संस्कार विधि (महर्षि दयानन्द सरस्वती - षोडश वैदिक संस्कार एवं गुरुकुल विधान सटीक)
Sanskar Vidhi of Maharshi Dayananda Saraswati
महर्षि स्वामी दयानन्द सरस्वती द्वारा
पृष्ठ 225, कुल 318 में से
संदर्भ में पढ़ेंगृहाश्रमप्रकरणम् २२१ "हे परमेश्वर दयानिधे! आपकी कृपा से जपोपासनादि कर्मों को करके हम धर्म, अर्थ, काम और मोक्ष की सिद्धि को शीघ्र प्राप्त होवें।" पुनः— ओं नम॑ः शम्भ॒वाय॑ च मयो॒भुवाय॑ च॒ नम॑ः शङ्क॒राय॑ च मयस्क॒राय॑ च॒ नम॑ः शि॒वाय॑ च शि॒वत॑राय च ॥ १ ॥ —यजुः० अ० १६। मं० ४१ ॥ इससे परमात्मा को नमस्कार करके, (शन्नो देवी०) इस मन्त्र से तीन आचमन करके अग्निहोत्र का आरम्भ करे। इति संक्षेपतः सन्ध्योपासनविधिः समाप्त ॥ १ ॥ अथाग्निहोत्रम् जैसे सायं-प्रातः दोनों सन्धिवेलाओं में सन्ध्योपासन करें, इसी प्रकार दोनों स्त्री-पुरुष* अग्निहोत्र भी दोनों समय में नित्य किया करें। पृष्ठ ३०-३१ में लिखे प्रमाणे अग्न्याधान, समिदाधान और पृष्ठ ३२ में लिखे प्रमाणे (ओम् अदितेऽनुमन्यस्व) इत्यादि चार मन्त्रों से यथाविधि कुण्ड के चारों ओर जल-प्रोक्षण करके शुद्ध किये हुए सुगन्ध्यादियुक्त घी को तपाके, पात्र में लेके, कुण्ड से पश्चिमभाग में पूर्वाभिमुख बैठके पृष्ठ २७ में लिखे प्रमाणे आघारावाज्यभागाहुति चार देके, नीचे लिखे हुए मन्त्रों से प्रातःकाल अग्निहोत्र करे— ओं सूर्यो॒ ज्योति॒र्ज्योति॑ः सूर्यः॒ स्वाहा॑ ॥ १ ॥ ओं सूर्यो॒ वर्चो॒ ज्योति॒र्वर्च॑ः स्वाहा॑ ॥ २ ॥ ओं ज्योति॑ः सूर्यः॒ सूर्यो॒ ज्योति॑ः स्वाहा॑ ॥ ३ ॥
- किसी विशेष कारण से स्त्री वा पुरुष अग्निहोत्र के समय दोनों साथ उपस्थित न हो सकें तो एक ही स्त्री वा पुरुष दोनों की ओर का कृत्य कर लेवे अर्थात् एक-एक मन्त्र को दो-दो बार पढ़के दो-दो आहुति करे।