संस्कार विधि (महर्षि दयानन्द सरस्वती - षोडश वैदिक संस्कार एवं गुरुकुल विधान सटीक)
Sanskar Vidhi of Maharshi Dayananda Saraswati
महर्षि स्वामी दयानन्द सरस्वती द्वारा
पृष्ठ 224, कुल 318 में से
संदर्भ में पढ़ें२२० संस्कारविधिः इन मन्त्रों को पढ़ते जाना और अपने मन से चारों ओर बाहर-भीतर परमात्मा को पूर्ण जानकर निर्भय, निश्शङ्क, उत्साही, आनन्दित, पुरुषार्थी रहना। तत्पश्चात् परमात्मा का उपस्थान, अर्थात् परमेश्वर के निकट मैं और मेरे अतिनिकट परमात्मा है, ऐसी बुद्धि करके करे— जा॒तवे॑दसे सुनवाम॒ सोम॑मरातीय॒तो नि द॑हाति॒ वेद॑ः। स न॑ः पर्षदति॑ दु॒र्गाणि॒ विश्वा॑ ना॒वेव॒ सिन्धुं॑ दुरि॒तात्य॒ग्निः ॥ १ ॥ —ऋ० मं० १। सू० ९९। मं० १॥ चि॒त्रं दे॒वाना॒मुद॑गा॒दनी॑कं॒ चक्षु॑र्मि॒त्रस्य॒ वरु॑णस्या॒ग्नेः। आप्रा॒ द्यावा॑पृथि॒वीऽअ॒न्तरि॑क्ष॒ꣳ सूर्य॑ऽआ॒त्मा जग॑तस्त॒स्थुष॑श्च स्वाहा ॥ १ ॥ —यजुः० अ० १३। मं० ४६॥ उदु॒ त्यं जा॒तवे॑दसं दे॒वं व॑हन्ति के॒तव॑ः। दृशे विश्वा॑य॒ सूर्य॑म्॥ २ ॥ —यजुः० अ० ३३। मन्त्र ३१॥ उद्व॒यं तम॑स॒स्परि॒ स्वः॒ पश्य॑न्त॒ऽ उत्तर॑म्। दे॒वं दे॑व॒त्रा सूर्य॑मगन्म॒ ज्योति॑रुत्त॒मम्॥ ३ ॥ —यजुः० अ० ३५। मन्त्र १४॥ तच्चक्षु॑र्दे॒वहि॑तं पु॒रस्ता॑च्छु॒क्रमुच्च॑रत्। पश्ये॑म श॒रद॑ः श॒तं जीवे॑म श॒रद॑ः श॒तः॑ शृणु॑याम श॒रद॑ः श॒तं प्रब्र॑वाम श॒रद॑ः श॒तमदी॑नाः स्याम श॒रद॑ः श॒तं भूय॑श्च श॒रद॑ः श॒तात्॥४॥ —यजुः० अ० ३६। मं० २४॥ इन मन्त्रों से परमात्मा का उपस्थान करके, पुनः (शन्नो देवी०) इस मन्त्र से तीन आचमन करके, पृष्ठ १०३ में लिखे प्रमाणे, अथवा पञ्चमहायज्ञविधि में लिखे प्रमाणे गायत्रीमन्त्र के अर्थ-विचारपूर्वक परमात्मा की स्तुतिप्रार्थनोपासना करे। पुनः—