भारतकोश
संस्कार विधि (महर्षि दयानन्द सरस्वती - षोडश वैदिक संस्कार एवं गुरुकुल विधान सटीक)

संस्कार विधि (महर्षि दयानन्द सरस्वती - षोडश वैदिक संस्कार एवं गुरुकुल विधान सटीक)

Sanskar Vidhi of Maharshi Dayananda Saraswati

महर्षि स्वामी दयानन्द सरस्वती द्वारा

DevanagariHindipublished318 पृष्ठ

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पृष्ठ 235

गृहाश्रमप्रकरणम् २३१ आठ गज मध्य की शालाओं का परिमाण हो, अथवा मध्य की शालाओं का दश-दश गज, अर्थात् बीस-बीस हाथ से विस्तार अधिक न हों, बनाकर गृहस्थों को रहना चाहिए। यदि वह सभा का स्थान हो तो बाहर की ओर द्वारों में चारों ओर कपाट और मध्य में गोल-गोल स्तम्भ बनाकर चारों ओर खुला बनाना चाहिए कि जिसके कपाट खोलने से चारों ओर का वायु उसमें आवे और सब घरों के चारों ओर वायु आनेके लिए अवकाश तथा वृक्ष, फल और पुष्करणी कुण्ड भी होने चाहिएँ, वैसे घरों में सब लोग रहें॥६॥ प्र॒तीचीं॑ त्वां प्र॒तीची॑नः शाले॒ प्रैम्यहिंस॑तीम्। अ॒ग्निर्ह्य१॒॑न्तराप॑श्च ऋ॒तस्य॑ प्रथ॒मा द्वाः॥७॥ अर्थ—जो (शाले) शालागृह (प्रतीचीनः) पूर्वाभिमुख तथा जो गृह (प्रतीचीम्) पश्चिम द्वारयुक्त, (अहिंसतीम्) हिंसादि दोषरहित, अर्थात् पश्चिम द्वार के सम्मुख पूर्व द्वार जिसमें (हि) निश्चय कर (अन्तः) बीच में (अग्निः) अग्नि का घर (च) और (आपः) जल का स्थान (ऋतस्य) और सत्य के ध्यान के लिए एक स्थान (प्रथमा) प्रथम (द्वाः) द्वार है, मैं (त्वा) उस शाला को (प्रैमि) प्रकर्षता से प्राप्त होता हूँ॥७॥ मा नः॒ पाशं॒ प्रति॑ मुचो गुरु॒भारो॑ लघु॒र्भव॑। व॒धूम॑िव त्वा शाले॒ यत्र॒कामं॑ भरामसि॥८॥ —अथर्व० कां० ९। अ० २। वर्ग ३॥ अर्थ—हे शिल्पि लोगो ! जैसे (नः) हमारी (शाले) शाला, अर्थात् गृह (पाशम्) बन्धन को (मा प्रतिमुचः) कभी न छोड़े, जिसमें (गुरुभारः) बड़ा भार (लघुर्भव) छोटा होवे, वैसी बनाओ। (त्वा) उस शाला को (यत्रकामम्) जहाँ जैसी कामना हो, वहाँ वैसी हम लोग (वधूमिव) स्त्री के समान (भरामसि) स्वीकार करते हैं, वैसे तुम भी ग्रहण करो ॥८॥