संस्कार विधि (महर्षि दयानन्द सरस्वती - षोडश वैदिक संस्कार एवं गुरुकुल विधान सटीक)
Sanskar Vidhi of Maharshi Dayananda Saraswati
महर्षि स्वामी दयानन्द सरस्वती द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें२३२ संस्कारविधिः इस प्रकार प्रमाणों के अनुसार जब घर बन चुके, तब प्रवेश करते समय क्या-क्या विधि करनी, वह नीचे लिखे प्रमाणे जानो— अथ विधि—जब घर बन चुके, तब उसकी अच्छे प्रकार शुद्धि करा, चारों दिशाओं के बाहरवाले द्वारों में चार वेदी और एक वेदी घर के मध्य बनावे, अथवा तांबे का वेदी के समान कुण्ड बनवा लेवे कि जिससे सब ठिकाने एक कुण्ड ही में काम हो जावे। सब प्रकार की सामग्री, अर्थात् पृष्ठ २३-२४ में लिखे प्रमाणे समिधा, घृत, चावल, मिष्ट, सुगन्ध, पुष्टिकारक द्रव्यों को लेके शोधन कर प्रथम दिन रख लेवे। जिस दिन गृहपति का चित्त प्रसन्न होवे, उसी शुभ दिन में गृहप्रतिष्ठा करे। वहाँ ऋत्विज्, होता, अध्वर्यु और ब्रह्मा का वरण करे, जोकि धर्मात्मा, विद्वान् हों। वे सब वेदी से पश्चिम दिशा में बैठें। उनमें से होता का आसन पश्चिम में और उसपर वह पूर्वाभिमुख, अध्वर्यु का आसन उत्तर में उसपर वह दक्षिणाभिमुख, उद्गाता का पूर्व दिशा में आसन उसपर वह पश्चिमाभिमुख बैठे और ब्रह्मा का दक्षिण दिशा में उत्तमासन बिछाकर उसे उत्तराभिमुख बैठावे। इस प्रकार चारों आसनों पर चारों पुरुषों को बैठावे और गृहपति सर्वत्र पश्चिम में पूर्वाभिमुख बैठा करे। ऐसे ही घर के मध्य वेदी के चारों ओर दूसरे आसन बिछा रक्खे। पश्चात् निष्क्रम्यद्वार, जिस द्वार से मुख्य करके घर से निकलना और प्रवेश करना होवे, अर्थात् जो मुख्य द्वार हो, उसी द्वार के समीप ब्रह्मा-सहित बाहर ठहर कर— ओम् अच्युताय भौमाय स्वाहा ॥ इससे एक आहुति देकर, ध्वजा का स्तम्भ जिसमें ध्वजा लगाई हो, खड़ा करे और घर के ऊपर चारों कोणों पर चार ध्वजा खड़ी करे तथा कार्यकर्त्ता गृहपति स्तम्भ खड़ा करके