भारतकोश
संस्कार विधि (महर्षि दयानन्द सरस्वती - षोडश वैदिक संस्कार एवं गुरुकुल विधान सटीक)

संस्कार विधि (महर्षि दयानन्द सरस्वती - षोडश वैदिक संस्कार एवं गुरुकुल विधान सटीक)

Sanskar Vidhi of Maharshi Dayananda Saraswati

महर्षि स्वामी दयानन्द सरस्वती द्वारा

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पृष्ठ 234

२३० संस्कारविधिः बनाई हुई (शालाम्) शाला को प्राप्त होकर रहनेवालों की (रक्षताम्) रक्षा करें, अर्थात् चारों ओर का शुद्ध वायु आके अशुद्ध वायु को निकालता रहे और जिसमें सुगन्ध्यादि घृत का होम किया जाए, वह अग्नि दुर्गन्ध को निकाल सुगन्ध का स्थापन करे। वह (सोम्यम्) ऐश्वर्य, आरोग्य और सर्वदा सुखदायक (सदः) रहने के लिए उत्तम घर है। उसी को निवास के लिए ग्रहण करे॥ ५॥ या द्विप॑क्षा चतु॑ष्पक्षा षट्प॑क्षा या नि॒मीयते॑। अ॒ष्टाप॑क्षां दश॑पक्षां शालां मान॑स्य॒ पत्नी॑म॒ग्निर्गर्भ॑इ॒वा श॑ये॥ ६॥ अर्थ—हे मनुष्यो! (या) जो (द्विपक्षा) दो पक्ष, अर्थात् मध्य में एक और पूर्व-पश्चिम में एक-एक शालायुक्त घर, अथवा (चतुष्पक्षा) जिसके पूर्व, पश्चिम, दक्षिण और उत्तर में एक-एक शाला और इनके मध्य में पाँचवीं बड़ी शाला वा (षट्पक्षा) एक बीच में बड़ी शाला और दो-दो पूर्व-पश्चिम तथा एक-एक उत्तर-दक्षिण में शाला हो, (या) जो ऐसी शाला (निमीयते) बनाई जाती है, वह उत्तम होती है और इससे भी जो (अष्टापक्षाम्) चारों ओर दो-दो शाला और उनके बीच में एक नवमी शाला हो, अथवा (दशपक्षाम्) जिसके मध्य में दो शाला और उनके चारों दिशाओं में दो-दो शाला हों, उस (मानस्य) परिमाण के योग से बनाई हुई (शालाम्) शाला को जैसे (पत्नीम्) पत्नी को प्राप्त होके (अग्निः) अग्निमय आर्त्तव और वीर्य (गर्भः इव) गर्भरूप होके (आशये) गर्भाशय में ठहरता है, वैसे सब शालाओं के द्वार दो-दो हाथ पर सूधे बराबर हों॥ और जिसकी चारों ओर की शालाओं का परिमाण तीन- तीन गज और मध्य की शालाओं का छह-छह गज से परिमाण न्यून न हो और चार-चार गज चारों दिशाओं की और आठ-