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संस्कार विधि (महर्षि दयानन्द सरस्वती - षोडश वैदिक संस्कार एवं गुरुकुल विधान सटीक)

संस्कार विधि (महर्षि दयानन्द सरस्वती - षोडश वैदिक संस्कार एवं गुरुकुल विधान सटीक)

Sanskar Vidhi of Maharshi Dayananda Saraswati

महर्षि स्वामी दयानन्द सरस्वती द्वारा

DevanagariHindipublished318 पृष्ठ

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पृष्ठ 217

गृहाश्रमप्रकरणम् २१३ हों, उन सात वा आठ पुरुषों को अच्छी प्रकार परीक्षा करके मन्त्री करे और इन्हीं की सभा में आठवाँ वा नौवाँ राजा हो। ये सब मिलके कर्त्तव्याकर्त्तव्य कामों का विचार किया करें॥ ३९ ॥ इसी प्रकार अन्य भी राज्य और सेना के अधिकारी, जितने पुरुषों से राज्यकार्य सिद्ध हो सके, उतने ही पवित्र, धार्मिक विद्वान्, चतुर, स्थिरबुद्धि पुरुषों को राज्य-सामग्री के वर्धक नियत करे॥ ४० ॥ दूतं चैव प्रकुर्वीत सर्वशास्त्रविशारदम्। इङ्गिताकारचेष्टज्ञं शुचिं दक्षं कुलोद्गतम् ॥ ४१ ॥ अलब्धमिच्छेद् दण्डेन लब्धं रक्षेद्‌वेक्षया। रक्षितं वर्धयेद् वृद्ध्या वृद्धं पात्रेषु निःक्षिपेत् ॥ ४२ ॥ —मनु० ॥ अर्थ—जो सब शास्त्रों में निपुण, नेत्रादि के संकेतस्वरूप तथा चेष्टा से दूसरे के हृदय की बात को जाननेवाला, शुद्ध, बड़ा स्मृतिमान्, देशकाल को जाननेवाला, जिसका स्वस्वरूप सुन्दर, बड़ा वक्ता और अपने कुल में मुख्य हो, उस और स्वराज्य और पर-राज्य के समाचार देनेवाले अन्य दूतों को भी नियत करे ॥ ४१ ॥ राजादि राजपुरुष अलब्ध राज्य की प्राप्ति की इच्छा दण्ड से, और प्राप्त राज्य की रक्षा सँभाल से, रक्षित राज्य और धन को व्यापार और ब्याज से बढ़ा और सुपात्रों के द्वारा सत्यविद्या और सत्यधर्म के प्रचार आदि उत्तम व्यवहारों में बढ़े हुए धन आदि पदार्थों का व्यय करके सबकी उन्नति सदा किया करें ॥ ४२ ॥ विधि—सदा स्त्री-पुरुष दश बजे शयन और रात्रि के पिछले प्रहर वा चार बजे उठके प्रथम हृदय में परमेश्वर का चिन्तन करके धर्म और अर्थ का विचार किया करें और धर्म और अर्थ के अनुष्ठान वा उद्योग करने में यदि कभी पीड़ा भी