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संस्कार विधि (महर्षि दयानन्द सरस्वती - षोडश वैदिक संस्कार एवं गुरुकुल विधान सटीक)

संस्कार विधि (महर्षि दयानन्द सरस्वती - षोडश वैदिक संस्कार एवं गुरुकुल विधान सटीक)

Sanskar Vidhi of Maharshi Dayananda Saraswati

महर्षि स्वामी दयानन्द सरस्वती द्वारा

DevanagariHindipublished318 पृष्ठ

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पृष्ठ 216

२१२ संस्कारविधिः काम से उत्पन्न होते हैं ॥ ३५ ॥ चुगली खाना, बिना विचारे काम कर बैठना, जिस किसी से वृथा वैर बाँधना, दूसरे की स्तुति सुन वा बढ़ती देखके हृदय में जला करना, दूसरों के गुणों में दोष और दोषों में गुण स्थापन करना, बुरे कामों में धन का लगाना, क्रूर वाणी बोलना और बिना विचारे पक्षपात से किसी को कड़ा दण्ड देना, ये आठ दोष क्रोधी पुरुष में उत्पन्न होते हैं। ये अठारह दुर्गुण हैं, इनको राजा अवश्य छोड़ देवे ॥ ३६ ॥ कामज और क्रोधज अठारह दोषों का मूल जिस लोभ को सब विद्वान् लोग जानते हैं, उसे प्रयत्न से राजा जीते, क्योंकि लोभ ही से पूर्वोक्त अठारह और अन्य भी बहुत-से दोष होते हैं। इसलिए हे गृहस्थ लोगो ! चाहे वह राजा का ज्येष्ठ पुत्र क्यों न हो, परन्तु ऐसे दोषवाले मनुष्य को राजा कभी न करना। यदि भूल से हुआ हो तो उसको राज्य से च्युत करके किसी योग्य पुरुष को, जोकि राजा के कुल का हो, राज्याधिकारी करना, तभी प्रजा में आनन्द-मङ्गल सदा बढ़ता रहेगा ॥ ३७ ॥ सैन्यापत्यं च राज्यं च दण्डनेतृत्वमेव च। सर्वलोकाधिपत्यं च वेदशास्त्रविदर्हति ॥ ३८ ॥ मौलान्शास्त्रविदः शूरान्लब्धलक्षान्कुलोद्गतान्। सचिवान् सप्त चाष्टौ वा प्रकुर्वीत परीक्षितान् ॥ ३९ ॥ अन्यानपि प्रकुर्वीत शुचीन् प्राज्ञानवस्थितान् । सम्यगर्थसमाहर्तॄन् अमात्यान् सुपरीक्षितान् ॥ ४० ॥ अर्थ—जो वेदशास्त्रवित्, धर्मात्मा, जितेन्द्रिय, न्यायकारी और आत्मा के बल से युक्त पुरुष होवे, उसी को सेना, राज्य, दण्डनीति और प्रधान पद का अधिकार देना, अन्य क्षुद्राशयों को नहीं ॥ ३८ ॥ जो अपने राज्य में उत्पन्न, शास्त्रों के जाननेवाले, शूरवीर, जिनका विचार निष्फल न होवे, कुलीन, धर्मात्मा, स्वराज्यभक्त