संस्कार विधि (महर्षि दयानन्द सरस्वती - षोडश वैदिक संस्कार एवं गुरुकुल विधान सटीक)
Sanskar Vidhi of Maharshi Dayananda Saraswati
महर्षि स्वामी दयानन्द सरस्वती द्वारा
पृष्ठ 230, कुल 318 में से
संदर्भ में पढ़ें२२६ संस्कारविधिः लिखे प्रमाणे आघारावाज्यभागाहुति; और पृष्ठ ३२ में लिखे प्रमाणे वेदी के चारों ओर जलसेचन करके पृष्ठ ९-२१ में लिखे प्रमाणे ईश्वरोपासना, स्वस्तिवाचन, शान्तिकरण भी यथायोग्य करे। और जब-जब नवान्न आवे, तब-तब नवशस्येष्टि और संवत्सर के आरम्भ में निम्नलिखित विधि करे, अर्थात् जब- जब नवीन अन्न आवे, तब-तब शस्येष्टि करके नवीन अन्न के भोजन का आरम्भ करे। नवशस्येष्टि और संवत्सरेष्टि करना हो तो जिस दिन प्रसन्नता हो वही शुभ दिन जाने। ग्राम और शहर के बाहर किसी शुद्ध खेत में यज्ञमण्डप करके पृष्ठ ९-३४ तक लिखे प्रमाणे सब विधि करके प्रथम आघारावाज्यभागाहुति चार और व्याहृति आहुति चार तथा अष्टज्याहुति आठ, ये सोलह आज्याहुति करके, कार्यकर्त्ता— ओं पृथिवी द्यौः प्रदिशो दिशो यस्मै द्युभिरावृताः। तमिहेन्द्रमुपह्वये शिवा नः सन्तु हेतयः स्वाहा ॥ १ ॥ ओं यन्मे किंचिदुपेप्सितमस्मिन् कर्मणि वृत्रहन्। तन्मे सर्वँ समृद्ध्यतां जीवतः शरदः शतꣳ स्वाहा ॥ २ ॥ ओं सम्पत्तिर्भूमिर्वृष्टिर्ज्यैष्ठ्यꣳ श्रैष्ठ्यꣳ श्रीः प्रजामिहावतु स्वाहा ॥ इदमिन्द्राय-इदन्न मम ॥ ३ ॥ ओं यस्या भावे वैदिकलौकिकानां भूतिर्भवति कर्मणाम्। इन्द्रपत्नीमुपह्वये सीताꣳ सा मे त्वनपायिनी भूयात् कर्मणि कर्मणि स्वाहा ॥ इदमिन्द्रपत्त्यै-इदन्न मम ॥ ४ ॥ ओम् अश्वावती गोमती सूनूतावती बिभर्त्ति या प्राणभृतो अतन्द्रिता। खलामालिनीमुर्वरामस्मिन् कर्मण्युपह्वये ध्रुवाꣳ सा मे त्वनपायिनी भूयात् स्वाहा ॥ इदं सीतायै-इदन्न मम ॥ ५ ॥