संस्कार विधि (महर्षि दयानन्द सरस्वती - षोडश वैदिक संस्कार एवं गुरुकुल विधान सटीक)
Sanskar Vidhi of Maharshi Dayananda Saraswati
महर्षि स्वामी दयानन्द सरस्वती द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंगृहाश्रमप्रकरणम् २११ विद्वान्, धर्म, काम और अर्थ का यथावत् जाननेहारा हो ॥ ३१ ॥ सोऽसहायेन मूढेन लुब्धेनाकृतबुद्धिना। न शक्यो न्यायतो नेतुं सक्तेन विषयेषु च ॥ ३२ ॥ शुचिना सत्यसन्धेन यथाशास्त्रानुसारिणा। प्रणेतुं शक्यते दण्डः सुसहायेन धीमता ॥ ३३ ॥ अदण्ड्यान्दण्डयन्राजा दण्ड्याँश्चैवाप्यदण्डयन्। अयशो महदाप्नोति नरकं चैव गच्छति ॥ ३४ ॥ अर्थ—जो राजा उत्तम सहायसहित, मूढ़, लोभी, जिसने ब्रह्मचर्यादि उत्तम कर्मों से विद्या और बुद्धि की उन्नति नहीं की, जो विषयों में फँसा हुआ है, उससे वह दण्ड कभी न्यायपूर्वक नहीं चल सकता ॥ ३२ ॥ इसलिए जो पवित्र, सत्पुरुषों का संगी, राजनीतिशास्त्र के अनुकूल चलनेवाला, धार्मिक पुरुषों के सहाय से युक्त, बुद्धिमान् राजा हो, वही इस दण्ड को धारण करके चला सकता है ॥ ३३ ॥ जो राजा अनपराधियों को दण्ड देता और अपराधियों को दण्ड नहीं देता है, वह इस जन्म में बड़ी अपकीर्ति को प्राप्त होता और मरे पश्चात् नरक, अर्थात् महादुःख को पाता है ॥ ३४ ॥ मृगयाक्षा दिवास्वप्नः परिवादः स्त्रियो मदः। तौर्यत्रिकं वृथाट्या च कामजो दशको गणः ॥ ३५ ॥ पैशुन्यं साहसं द्रोह ईर्ष्याऽसूयार्थदूषणम्। वाग्दण्डजं च पारुष्यं क्रोधजोऽपि गणोऽष्टकः ॥ ३६ ॥ द्वयोरप्येतयोर्मूलं यं सर्वे कवयो विदुः। तं यत्नेन जयेल्लोभं तज्जावेतावुभौ गणौ ॥ ३७॥ अर्थ—मृगया अर्थात् शिकार खेलना, द्यूत और प्रसन्नता के लिए भी चौपड़ आदि खेलना, दिन में सोना, हँसी-ठट्ठा, मिथ्यावाद करना, स्त्रियों के साथ सदा अधिक निवास में मोहित होना, मद्यपानादि नशाओं का करना, गाना, बजाना, नाचना वा इनको देखना और वृथा इधर-उधर घूमते फिरना, ये दश दुर्गुण