर बाहर-भीतर परमात्मा को पूर्ण जानकर निर्भय, निश्शङ्क, उत्साही, आनन्दित, पुरुषार्थी रहना। तत्पश्चात् परमात्मा का उपस्थान, अर्थात् परमेश्वर के निकट मैं और मेरे अतिनिकट परमात्मा है, ऐसी बुद्धि करके करे— जा॒तवे॑दसे सुनवाम॒ सोम॑मरातीय॒तो नि द॑हाति॒ वेद॑ः। स न॑ः पर्षदति॑ दु॒र्गाणि॒ विश्वा॑ ना॒वेव॒ सिन्धुं॑ दुरि॒तात्य॒ग्निः ॥ १ ॥ —ऋ० मं० १। सू० ९९। मं० १॥ चि॒त्रं दे॒वाना॒मुद॑गा॒दनी॑कं॒ चक्षु॑र्मि॒त्रस्य॒ वरु॑णस्या॒ग्नेः। आप्रा॒ द्यावा॑पृथि॒वीऽअ॒न्तरि॑क्ष॒ꣳ सूर्य॑ऽआ॒त्मा जग॑तस्त॒स्थुष॑श्च स्वाहा ॥ १ ॥ —यजुः० अ० १३। मं० ४६॥ उदु॒ त्यं जा॒तवे॑दसं दे॒वं व॑हन्ति के॒तव॑ः। दृशे विश्वा॑य॒ सूर्य॑म्॥ २ ॥ —यजुः० अ० ३३। मन्त्र ३१॥ उद्व॒यं तम॑स॒स्परि॒ स्वः॒ पश्य॑न्त॒ऽ उत्तर॑म्। दे॒वं दे॑व॒त्रा सूर्य॑मगन्म॒ ज्योति॑रुत्त॒मम्॥ ३ ॥ —यजुः० अ० ३५। मन्त्र १४॥ तच्चक्षु॑र्दे॒वहि॑तं पु॒रस्ता॑च्छु॒क्रमुच्च॑रत्। पश्ये॑म श॒रद॑ः श॒तं जीवे॑म श॒रद॑ः श॒तः॑ शृणु॑याम श॒रद॑ः श॒तं प्रब्र॑वाम श॒रद॑ः श॒तमदी॑नाः स्याम श॒रद॑ः श॒तं भूय॑श्च श॒रद॑ः श॒तात्॥४॥ —यजुः० अ० ३६। मं० २४॥ इन मन्त्रों से परमात्मा का उपस्थान करके, पुनः (शन्नो देवी०) इस मन्त्र से तीन आचमन करके, पृष्ठ १०३ में लिखे प्रमाणे, अथवा पञ्चमहायज्ञविधि में लिखे प्रमाणे गायत्रीमन्त्र के अर्थ-विचारपूर्वक परमात्मा की स्तुतिप्रार्थनोपासना करे। पुनः—