संस्कार विधि (महर्षि दयानन्द सरस्वती - षोडश वैदिक संस्कार एवं गुरुकुल विधान सटीक)
Sanskar Vidhi of Maharshi Dayananda Saraswati
महर्षि स्वामी दयानन्द सरस्वती द्वारा
गृहाश्रमप्रकरणम् २१३ हों, उन सात वा आठ पुरुषों को अच्छी प्रकार परीक्षा करके मन्त्री करे और इन्हीं की सभा में आठवाँ वा नौवाँ राजा हो। ये सब मिलके कर्त्तव्याकर्त्तव्य कामों का विचार किया करें॥ ३९ ॥ इसी प्रकार अन्य भी राज्य और सेना के अधिकारी, जितने पुरुषों से राज्यकार्य सिद्ध हो सके, उतने ही पवित्र, धार्मिक विद्वान्, चतुर, स्थिरबुद्धि पुरुषों को राज्य-सामग्री के वर्धक नियत करे॥ ४० ॥ दूतं चैव प्रकुर्वीत सर्वशास्त्रविशारदम्। इङ्गिताकारचेष्टज्ञं शुचिं दक्षं कुलोद्गतम् ॥ ४१ ॥ अलब्धमिच्छेद् दण्डेन लब्धं रक्षेद्वेक्षया। रक्षितं वर्धयेद् वृद्ध्या वृद्धं पात्रेषु निःक्षिपेत् ॥ ४२ ॥ —मनु० ॥ अर्थ—जो सब शास्त्रों में निपुण, नेत्रादि के संकेतस्वरूप तथा चेष्टा से दूसरे के हृदय की बात को जाननेवाला, शुद्ध, बड़ा स्मृतिमान्, देशकाल को जाननेवाला, जिसका स्वस्वरूप सुन्दर, बड़ा वक्ता और अपने कुल में मुख्य हो, उस और स्वराज्य और पर-राज्य के समाचार देनेवाले अन्य दूतों को भी नियत करे ॥ ४१ ॥ राजादि राजपुरुष अलब्ध राज्य की प्राप्ति की इच्छा दण्ड से, और प्राप्त राज्य की रक्षा सँभाल से, रक्षित राज्य और धन को व्यापार और ब्याज से बढ़ा और सुपात्रों के द्वारा सत्यविद्या और सत्यधर्म के प्रचार आदि उत्तम व्यवहारों में बढ़े हुए धन आदि पदार्थों का व्यय करके सबकी उन्नति सदा किया करें ॥ ४२ ॥ विधि—सदा स्त्री-पुरुष दश बजे शयन और रात्रि के पिछले प्रहर वा चार बजे उठके प्रथम हृदय में परमेश्वर का चिन्तन करके धर्म और अर्थ का विचार किया करें और धर्म और अर्थ के अनुष्ठान वा उद्योग करने में यदि कभी पीड़ा भी
२१४ संस्कारविधिः हो, तथापि धर्मयुक्त पुरुषार्थ को कभी न छोड़ें, किन्तु सदा शरीर और आत्मा की रक्षा के लिए युक्त आहार-विहार, औषधसेवन, सुपथ्य आदि से निरन्तर उद्योग करके व्यावहारिक और पारमार्थिक कर्त्तव्य कर्म की सिद्धि के लिए ईश्वर की स्तुति, प्रार्थना, उपासना भी किया करें कि जिससे परमेश्वर की कृपादृष्टि और सहाय से महाकठिन कार्य भी सुगमता से सिद्ध हो सकें। इसके लिए निम्नलिखित मन्त्र हैं— प्रा॒तर॒ग्निं प्रा॒तरिन्द्रं॑ हवामहे प्रा॒तर्मित्रावरु॑णा प्रा॒तर॒श्विना॑। प्रा॒तर्भ गं॑ पू॒षणं॒ ब्रह्म॑ण॒स्पतिं॑ प्रा॒तः सोम॑मु॒त रु॒द्रं हु॑वेम॑॥ १ ॥ प्रा॒त॒र्जितं॒ भग॑मु॒ग्रं हु॑वेम व॒यं पु॒त्रमदि॑ते॒र्यो वि॑ध॒र्त्ता। आ॒ध्रश्चि॒द्यं मन्य॑मानस्तु॒रश्चि॒द्राजा॑ चि॒द्यं भगं॑ भ॒क्षीत्याह॑॥ २ ॥ १. हे स्त्री-पुरुषो! जैसे हम विद्वान् उपदेशक लोग (प्रातः) प्रभात- वेला में (अग्निम्) स्वप्रकाशस्वरूप (प्रातः) (इन्द्रम्) परमैश्वर्य के दाता और परमैश्वर्ययुक्त (प्रातः) (मित्रावरुणा) प्राण-उदान के समान प्रिय और सर्वशक्तिमान् (प्रातः) (अश्विना) सूर्य चन्द्र को जिसने उत्पन्न किया है, उस परमात्मा की (हवामहे) स्तुति करते हैं, और (प्रातः) (भगम्) भजनीय=सेवनीय, ऐश्वर्ययुक्त (पूषणम्) पुष्टिकर्त्ता (ब्रह्मणस्पतिम्) अपने उपासक, वेद और ब्रह्माण्ड के पालन करनेहारे (प्रातः) (सोमम्) अन्तर्यामी प्रेरक (उत) और (रुद्रम्) पापियों को रुलानेहारे और सर्वरोगनाशक जगदीश्वर की (हुवेम) स्तुति-प्रार्थना करते हैं, वैसे प्रातः समय में तुम लोग भी किया करो॥ १ ॥ २. (प्रातः) पाँच घड़ी रात्रि रहे (जितम्) जयशील (भगम्) ऐश्वर्य के दाता (उग्रम्) तेजस्वी (अदितेः) अन्तरिक्ष के (पुत्रम्) पुत्ररूप सूर्य की उत्पत्ति करनेहारे और (यः) जोकि सूर्यादि लोकों का (विधर्त्ता) विशेष करके धारण करनेहारा (आध्रः) सब ओर से धारणकर्त्ता (यं चित्) जिस किसी का भी (मन्यमानः) जाननेहारा (तुरश्चित्) दुष्टों को भी दण्डदाता और (राजा) सबका प्रकाशक
गृहाश्रमप्रकरणम् २१५ भग॒ प्रणे॑त॒र्भग॒ सत्य॑राधो॒ भगे॒मां धिय॒मुद॑वा॒ दद॑न्नः। भग॒ प्र णो॑ जनय॒ गोभि॒रश्वै॒र्भग॒ प्र नृभि॑र्नृ॒वन्तः॑ स्याम१॥३॥ उ॒तेदानीं॒ भग॑वन्तः स्याम॒ोत प्रपि॒त्व उ॒त म॒ध्ये अह्ना॑म्। उ॒तोदि॑ता मघव॒न्त्सूर्य॑स्य व॒यं दे॒वानां॑ सु॒मतौ स्या॑म२॥४॥ है, (यम्) जिस (भगम्) भजनीयस्वरूप को (चित्) भी (भक्षीति) इस प्रकार सेवन करता हूँ, और इसी प्रकार भगवान् परमेश्वर सबको (आह) उपदेश करता है कि तुम, जो मैं सूर्यादि जगत् को बनाने और धारण करनेहारा हूँ, उस मेरी उपासना किया, और मेरी आज्ञा में चला करो, जिससे तुम लोग सदा उन्नतिशील रहो, इससे (वयम्) हमलोग उसकी (हुवेम) स्तुति करते हैं॥२॥ १. हे (भग) भजनीयस्वरूप (प्रणेतः) सबके उत्पादक, सत्याचार में प्रेरक (भग) ऐश्वर्यप्रद (सत्यराधः) सत्य धन को देनेहारे (भग) सत्याचरण करनेहारों को ऐश्वर्यदाता आप परमेश्वर! (नः) हमको (इमाम्) इस (धियम्) प्रज्ञा को (ददत्) दीजिए, और उसके दान से हमारी (उदव) रक्षा कीजिए। हे (भग) आप (गोभिः) गाय आदि और (अश्वैः) घोड़े आदि उत्तम पशुओं के योग से राज्यश्री को (नः) हमारे लिए (प्रजनय) प्रकट कीजिए, हे (भग) आपकी कृपा से हम लोग (नृभिः) उत्तम मनुष्यों से (नृवन्तः) बहुत वीर मनुष्यवाले (प्र स्याम) अच्छे प्रकार होवें॥३॥ २. हे भगवन्! आपकी कृपा (उत) और अपने पुरुषार्थ से हम लोग (इदानीम्) इसी समय (प्रपित्वे) प्रकर्षता, उत्तमता की प्राप्ति में (उत) और (अह्नाम्) इन दिनों के (मध्ये) मध्य में (भगवन्तः) ऐश्वर्ययुक्त और शक्तिमान् (स्याम) होवें, (उत) और हे (मघवन्) परमपूजित असंख्य धन देनेहारे! (सूर्यस्य) सूर्यलोक के (उदिता) उदय में (देवानाम्) पूर्ण विद्वान्, धार्मिक, आप्त लोगों की (सुमतौ) अच्छी उत्तम प्रज्ञा (उत) और सुमति में (वयम्) हम लोग (स्याम) सदा प्रवृत्त रहें॥४॥
२१६ संस्कारविधिः भग॑ एव भग॑वाँ अस्तु देवा॒स्तेन॑ व॒यं भग॑वन्तः स्याम । तं त्वा॑ भग॒ सर्व॒ इज्जो॑हवीति॒ स नो॑ भग पुरए॒त भ॑वे॒ह¹ ॥ ५ ॥ —ऋ० मं० ७ । सू० ४१ ॥ इस प्रकार परमेश्वर की प्रार्थना-उपासना करनी ॥ तत्पश्चात् शौच, दन्तधावन, मुखप्रक्षालन करके स्नान करें। पश्चात् एक कोश वा डेढ़ कोश एकान्त जङ्गल में जाके योगाभ्यास की रीति से परमेश्वर की उपासना कर, सूर्योदय- पर्यन्त अथवा घड़ी, आध घड़ी दिन चढ़े तक घर में आके, सन्ध्योपासनादि नित्यकर्म नीचे लिखे प्रमाणे यथाविधि उचित समय में किया करें। इन नित्य करने के योग्य कर्मों में लिखे हुए मन्त्रों का अर्थ और प्रमाण पञ्चमहायज्ञविधि में देख लेवें। प्रथम शरीरशुद्धि, अर्थात् स्नान-पर्यन्त कर्म करके सन्ध्योपासन का आरम्भ करें। आरम्भ में दक्षिण हस्त में जल लेके— ओम् अमृतोपस्तरणमसि स्वाहा ॥ १ ॥ ओम् अमृतापिधानमसि स्वाहा ॥ २ ॥ ओं सत्यं यशः श्रीम॑यि श्रीः श्रयतां स्वाहा ॥ ३ ॥ १. हे (भग) सकलैश्वर्यसम्पन्न जगदीश्वर ! जिससे (तम्) उस (त्वा) आपकी (सर्वः) सब सज्जन (इज्जोहवीति) निश्चय करके प्रशंसा करते हैं, (सः) सो आप हे (भग) ऐश्वर्यप्रद ! (इह) इस संसार और (नः) हमारे गृहाश्रम में (पुरएता) अग्रगामी और आगे- आगे सत्यकर्मों में बढ़ानेहारे (भव) हूजिए; और जिससे (भग एव) सम्पूर्ण ऐश्वर्ययुक्त और समस्त ऐश्वर्य के दाता होने से आप ही हमारे (भगवान्) पूजनीय देव (अस्तु) हूजिए, (तेन) उसी हेतु से (देवाः वयम्) हम विद्वान् लोग (भगवन्तः) सकलैश्वर्य- सम्पन्न होके सब संसार के उपकार में तन, मन, धन से प्रवृत्त (स्याम) होवें ॥ ५ ॥
गृहाश्रमप्रकरणम् २१७ इन तीन मन्त्रों में से एक-एक से एक-एक आचमन कर, दोनों हाथ धो, कान, आँख, नासिका आदि का शुद्ध जल से स्पर्श करके, शुद्ध देश, पवित्रासन पर जिधर की ओर का वायु हो उधर को मुख करके, नाभि के नीचे से मूलेन्द्रिय को ऊपर संकोच करके हृदय के वायु को बल से बाहर निकालके यथाशक्ति रोके। पश्चात् धीरे-धीरे भीतर लेके भीतर थोड़ा- सा रोके। यह एक प्राणायाम हुआ। इसी प्रकार कम-से-कम तीन प्राणायाम करे। नासिका को हाथ से न पकड़े। इस समय परमेश्वर की स्तुतिप्रार्थनोपासना हृदय में करके— ओं शन्नो॑ दे॒वीर॒भिष्ट॑य॒ऽआपो॑ भवन्तु पी॒तये॑। शंयोर॒भि स्र॑वन्तु नः॥ —यजुः अ० ३६ मं० ३॥ इस मन्त्र को एक बार पढ़के तीन आचमन करे। पश्चात् पात्र में से मध्यमा, अनामिका अंगुलियों से जलस्पर्श करके प्रथम दक्षिण और पश्चात् वाम निम्नलिखित मन्त्रों से स्पर्श करे— ओं वाक् वाक्॥ इस मन्त्र से मुख का दक्षिण और वाम पार्श्व। ओं प्राणः प्राणः॥ इससे दक्षिण और वाम नासिका के छिद्र। ओं चक्षुश्चक्षुः॥ इससे दक्षिण और वाम नेत्र। ओं श्रोत्रं श्रोत्रम्॥ इससे दक्षिण और वाम श्रोत्र। ओं नाभिः॥ इससे नाभि। ओं हृदयम्॥ इससे हृदय। ओं कण्ठः॥ इससे कण्ठ। ओं शिरः॥ इससे मस्तक। ओं बाहुभ्यां यशोबलम्॥ इससे दोनों भुजाओं के मूल स्कन्ध और— ओं करतलकरपृष्ठे॥ इससे दोनों हाथों के ऊपर-तले स्पर्श करके, निम्नलिखित मन्त्रों से मार्जन करे— ओं भूः पुनातु शिरसि॥ इस मन्त्र से शिर पर।
२१८ संस्कारविधिः ओं भुवः पुनातु नेत्रयोः॥ इस मन्त्र से दोनों नेत्रों पर। ओं स्वः पुनातु कण्ठे॥ इस मन्त्र से कण्ठ पर। ओं महः पुनातु हृदये॥ इस मन्त्र से हृदय पर। ओं जनः पुनातु नाभ्याम्॥ इससे नाभि पर। ओं तपः पुनातु पादयोः॥ इससे दोनों पगों पर। ओं सत्यं पुनातु पुनः शिरसि॥ इससे पुनः मस्तक पर। ओं खं ब्रह्म पुनातु सर्वत्र॥ इस मन्त्र से सब अङ्गों पर छींटा देवे। पुनः पूर्वोक्त रीति से प्राणायाम की क्रिया करता जाए और नीचे लिखे मन्त्र का जप भी करता जाए— ओं भूः। ओं भुवः। ओं स्वः। ओं महः। ओं जनः। ओं तपः। ओं सत्यम्॥ इसी रीति से कम-से-कम तीन और अधिक-से-अधिक इक्कीस प्राणायाम करे। तत्पश्चात् सृष्टिकर्त्ता परमात्मा और सृष्टिक्रम का विचार नीचे लिखित मन्त्रों से करे और जगदीश्वर को सर्वव्यापक, न्यायकारी, सर्वत्र, सर्वदा सब जीवों के कर्मों का निश्चित द्रष्टा मानके पाप की ओर अपने आत्मा और मन को कभी न जाने देवे, अपितु उसे सदा धर्मयुक्त कर्मों में वर्तमान रक्खे— ओम् ऋ॒तं च॑ स॒त्यं चा॒भी॑द्धा॒त्तप॒सोऽध्य॑जायत। ततो॒ रात्र्य॑जायत॒ ततः॑ स॒मुद्रो अ॑र्ण॒वः॥१॥ स॒मु॒द्राद॑र्ण॒वादधि॑ संवत्स॒रो अ॑जायत। अ॒हो॒रा॒त्राणि॑ वि॒दध॒द्विश्व॑स्य मिष॒तो व॒शी॥२॥ सूर्या॑च॒न्द्रमसौ॑ धा॒ता य॑थापू॒र्वम॑कल्पयत्। दिवं॑ च पृथि॒वीं चा॒न्तरि॑क्षमथो॒ स्वः॑॥३॥ —ऋ० मं० १०। सू० १९०॥
गृहाश्रमप्रकरणम् २१९ इन मन्त्रों को पढ़के पुनः (शन्नो देवी०) इस मन्त्र से तीन आचमन करके निम्नलिखित मन्त्रों से सर्वव्यापक परमात्मा की स्तुति-प्रार्थना करे— ओं प्रा॒ची दिग॒ग्निरधि॑प॒तिरसि॑तो रक्षिता॑ऽऽदि॒त्या इष॑वः। तेभ्यो॒ नमोऽधि॑पतिभ्यो॒ नमो॑ रक्षि॒तृभ्यो॒ नम॒ इषु॑भ्यो॒ नम॑ एभ्यो अस्तु। यो१ऽस्मान् द्वेष्टि॒ यं व॒यं द्वि॒ष्मस्तं वो॒ जम्भे॑ दध्मः॥१॥ दक्षि॑णा॒ दिगिन्द्रोऽधि॑प॒तिस्ति॒रश्चि॑राजी रक्षिता पि॒तर॒ इष॑वः। तेभ्यो॒ नमोऽधि॑पतिभ्यो॒ नमो॑ रक्षि॒तृभ्यो॒ नम॒ इषु॑भ्यो नम॑ एभ्यो अस्तु। यो१ऽस्मान् द्वेष्टि॒ यं व॒यं द्वि॒ष्मस्तं वो॒ जम्भे॑ दध्मः॥२॥ प्र॒तीची॒ दिग्वरु॑णोऽधि॑प॒तिः पृदा॑कू रक्षितान्न॒मिष॑वः। तेभ्यो॒ नमोऽधि॑पतिभ्यो॒ नमो॑ रक्षि॒तृभ्यो॒ नम॒ इषु॑भ्यो॒ नम॑ एभ्यो अस्तु। यो१ऽस्मान् द्वेष्टि॒ यं व॒यं द्वि॒ष्मस्तं वो॒ जम्भे॑ दध्मः॥३॥ उदी॑ची॒ दिक् सोमोऽधि॑प॒तिः स्व॒जो र॑क्षिताश॒निरिष॑वः। तेभ्यो॒ नमोऽधि॑पतिभ्यो॒ नमो॑ रक्षि॒तृभ्यो॒ नम॒ इषु॑भ्यो॒ नम॑ एभ्यो अस्तु। यो१ऽस्मान् द्वेष्टि॒ यं व॒यं द्वि॒ष्मस्तं वो॒ जम्भे॑ दध्मः॥४॥ ध्रु॒वा दिग्विष्णु॒रधि॑प॒तिः क॒ल्माष॑ग्रीवो रक्षिता वी॒रुध॒ इष॑वः। तेभ्यो॒ नमोऽधि॑पतिभ्यो॒ नमो॑ रक्षि॒तृभ्यो॒ नम॒ इषु॑भ्यो नम॑ एभ्यो अस्तु। यो१ऽस्मान् द्वेष्टि॒ यं व॒यं द्वि॒ष्मस्तं वो॒ जम्भे॑ दध्मः॥५॥ ऊ॒र्ध्वा दिग्बृह॒स्पति॒रधि॑प॒तिः श्वि॒त्रो र॑क्षिता वृ॒र्षमिष॑वः। तेभ्यो॒ नमोऽधि॑पतिभ्यो॒ नमो॑ रक्षि॒तृभ्यो॒ नम॒ इषु॑भ्यो॒ नम॑ एभ्यो अस्तु। यो१ऽस्मान् द्वेष्टि॒ यं व॒यं द्वि॒ष्मस्तं वो॒ जम्भे॑ दध्मः॥६॥ —अथर्व० कां० ३। सू० २७। मं० १-६॥
२२० संस्कारविधिः इन मन्त्रों को पढ़ते जाना और अपने मन से चारों ओर बाहर-भीतर परमात्मा को पूर्ण जानकर निर्भय, निश्शङ्क, उत्साही, आनन्दित, पुरुषार्थी रहना। तत्पश्चात् परमात्मा का उपस्थान, अर्थात् परमेश्वर के निकट मैं और मेरे अतिनिकट परमात्मा है, ऐसी बुद्धि करके करे— जा॒तवे॑दसे सुनवाम॒ सोम॑मरातीय॒तो नि द॑हाति॒ वेद॑ः। स न॑ः पर्षदति॑ दु॒र्गाणि॒ विश्वा॑ ना॒वेव॒ सिन्धुं॑ दुरि॒तात्य॒ग्निः ॥ १ ॥ —ऋ० मं० १। सू० ९९। मं० १॥ चि॒त्रं दे॒वाना॒मुद॑गा॒दनी॑कं॒ चक्षु॑र्मि॒त्रस्य॒ वरु॑णस्या॒ग्नेः। आप्रा॒ द्यावा॑पृथि॒वीऽअ॒न्तरि॑क्ष॒ꣳ सूर्य॑ऽआ॒त्मा जग॑तस्त॒स्थुष॑श्च स्वाहा ॥ १ ॥ —यजुः० अ० १३। मं० ४६॥ उदु॒ त्यं जा॒तवे॑दसं दे॒वं व॑हन्ति के॒तव॑ः। दृशे विश्वा॑य॒ सूर्य॑म्॥ २ ॥ —यजुः० अ० ३३। मन्त्र ३१॥ उद्व॒यं तम॑स॒स्परि॒ स्वः॒ पश्य॑न्त॒ऽ उत्तर॑म्। दे॒वं दे॑व॒त्रा सूर्य॑मगन्म॒ ज्योति॑रुत्त॒मम्॥ ३ ॥ —यजुः० अ० ३५। मन्त्र १४॥ तच्चक्षु॑र्दे॒वहि॑तं पु॒रस्ता॑च्छु॒क्रमुच्च॑रत्। पश्ये॑म श॒रद॑ः श॒तं जीवे॑म श॒रद॑ः श॒तः॑ शृणु॑याम श॒रद॑ः श॒तं प्रब्र॑वाम श॒रद॑ः श॒तमदी॑नाः स्याम श॒रद॑ः श॒तं भूय॑श्च श॒रद॑ः श॒तात्॥४॥ —यजुः० अ० ३६। मं० २४॥ इन मन्त्रों से परमात्मा का उपस्थान करके, पुनः (शन्नो देवी०) इस मन्त्र से तीन आचमन करके, पृष्ठ १०३ में लिखे प्रमाणे, अथवा पञ्चमहायज्ञविधि में लिखे प्रमाणे गायत्रीमन्त्र के अर्थ-विचारपूर्वक परमात्मा की स्तुतिप्रार्थनोपासना करे। पुनः—
गृहाश्रमप्रकरणम् २२१ "हे परमेश्वर दयानिधे! आपकी कृपा से जपोपासनादि कर्मों को करके हम धर्म, अर्थ, काम और मोक्ष की सिद्धि को शीघ्र प्राप्त होवें।" पुनः— ओं नम॑ः शम्भ॒वाय॑ च मयो॒भुवाय॑ च॒ नम॑ः शङ्क॒राय॑ च मयस्क॒राय॑ च॒ नम॑ः शि॒वाय॑ च शि॒वत॑राय च ॥ १ ॥ —यजुः० अ० १६। मं० ४१ ॥ इससे परमात्मा को नमस्कार करके, (शन्नो देवी०) इस मन्त्र से तीन आचमन करके अग्निहोत्र का आरम्भ करे। इति संक्षेपतः सन्ध्योपासनविधिः समाप्त ॥ १ ॥ अथाग्निहोत्रम् जैसे सायं-प्रातः दोनों सन्धिवेलाओं में सन्ध्योपासन करें, इसी प्रकार दोनों स्त्री-पुरुष* अग्निहोत्र भी दोनों समय में नित्य किया करें। पृष्ठ ३०-३१ में लिखे प्रमाणे अग्न्याधान, समिदाधान और पृष्ठ ३२ में लिखे प्रमाणे (ओम् अदितेऽनुमन्यस्व) इत्यादि चार मन्त्रों से यथाविधि कुण्ड के चारों ओर जल-प्रोक्षण करके शुद्ध किये हुए सुगन्ध्यादियुक्त घी को तपाके, पात्र में लेके, कुण्ड से पश्चिमभाग में पूर्वाभिमुख बैठके पृष्ठ २७ में लिखे प्रमाणे आघारावाज्यभागाहुति चार देके, नीचे लिखे हुए मन्त्रों से प्रातःकाल अग्निहोत्र करे— ओं सूर्यो॒ ज्योति॒र्ज्योति॑ः सूर्यः॒ स्वाहा॑ ॥ १ ॥ ओं सूर्यो॒ वर्चो॒ ज्योति॒र्वर्च॑ः स्वाहा॑ ॥ २ ॥ ओं ज्योति॑ः सूर्यः॒ सूर्यो॒ ज्योति॑ः स्वाहा॑ ॥ ३ ॥
- किसी विशेष कारण से स्त्री वा पुरुष अग्निहोत्र के समय दोनों साथ उपस्थित न हो सकें तो एक ही स्त्री वा पुरुष दोनों की ओर का कृत्य कर लेवे अर्थात् एक-एक मन्त्र को दो-दो बार पढ़के दो-दो आहुति करे।
२२२ संस्कारविधिः ओं स॒जूर्देवेन॑ सवि॒त्रा स॒जूरुषसेन्द्र॑वत्या। जुषा॒णः सूर्यो॑ वेतु॒ स्वाहा॑ ॥४॥ अब नीचे लिखे हुए मन्त्र सायंकाल में अग्निहोत्र के जानो— ओम् अ॒ग्निर्ज्योति॒र्ज्योतिर॒ग्निः स्वाहा॑ ॥ १ ॥ ओम् अ॒ग्निर्वर्चो ज्योति॒र्वर्चः स्वाहा॑ ॥ २ ॥ ओम् अ॒ग्निर्ज्योति॒र्ज्योतिर॒ग्निः स्वाहा॑ ॥ ३ ॥ इस मन्त्र को मनसे उच्चारण करके तीसरी आहुति देनी। ओं स॒जूर्देवेन॑ सवि॒त्रा स॒जू रात्र्येन्द्र॑वत्या। जुषा॒णोऽअ॒ग्निर्वे॑तु॒ स्वाहा॑ ॥ ४ ॥ अब निम्नलिखित मन्त्रों से प्रातःसायं आहुति देनी चाहिए। ओं भूरग्नये प्राणाय स्वाहा ॥ इदमग्नये प्राणाय—इदं न मम ॥ १ ॥ ओं भुवर्वायवेऽपानाय स्वाहा ॥ इदं वायवेऽपानाय—इदं न मम ॥ २ ॥ ओं स्वरादित्याय व्यानाय स्वाहा ॥ इदमादित्याय व्यानाय—इदं न मम ॥ ३ ॥ ओं भूर्भुवः स्वरग्निवाय्वादित्येभ्यः प्राणापानव्यानेभ्यः स्वाहा ॥ इदमग्निवाय्वादित्येभ्यः प्राणापानव्यानेभ्यः— इदं न मम ॥ ४ ॥ ओम् आपो ज्योतीरसोऽमृतं ब्रह्म भूर्भुवः स्वरों स्वाहा ॥ ५ ॥ ओं यां मे॒धां दे॑वग॒णाः पि॒तर॑श्चो॒पास॑ते। तया॒ माम॒द्य मे॒धयाऽग्ने॑ मे॒धावि॑नं कुरु॒ स्वाहा॑ ॥ ६ ॥ —यजुः० अ० ३२। मं० १४॥ ओं विश्वा॑नि देव सवितर्दुरि॒तानि॒ परा॑ सुव। यद् भ॒द्रन्तन्न॒ऽ आ सु॑व॒ स्वाहा॑ ॥ ७ ॥ —यजुः० अ० ३०। मं० ३॥
गृहाश्रमप्रकरणम् २२३ ओम् अग्ने॒ नय॑ सु॒पथा॑ रा॒येऽअ॒स्मान् विश्वा॑नि देव व॒युना॑नि वि॒द्वान्। यु॒यो॒ध्य॒स्मज्जु॑हुरा॒णमेनो॒ भूयि॑ष्ठां ते॒ नम॑ऽउक्तिं विधेम स्वाहा॑ ॥ ८ ॥ —यजुः० अ० ४०। मं० १६ ॥ इन आठ मन्त्रों से एक-एक मन्त्र करके एक-एक आहुति देनी, ऐसे आठ आहुति देके— ओम् सर्वं वै पूर्णꣳ स्वाहा ॥ इस मन्त्र से तीन पूर्णाहुति, अर्थात् एक-एक बार पढ़के एक-एक करके तीन आहुति देवे ॥ 'इत्यग्निहोत्रविधिः संक्षेपतः समाप्तः ॥ २ ॥ अथ पितृयज्ञः अग्निहोत्रविधि पूर्ण करके तीसरा पितृयज्ञ करे, अर्थात् जीते हुए माता-पिता आदि की यथावत् सेवा करना 'पितृयज्ञ' कहाता है ॥ ३ ॥ अथ बलिवैश्वदेवविधिः ओम् अग्नये स्वाहा। ओं सोमाय स्वाहा ॥ ओम् अग्नीषोमाभ्यां स्वाहा। ओं विश्वेभ्यो देवेभ्यः स्वाहा ॥ ओं धन्वन्तरये स्वाहा ॥ ओं कुह्वै स्वाहा ॥ ओं अनुमत्यै स्वाहा ॥ ओं प्रजापतये स्वाहा ॥ ओं द्यावापृथिवीभ्यां स्वाहा ॥ ओं स्विष्टकृते स्वाहा ॥
२२४ संस्कारविधिः इन दश मन्त्रों से घृतमिश्रित भात की, यदि भात न बना हो तो क्षार और लवणान्न को छोड़के जो कुछ पाक में बना हो उसी की दश आहुति करे। तत्पश्चात् निम्नलिखित मन्त्रों से बलि प्रदान करे— ओं सानुगायेन्द्राय नमः ॥ इससे पूर्व। ओं सानुगाय यमाय नमः ॥ इससे दक्षिण। ओं सानुगाय वरुणाय नमः ॥ इससे पश्चिम। ओं सानुगाय सोमाय नमः ॥ इससे उत्तर। ओं मरुद्भ्यो नमः ॥ इससे द्वार। ओम् अद्भ्यो नमः ॥ इससे जल ओं वनस्पतिभ्यो नमः ॥ इससे मूसल और ऊखल। ओं श्रियै नमः ॥ इससे ईशान। ओं भद्रकाल्यै नमः ॥ इससे नैर्ऋत्य। ओं ब्रह्मपतये नमः। ओं वास्तुपतये नमः ॥ इनसे मध्य। ओं विश्वेभ्यो देवेभ्यो नमः ॥ ओं दिवाचरेभ्यो भूतेभ्यो नमः ॥ ओं नक्तंचारिभ्यो भूतेभ्यो नमः। इनसे ऊपर। ओं सर्वात्मभूतये नमः ॥ इससे पृष्ठ। ओं पितृभ्यः स्वधायिभ्यः स्वधा नमः ॥ इससे दक्षिण। इन मन्त्रों से एक पत्तल वा थाली में यथोक्त दिशाओं में भाग धरना। यदि भाग धरने के समय कोई अतिथि आ जाए तो उसी को दे देना, नहीं तो अग्नि में धर देना। तत्पश्चात् घृतसहित लवणान्न लेके— शुनां च पतितानां च श्वपचां पापरोगिणाम्। वायसानां कृमीणां च शनकैर्निर्वपेद् भुवि ॥ अर्थ—कुत्ता, पतित, चाण्डाल, पापरोगी, काक और
गृहाश्रमप्रकरणम् २२५ कृमि—इन छह नामों से छह भाग पृथिवी पर धरै और वे छह भाग जिस-जिसके नाम से हैं, उस-उसको देना चाहिए ॥४॥ अथातिथियज्ञः पाँचवाँ—धार्मिक, परोपकारी, सत्योपदेशक, पक्षपातरहित, शान्त, सर्वहितकारक विद्वानों की अन्नादि से सेवा, उनसे प्रश्नोत्तर आदि करके विद्या की प्राप्ति होना 'अतिथियज्ञ' कहाता है, उसे नित्य किया करें। इस प्रकार पञ्चमहायज्ञों को स्त्री-पुरुष प्रतिदिन करते रहें ॥५॥ इसके पश्चात् पक्षयज्ञ, अर्थात् पौर्णमासी और अमावास्या के दिन नैत्यिक अग्निहोत्र की आहुति दिये पश्चात् पूर्वोक्त प्रकार पृष्ठ २४ में लिखे प्रमाणे स्थालीपाक बनाके निम्नलिखित मन्त्रों से विशेष आहुति करें— ओम् अग्नये स्वाहा ॥ ओम् अग्नीषोमाभ्यां स्वाहा ॥ ओं विष्णवे स्वाहा ॥ इन तीन मन्त्रों से स्थालीपाक की तीन आहुति देनी। तत्पश्चात् पृष्ठ ३३ में लिखे प्रमाणे व्याहृति आज्याहुति चार देनी, परन्तु इसमें इतना भेद है कि अमावास्या के दिन— ओम् अग्नीषोमाभ्यां स्वाहा ॥ इस मन्त्र के बदले— ओम् इन्द्राग्नीभ्यां स्वाहा ॥ इस मन्त्र को बोलके स्थालीपाक की आहुति देवे। इस प्रकार पक्षयाग, अर्थात् जिसके घर में अभाग्य से प्रतिदिन अग्निहोत्र न होता हो तो सर्वत्र पक्षयागादि में पृष्ठ २२- २४ में लिखे प्रमाणे यज्ञकुण्ड, यज्ञसामग्री, यज्ञमण्डप; पृष्ठ ३०- ३२ में लिखे प्रमाणे अग्न्याधान, समिदाधान; पृष्ठ ३२-३३ में
२२६ संस्कारविधिः लिखे प्रमाणे आघारावाज्यभागाहुति; और पृष्ठ ३२ में लिखे प्रमाणे वेदी के चारों ओर जलसेचन करके पृष्ठ ९-२१ में लिखे प्रमाणे ईश्वरोपासना, स्वस्तिवाचन, शान्तिकरण भी यथायोग्य करे। और जब-जब नवान्न आवे, तब-तब नवशस्येष्टि और संवत्सर के आरम्भ में निम्नलिखित विधि करे, अर्थात् जब- जब नवीन अन्न आवे, तब-तब शस्येष्टि करके नवीन अन्न के भोजन का आरम्भ करे। नवशस्येष्टि और संवत्सरेष्टि करना हो तो जिस दिन प्रसन्नता हो वही शुभ दिन जाने। ग्राम और शहर के बाहर किसी शुद्ध खेत में यज्ञमण्डप करके पृष्ठ ९-३४ तक लिखे प्रमाणे सब विधि करके प्रथम आघारावाज्यभागाहुति चार और व्याहृति आहुति चार तथा अष्टज्याहुति आठ, ये सोलह आज्याहुति करके, कार्यकर्त्ता— ओं पृथिवी द्यौः प्रदिशो दिशो यस्मै द्युभिरावृताः। तमिहेन्द्रमुपह्वये शिवा नः सन्तु हेतयः स्वाहा ॥ १ ॥ ओं यन्मे किंचिदुपेप्सितमस्मिन् कर्मणि वृत्रहन्। तन्मे सर्वँ समृद्ध्यतां जीवतः शरदः शतꣳ स्वाहा ॥ २ ॥ ओं सम्पत्तिर्भूमिर्वृष्टिर्ज्यैष्ठ्यꣳ श्रैष्ठ्यꣳ श्रीः प्रजामिहावतु स्वाहा ॥ इदमिन्द्राय-इदन्न मम ॥ ३ ॥ ओं यस्या भावे वैदिकलौकिकानां भूतिर्भवति कर्मणाम्। इन्द्रपत्नीमुपह्वये सीताꣳ सा मे त्वनपायिनी भूयात् कर्मणि कर्मणि स्वाहा ॥ इदमिन्द्रपत्त्यै-इदन्न मम ॥ ४ ॥ ओम् अश्वावती गोमती सूनूतावती बिभर्त्ति या प्राणभृतो अतन्द्रिता। खलामालिनीमुर्वरामस्मिन् कर्मण्युपह्वये ध्रुवाꣳ सा मे त्वनपायिनी भूयात् स्वाहा ॥ इदं सीतायै-इदन्न मम ॥ ५ ॥
गृहाश्रमप्रकरणम् २२७ इन मन्त्रों से प्रधानहोम की पाँच आज्याहुति करके— ओं सीतायै स्वाहा॥ ओं प्रजायै स्वाहा॥ ओं शमायै स्वाहा॥ ओं भूत्यै स्वाहा॥ इन चार मन्त्रों से चार और पृष्ठ ३३ में लिखे प्रमाणे (यदस्य०) मन्त्र से स्विष्टकृत् होमाहुति एक ऐसे पाँच स्थालीपाक की आहुति देके, पश्चात् पृष्ठ ३४-३५ में लिखे प्रमाणे अष्टाज्याहुति आठ, पृष्ठ ३३ में लिखे प्रमाणे व्याहृति आहुति चार, ऐसे बारह आज्याहुति देके, पृष्ठ ३६-३७ में लिखे प्रमाणे महावामदेव्यगान, ईश्वरोपासना, स्वस्तिवाचन और शान्तिकरण करके यज्ञ की समाप्ति करें॥ अथ शालाकर्मविधिं वक्ष्यामः ‘शाला’ उसे कहते हैं—जो मनुष्य और पश्चादि के रहने, अथवा पदार्थ रखने के अर्थ गृह वा स्थानविशेष बनाते हैं। इसके दो विषय हैं—एक प्रमाण और दूसरा विधि। उसमें से प्रथम प्रमाण और पश्चात् विधि लिखेंगे। अत्र प्रमाणानि उ॒पमि॑तां प्र॒तिमि॑ता॒मथो॑ प॒रिमि॑तामु॒त। शाला॑या वि॒श्ववा॑राया न॒द्धानि॒ वि चृ॑तामसि॥ १॥ ह॒वि॒र्धान॑म॒ग्निशा॒लं पत्नी॑नां॒ सद॑नं॒ सद॑:। सदो॑ दे॒वाना॑मसि देवि शाले॥ २॥ अर्थ:—मनुष्यों को योग्य है कि जो कोई किसी प्रकार का घर बनावें तो वह (उपमिताम्) सब प्रकार की. उत्तम
२२८ संस्कारविधिः उपमायुक्त कि जिसको देखके विद्वान् लोग सराहना करें। (प्रतिमिताम्) प्रतिमान, अर्थात् एक द्वार के सामने दूसरा द्वार, कोने और कक्षा भी सम्मुख हों। (अथो) इसके अनन्तर (परिमिताम्) वह शाला चारों ओर के परिमाण से समचौरस हो (उत) और (शालायाः) शाला, अर्थात् उस घर के (विश्ववारायाः) द्वार चारों ओर के वायु को स्वीकार करनेवाले हों। (नद्धानि) उसके बन्धन और चिनाई दृढ़ हों। हे मनुष्यो ! ऐसी शाला को जैसे हम शिल्पी लोग (विचृत्तामसि) अच्छे प्रकार ग्रन्थित, अर्थात् बन्धनयुक्त करते हैं, वैसे तुम भी करो ॥१॥ उस घर में एक (हविर्धानम्) होम करने के पदार्थ रखने का स्थान, (अग्निशालम्) अग्निहोत्र का स्थान, (पत्नीनाम्) स्त्रियों के (सदनम्) रहने का (सदः) स्थान और (देवानाम्) पुरुषों और विद्वानों के रहने-बैठने, मेल-मिलाप करने और सभा का (सदः) स्थान, तथा स्नान, भोजन, ध्यान आदि का भी पृथक्-पृथक् एक-एक घर बनावे। इस प्रकार की (देवि) दिव्य, कमनीय (शाले) बनाई हुई शाला (असि) सुखदायकं होती है ॥२॥ अन्तरा॒ द्यां च॑ पृथि॒वीं च॒ यद्ध्य॒क्षस्तेन॑ शा॒लां प्रति॑ गृहामि त इ॒माम्। यद॒न्तरि॑क्षं रज॑सो वि॒मानं॒ तत् कृ॑ण्वे॒ऽहमु॒दरं॑ शेव॒धिभ्य॑ः । तेन॒ शालां प्रति॑ गृह्णामि तस्मै॑ ॥ ३ ॥ ऊर्जा॑स्वती पय॑स्वती पृथि॒व्यां निर्मि॑ता मि॒ता । वि॒श्वान्नं॒ बिभ्र॑ती शाले॒ मा हिं॑सीः प्रतिगृ॒ह्णतः ॥४॥ अर्थः- उस शाला में (अन्तरा) भिन्न-भिन्न (पृथिवीम्) शुद्ध भूमि, अर्थात् चारों ओर स्थान शुद्ध हों (च) और (द्याम्)
गृहाश्रमप्रकरणम् २२९ जिसमें सूर्य का प्रतिभास आवे, वैसी प्रकाशस्वरूप, भूमि के समान दृढ़ शाला बनावे (च) और (यत्) जो (व्यचः) उसकी व्याप्ति, अर्थात् विस्तार है, हे स्त्रि! (ते) तेरे लिए है, (तेन) उसी से युक्त (इमाम्) इस (शालाम्) घर को बनाता हूँ, तू इसमें निवास कर और मैं भी निवास के लिए इसको (प्रतिगृह्णामि) ग्रहण करता हूँ। (यत्) जो उसके बीच में (अन्तरिक्षम्) पुष्कल अवकाश और (रजसः) उस घर का (विमानम्) विषेश मान- परिमाणयुक्त लम्बी, ऊँची छत और (उदरम्) भीतर का प्रसार विस्तारयुक्त होवे, (तत्) उसे (शेवधिभ्यः) सुख के आधाररूप अनेक कक्षाओं से सुशोभित (अहम्) मैं (कृण्वे) करता हूँ। (तेन) उस पूर्वोक्त लक्षणमात्र से युक्त (शालाम्) शाला को (तस्मै) उस गृहाश्रम के सब व्यवहारों के लिए (प्रतिगृह्णामि) ग्रहण करता हूँ॥ ३ ॥ जो (शाले) शाला (ऊर्जस्वती) बहुत बलारोग्य, पराक्रम को बढ़ानेवाली और धन-धान्य से पूरित सम्बन्धवाली, (पयस्वती) जल, दूध, रसादि से परिपूर्ण, (पृथिव्याम्) पृथिवी में (मिता) परिमाणयुक्त (निमिता) निर्मित की हुई (विश्वान्नम्) सम्पूर्ण अन्नादि ऐश्वर्य को (बिभ्रती) धारण करती हुई (प्रतिगृह्णतः) ग्रहण करनेवालों को रोगादि से (मा हिंसीः) पीड़ित न करे, वैसा घर बनाना चाहिए ॥ ४ ॥ ब्रह्म॑णा॒ शालां॒ निर्मि॑तां क॒विभि॒र्निर्मि॑तां मि॒ताम्। इन्द्रा॒ग्नी र॑क्षतां॒ शाला॑म॒मृतौ॒ सोम्यं॒ सदः॑ ॥ ५ ॥ अर्थ— (अमृतौ) स्वरूप से नाशरहित (इन्द्राग्नी) वायु और पावक, (कविभिः) उत्तम विद्वान् शिल्पियों ने (मिताम्) प्रमाणयुक्त, अर्थात् माप में ठीक जैसी चाहिए वैसी (निमिताम्) बनाई हुई (शालाम्) शाला को और (ब्रह्मणा) चारों वेदों के जाननेवाले विद्वान् द्वारा सब ऋतुओं में सुख देनेवाली (निमिताम्)
२३० संस्कारविधिः बनाई हुई (शालाम्) शाला को प्राप्त होकर रहनेवालों की (रक्षताम्) रक्षा करें, अर्थात् चारों ओर का शुद्ध वायु आके अशुद्ध वायु को निकालता रहे और जिसमें सुगन्ध्यादि घृत का होम किया जाए, वह अग्नि दुर्गन्ध को निकाल सुगन्ध का स्थापन करे। वह (सोम्यम्) ऐश्वर्य, आरोग्य और सर्वदा सुखदायक (सदः) रहने के लिए उत्तम घर है। उसी को निवास के लिए ग्रहण करे॥ ५॥ या द्विप॑क्षा चतु॑ष्पक्षा षट्प॑क्षा या नि॒मीयते॑। अ॒ष्टाप॑क्षां दश॑पक्षां शालां मान॑स्य॒ पत्नी॑म॒ग्निर्गर्भ॑इ॒वा श॑ये॥ ६॥ अर्थ—हे मनुष्यो! (या) जो (द्विपक्षा) दो पक्ष, अर्थात् मध्य में एक और पूर्व-पश्चिम में एक-एक शालायुक्त घर, अथवा (चतुष्पक्षा) जिसके पूर्व, पश्चिम, दक्षिण और उत्तर में एक-एक शाला और इनके मध्य में पाँचवीं बड़ी शाला वा (षट्पक्षा) एक बीच में बड़ी शाला और दो-दो पूर्व-पश्चिम तथा एक-एक उत्तर-दक्षिण में शाला हो, (या) जो ऐसी शाला (निमीयते) बनाई जाती है, वह उत्तम होती है और इससे भी जो (अष्टापक्षाम्) चारों ओर दो-दो शाला और उनके बीच में एक नवमी शाला हो, अथवा (दशपक्षाम्) जिसके मध्य में दो शाला और उनके चारों दिशाओं में दो-दो शाला हों, उस (मानस्य) परिमाण के योग से बनाई हुई (शालाम्) शाला को जैसे (पत्नीम्) पत्नी को प्राप्त होके (अग्निः) अग्निमय आर्त्तव और वीर्य (गर्भः इव) गर्भरूप होके (आशये) गर्भाशय में ठहरता है, वैसे सब शालाओं के द्वार दो-दो हाथ पर सूधे बराबर हों॥ और जिसकी चारों ओर की शालाओं का परिमाण तीन- तीन गज और मध्य की शालाओं का छह-छह गज से परिमाण न्यून न हो और चार-चार गज चारों दिशाओं की और आठ-
गृहाश्रमप्रकरणम् २३१ आठ गज मध्य की शालाओं का परिमाण हो, अथवा मध्य की शालाओं का दश-दश गज, अर्थात् बीस-बीस हाथ से विस्तार अधिक न हों, बनाकर गृहस्थों को रहना चाहिए। यदि वह सभा का स्थान हो तो बाहर की ओर द्वारों में चारों ओर कपाट और मध्य में गोल-गोल स्तम्भ बनाकर चारों ओर खुला बनाना चाहिए कि जिसके कपाट खोलने से चारों ओर का वायु उसमें आवे और सब घरों के चारों ओर वायु आनेके लिए अवकाश तथा वृक्ष, फल और पुष्करणी कुण्ड भी होने चाहिएँ, वैसे घरों में सब लोग रहें॥६॥ प्र॒तीचीं॑ त्वां प्र॒तीची॑नः शाले॒ प्रैम्यहिंस॑तीम्। अ॒ग्निर्ह्य१॒॑न्तराप॑श्च ऋ॒तस्य॑ प्रथ॒मा द्वाः॥७॥ अर्थ—जो (शाले) शालागृह (प्रतीचीनः) पूर्वाभिमुख तथा जो गृह (प्रतीचीम्) पश्चिम द्वारयुक्त, (अहिंसतीम्) हिंसादि दोषरहित, अर्थात् पश्चिम द्वार के सम्मुख पूर्व द्वार जिसमें (हि) निश्चय कर (अन्तः) बीच में (अग्निः) अग्नि का घर (च) और (आपः) जल का स्थान (ऋतस्य) और सत्य के ध्यान के लिए एक स्थान (प्रथमा) प्रथम (द्वाः) द्वार है, मैं (त्वा) उस शाला को (प्रैमि) प्रकर्षता से प्राप्त होता हूँ॥७॥ मा नः॒ पाशं॒ प्रति॑ मुचो गुरु॒भारो॑ लघु॒र्भव॑। व॒धूम॑िव त्वा शाले॒ यत्र॒कामं॑ भरामसि॥८॥ —अथर्व० कां० ९। अ० २। वर्ग ३॥ अर्थ—हे शिल्पि लोगो ! जैसे (नः) हमारी (शाले) शाला, अर्थात् गृह (पाशम्) बन्धन को (मा प्रतिमुचः) कभी न छोड़े, जिसमें (गुरुभारः) बड़ा भार (लघुर्भव) छोटा होवे, वैसी बनाओ। (त्वा) उस शाला को (यत्रकामम्) जहाँ जैसी कामना हो, वहाँ वैसी हम लोग (वधूमिव) स्त्री के समान (भरामसि) स्वीकार करते हैं, वैसे तुम भी ग्रहण करो ॥८॥
२३२ संस्कारविधिः इस प्रकार प्रमाणों के अनुसार जब घर बन चुके, तब प्रवेश करते समय क्या-क्या विधि करनी, वह नीचे लिखे प्रमाणे जानो— अथ विधि—जब घर बन चुके, तब उसकी अच्छे प्रकार शुद्धि करा, चारों दिशाओं के बाहरवाले द्वारों में चार वेदी और एक वेदी घर के मध्य बनावे, अथवा तांबे का वेदी के समान कुण्ड बनवा लेवे कि जिससे सब ठिकाने एक कुण्ड ही में काम हो जावे। सब प्रकार की सामग्री, अर्थात् पृष्ठ २३-२४ में लिखे प्रमाणे समिधा, घृत, चावल, मिष्ट, सुगन्ध, पुष्टिकारक द्रव्यों को लेके शोधन कर प्रथम दिन रख लेवे। जिस दिन गृहपति का चित्त प्रसन्न होवे, उसी शुभ दिन में गृहप्रतिष्ठा करे। वहाँ ऋत्विज्, होता, अध्वर्यु और ब्रह्मा का वरण करे, जोकि धर्मात्मा, विद्वान् हों। वे सब वेदी से पश्चिम दिशा में बैठें। उनमें से होता का आसन पश्चिम में और उसपर वह पूर्वाभिमुख, अध्वर्यु का आसन उत्तर में उसपर वह दक्षिणाभिमुख, उद्गाता का पूर्व दिशा में आसन उसपर वह पश्चिमाभिमुख बैठे और ब्रह्मा का दक्षिण दिशा में उत्तमासन बिछाकर उसे उत्तराभिमुख बैठावे। इस प्रकार चारों आसनों पर चारों पुरुषों को बैठावे और गृहपति सर्वत्र पश्चिम में पूर्वाभिमुख बैठा करे। ऐसे ही घर के मध्य वेदी के चारों ओर दूसरे आसन बिछा रक्खे। पश्चात् निष्क्रम्यद्वार, जिस द्वार से मुख्य करके घर से निकलना और प्रवेश करना होवे, अर्थात् जो मुख्य द्वार हो, उसी द्वार के समीप ब्रह्मा-सहित बाहर ठहर कर— ओम् अच्युताय भौमाय स्वाहा ॥ इससे एक आहुति देकर, ध्वजा का स्तम्भ जिसमें ध्वजा लगाई हो, खड़ा करे और घर के ऊपर चारों कोणों पर चार ध्वजा खड़ी करे तथा कार्यकर्त्ता गृहपति स्तम्भ खड़ा करके