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संस्कार विधि (महर्षि दयानन्द सरस्वती - षोडश वैदिक संस्कार एवं गुरुकुल विधान सटीक)

संस्कार विधि (महर्षि दयानन्द सरस्वती - षोडश वैदिक संस्कार एवं गुरुकुल विधान सटीक)

Sanskar Vidhi of Maharshi Dayananda Saraswati

महर्षि स्वामी दयानन्द सरस्वती द्वारा

DevanagariHindipublished318 पृष्ठ

पृष्ठ 229, कुल 318 में से

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पृष्ठ 229

गृहाश्रमप्रकरणम् २२५ कृमि—इन छह नामों से छह भाग पृथिवी पर धरै और वे छह भाग जिस-जिसके नाम से हैं, उस-उसको देना चाहिए ॥४॥ अथातिथियज्ञः पाँचवाँ—धार्मिक, परोपकारी, सत्योपदेशक, पक्षपातरहित, शान्त, सर्वहितकारक विद्वानों की अन्नादि से सेवा, उनसे प्रश्नोत्तर आदि करके विद्या की प्राप्ति होना 'अतिथियज्ञ' कहाता है, उसे नित्य किया करें। इस प्रकार पञ्चमहायज्ञों को स्त्री-पुरुष प्रतिदिन करते रहें ॥५॥ इसके पश्चात् पक्षयज्ञ, अर्थात् पौर्णमासी और अमावास्या के दिन नैत्यिक अग्निहोत्र की आहुति दिये पश्चात् पूर्वोक्त प्रकार पृष्ठ २४ में लिखे प्रमाणे स्थालीपाक बनाके निम्नलिखित मन्त्रों से विशेष आहुति करें— ओम् अग्नये स्वाहा ॥ ओम् अग्नीषोमाभ्यां स्वाहा ॥ ओं विष्णवे स्वाहा ॥ इन तीन मन्त्रों से स्थालीपाक की तीन आहुति देनी। तत्पश्चात् पृष्ठ ३३ में लिखे प्रमाणे व्याहृति आज्याहुति चार देनी, परन्तु इसमें इतना भेद है कि अमावास्या के दिन— ओम् अग्नीषोमाभ्यां स्वाहा ॥ इस मन्त्र के बदले— ओम् इन्द्राग्नीभ्यां स्वाहा ॥ इस मन्त्र को बोलके स्थालीपाक की आहुति देवे। इस प्रकार पक्षयाग, अर्थात् जिसके घर में अभाग्य से प्रतिदिन अग्निहोत्र न होता हो तो सर्वत्र पक्षयागादि में पृष्ठ २२- २४ में लिखे प्रमाणे यज्ञकुण्ड, यज्ञसामग्री, यज्ञमण्डप; पृष्ठ ३०- ३२ में लिखे प्रमाणे अग्न्याधान, समिदाधान; पृष्ठ ३२-३३ में

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