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संस्कार विधि (महर्षि दयानन्द सरस्वती - षोडश वैदिक संस्कार एवं गुरुकुल विधान सटीक)

Sanskar Vidhi of Maharshi Dayananda Saraswati

महर्षि स्वामी दयानन्द सरस्वती द्वारा

DevanagariHindipublished318 पृष्ठ

२२६ संस्कारविधिः लिखे प्रमाणे आघारावाज्यभागाहुति; और पृष्ठ ३२ में लिखे प्रमाणे वेदी के चारों ओर जलसेचन करके पृष्ठ ९-२१ में लिखे प्रमाणे ईश्वरोपासना, स्वस्तिवाचन, शान्तिकरण भी यथायोग्य करे। और जब-जब नवान्न आवे, तब-तब नवशस्येष्टि और संवत्सर के आरम्भ में निम्नलिखित विधि करे, अर्थात् जब- जब नवीन अन्न आवे, तब-तब शस्येष्टि करके नवीन अन्न के भोजन का आरम्भ करे। नवशस्येष्टि और संवत्सरेष्टि करना हो तो जिस दिन प्रसन्नता हो वही शुभ दिन जाने। ग्राम और शहर के बाहर किसी शुद्ध खेत में यज्ञमण्डप करके पृष्ठ ९-३४ तक लिखे प्रमाणे सब विधि करके प्रथम आघारावाज्यभागाहुति चार और व्याहृति आहुति चार तथा अष्टज्याहुति आठ, ये सोलह आज्याहुति करके, कार्यकर्त्ता— ओं पृथिवी द्यौः प्रदिशो दिशो यस्मै द्युभिरावृताः। तमिहेन्द्रमुपह्वये शिवा नः सन्तु हेतयः स्वाहा ॥ १ ॥ ओं यन्मे किंचिदुपेप्सितमस्मिन् कर्मणि वृत्रहन्। तन्मे सर्वँ समृद्ध्यतां जीवतः शरदः शतꣳ स्वाहा ॥ २ ॥ ओं सम्पत्तिर्भूमिर्वृष्टिर्ज्यैष्ठ्यꣳ श्रैष्ठ्यꣳ श्रीः प्रजामिहावतु स्वाहा ॥ इदमिन्द्राय-इदन्न मम ॥ ३ ॥ ओं यस्या भावे वैदिकलौकिकानां भूतिर्भवति कर्मणाम्। इन्द्रपत्नीमुपह्वये सीताꣳ सा मे त्वनपायिनी भूयात् कर्मणि कर्मणि स्वाहा ॥ इदमिन्द्रपत्त्यै-इदन्न मम ॥ ४ ॥ ओम् अश्वावती गोमती सूनूतावती बिभर्त्ति या प्राणभृतो अतन्द्रिता। खलामालिनीमुर्वरामस्मिन् कर्मण्युपह्वये ध्रुवाꣳ सा मे त्वनपायिनी भूयात् स्वाहा ॥ इदं सीतायै-इदन्न मम ॥ ५ ॥

गृहाश्रमप्रकरणम् २२७ इन मन्त्रों से प्रधानहोम की पाँच आज्याहुति करके— ओं सीतायै स्वाहा॥ ओं प्रजायै स्वाहा॥ ओं शमायै स्वाहा॥ ओं भूत्यै स्वाहा॥ इन चार मन्त्रों से चार और पृष्ठ ३३ में लिखे प्रमाणे (यदस्य०) मन्त्र से स्विष्टकृत् होमाहुति एक ऐसे पाँच स्थालीपाक की आहुति देके, पश्चात् पृष्ठ ३४-३५ में लिखे प्रमाणे अष्टाज्याहुति आठ, पृष्ठ ३३ में लिखे प्रमाणे व्याहृति आहुति चार, ऐसे बारह आज्याहुति देके, पृष्ठ ३६-३७ में लिखे प्रमाणे महावामदेव्यगान, ईश्वरोपासना, स्वस्तिवाचन और शान्तिकरण करके यज्ञ की समाप्ति करें॥ अथ शालाकर्मविधिं वक्ष्यामः ‘शाला’ उसे कहते हैं—जो मनुष्य और पश्चादि के रहने, अथवा पदार्थ रखने के अर्थ गृह वा स्थानविशेष बनाते हैं। इसके दो विषय हैं—एक प्रमाण और दूसरा विधि। उसमें से प्रथम प्रमाण और पश्चात् विधि लिखेंगे। अत्र प्रमाणानि उ॒पमि॑तां प्र॒तिमि॑ता॒मथो॑ प॒रिमि॑तामु॒त। शाला॑या वि॒श्ववा॑राया न॒द्धानि॒ वि चृ॑तामसि॥ १॥ ह॒वि॒र्धान॑म॒ग्निशा॒लं पत्नी॑नां॒ सद॑नं॒ सद॑:। सदो॑ दे॒वाना॑मसि देवि शाले॥ २॥ अर्थ:—मनुष्यों को योग्य है कि जो कोई किसी प्रकार का घर बनावें तो वह (उपमिताम्) सब प्रकार की. उत्तम

२२८ संस्कारविधिः उपमायुक्त कि जिसको देखके विद्वान् लोग सराहना करें। (प्रतिमिताम्) प्रतिमान, अर्थात् एक द्वार के सामने दूसरा द्वार, कोने और कक्षा भी सम्मुख हों। (अथो) इसके अनन्तर (परिमिताम्) वह शाला चारों ओर के परिमाण से समचौरस हो (उत) और (शालायाः) शाला, अर्थात् उस घर के (विश्ववारायाः) द्वार चारों ओर के वायु को स्वीकार करनेवाले हों। (नद्धानि) उसके बन्धन और चिनाई दृढ़ हों। हे मनुष्यो ! ऐसी शाला को जैसे हम शिल्पी लोग (विचृत्तामसि) अच्छे प्रकार ग्रन्थित, अर्थात् बन्धनयुक्त करते हैं, वैसे तुम भी करो ॥१॥ उस घर में एक (हविर्धानम्) होम करने के पदार्थ रखने का स्थान, (अग्निशालम्) अग्निहोत्र का स्थान, (पत्नीनाम्) स्त्रियों के (सदनम्) रहने का (सदः) स्थान और (देवानाम्) पुरुषों और विद्वानों के रहने-बैठने, मेल-मिलाप करने और सभा का (सदः) स्थान, तथा स्नान, भोजन, ध्यान आदि का भी पृथक्-पृथक् एक-एक घर बनावे। इस प्रकार की (देवि) दिव्य, कमनीय (शाले) बनाई हुई शाला (असि) सुखदायकं होती है ॥२॥ अन्तरा॒ द्यां च॑ पृथि॒वीं च॒ यद्ध्य॒क्षस्तेन॑ शा॒लां प्रति॑ गृहामि त इ॒माम्। यद॒न्तरि॑क्षं रज॑सो वि॒मानं॒ तत् कृ॑ण्वे॒ऽहमु॒दरं॑ शेव॒धिभ्य॑ः । तेन॒ शालां प्रति॑ गृह्णामि तस्मै॑ ॥ ३ ॥ ऊर्जा॑स्वती पय॑स्वती पृथि॒व्यां निर्मि॑ता मि॒ता । वि॒श्वान्नं॒ बिभ्र॑ती शाले॒ मा हिं॑सीः प्रतिगृ॒ह्णतः ॥४॥ अर्थः- उस शाला में (अन्तरा) भिन्न-भिन्न (पृथिवीम्) शुद्ध भूमि, अर्थात् चारों ओर स्थान शुद्ध हों (च) और (द्याम्)

गृहाश्रमप्रकरणम् २२९ जिसमें सूर्य का प्रतिभास आवे, वैसी प्रकाशस्वरूप, भूमि के समान दृढ़ शाला बनावे (च) और (यत्) जो (व्यचः) उसकी व्याप्ति, अर्थात् विस्तार है, हे स्त्रि! (ते) तेरे लिए है, (तेन) उसी से युक्त (इमाम्) इस (शालाम्) घर को बनाता हूँ, तू इसमें निवास कर और मैं भी निवास के लिए इसको (प्रतिगृह्णामि) ग्रहण करता हूँ। (यत्) जो उसके बीच में (अन्तरिक्षम्) पुष्कल अवकाश और (रजसः) उस घर का (विमानम्) विषेश मान- परिमाणयुक्त लम्बी, ऊँची छत और (उदरम्) भीतर का प्रसार विस्तारयुक्त होवे, (तत्) उसे (शेवधिभ्यः) सुख के आधाररूप अनेक कक्षाओं से सुशोभित (अहम्) मैं (कृण्वे) करता हूँ। (तेन) उस पूर्वोक्त लक्षणमात्र से युक्त (शालाम्) शाला को (तस्मै) उस गृहाश्रम के सब व्यवहारों के लिए (प्रतिगृह्णामि) ग्रहण करता हूँ॥ ३ ॥ जो (शाले) शाला (ऊर्जस्वती) बहुत बलारोग्य, पराक्रम को बढ़ानेवाली और धन-धान्य से पूरित सम्बन्धवाली, (पयस्वती) जल, दूध, रसादि से परिपूर्ण, (पृथिव्याम्) पृथिवी में (मिता) परिमाणयुक्त (निमिता) निर्मित की हुई (विश्वान्नम्) सम्पूर्ण अन्नादि ऐश्वर्य को (बिभ्रती) धारण करती हुई (प्रतिगृह्णतः) ग्रहण करनेवालों को रोगादि से (मा हिंसीः) पीड़ित न करे, वैसा घर बनाना चाहिए ॥ ४ ॥ ब्रह्म॑णा॒ शालां॒ निर्मि॑तां क॒विभि॒र्निर्मि॑तां मि॒ताम्। इन्द्रा॒ग्नी र॑क्षतां॒ शाला॑म॒मृतौ॒ सोम्यं॒ सदः॑ ॥ ५ ॥ अर्थ— (अमृतौ) स्वरूप से नाशरहित (इन्द्राग्नी) वायु और पावक, (कविभिः) उत्तम विद्वान् शिल्पियों ने (मिताम्) प्रमाणयुक्त, अर्थात् माप में ठीक जैसी चाहिए वैसी (निमिताम्) बनाई हुई (शालाम्) शाला को और (ब्रह्मणा) चारों वेदों के जाननेवाले विद्वान् द्वारा सब ऋतुओं में सुख देनेवाली (निमिताम्)

२३० संस्कारविधिः बनाई हुई (शालाम्) शाला को प्राप्त होकर रहनेवालों की (रक्षताम्) रक्षा करें, अर्थात् चारों ओर का शुद्ध वायु आके अशुद्ध वायु को निकालता रहे और जिसमें सुगन्ध्यादि घृत का होम किया जाए, वह अग्नि दुर्गन्ध को निकाल सुगन्ध का स्थापन करे। वह (सोम्यम्) ऐश्वर्य, आरोग्य और सर्वदा सुखदायक (सदः) रहने के लिए उत्तम घर है। उसी को निवास के लिए ग्रहण करे॥ ५॥ या द्विप॑क्षा चतु॑ष्पक्षा षट्प॑क्षा या नि॒मीयते॑। अ॒ष्टाप॑क्षां दश॑पक्षां शालां मान॑स्य॒ पत्नी॑म॒ग्निर्गर्भ॑इ॒वा श॑ये॥ ६॥ अर्थ—हे मनुष्यो! (या) जो (द्विपक्षा) दो पक्ष, अर्थात् मध्य में एक और पूर्व-पश्चिम में एक-एक शालायुक्त घर, अथवा (चतुष्पक्षा) जिसके पूर्व, पश्चिम, दक्षिण और उत्तर में एक-एक शाला और इनके मध्य में पाँचवीं बड़ी शाला वा (षट्पक्षा) एक बीच में बड़ी शाला और दो-दो पूर्व-पश्चिम तथा एक-एक उत्तर-दक्षिण में शाला हो, (या) जो ऐसी शाला (निमीयते) बनाई जाती है, वह उत्तम होती है और इससे भी जो (अष्टापक्षाम्) चारों ओर दो-दो शाला और उनके बीच में एक नवमी शाला हो, अथवा (दशपक्षाम्) जिसके मध्य में दो शाला और उनके चारों दिशाओं में दो-दो शाला हों, उस (मानस्य) परिमाण के योग से बनाई हुई (शालाम्) शाला को जैसे (पत्नीम्) पत्नी को प्राप्त होके (अग्निः) अग्निमय आर्त्तव और वीर्य (गर्भः इव) गर्भरूप होके (आशये) गर्भाशय में ठहरता है, वैसे सब शालाओं के द्वार दो-दो हाथ पर सूधे बराबर हों॥ और जिसकी चारों ओर की शालाओं का परिमाण तीन- तीन गज और मध्य की शालाओं का छह-छह गज से परिमाण न्यून न हो और चार-चार गज चारों दिशाओं की और आठ-

गृहाश्रमप्रकरणम् २३१ आठ गज मध्य की शालाओं का परिमाण हो, अथवा मध्य की शालाओं का दश-दश गज, अर्थात् बीस-बीस हाथ से विस्तार अधिक न हों, बनाकर गृहस्थों को रहना चाहिए। यदि वह सभा का स्थान हो तो बाहर की ओर द्वारों में चारों ओर कपाट और मध्य में गोल-गोल स्तम्भ बनाकर चारों ओर खुला बनाना चाहिए कि जिसके कपाट खोलने से चारों ओर का वायु उसमें आवे और सब घरों के चारों ओर वायु आनेके लिए अवकाश तथा वृक्ष, फल और पुष्करणी कुण्ड भी होने चाहिएँ, वैसे घरों में सब लोग रहें॥६॥ प्र॒तीचीं॑ त्वां प्र॒तीची॑नः शाले॒ प्रैम्यहिंस॑तीम्। अ॒ग्निर्ह्य१॒॑न्तराप॑श्च ऋ॒तस्य॑ प्रथ॒मा द्वाः॥७॥ अर्थ—जो (शाले) शालागृह (प्रतीचीनः) पूर्वाभिमुख तथा जो गृह (प्रतीचीम्) पश्चिम द्वारयुक्त, (अहिंसतीम्) हिंसादि दोषरहित, अर्थात् पश्चिम द्वार के सम्मुख पूर्व द्वार जिसमें (हि) निश्चय कर (अन्तः) बीच में (अग्निः) अग्नि का घर (च) और (आपः) जल का स्थान (ऋतस्य) और सत्य के ध्यान के लिए एक स्थान (प्रथमा) प्रथम (द्वाः) द्वार है, मैं (त्वा) उस शाला को (प्रैमि) प्रकर्षता से प्राप्त होता हूँ॥७॥ मा नः॒ पाशं॒ प्रति॑ मुचो गुरु॒भारो॑ लघु॒र्भव॑। व॒धूम॑िव त्वा शाले॒ यत्र॒कामं॑ भरामसि॥८॥ —अथर्व० कां० ९। अ० २। वर्ग ३॥ अर्थ—हे शिल्पि लोगो ! जैसे (नः) हमारी (शाले) शाला, अर्थात् गृह (पाशम्) बन्धन को (मा प्रतिमुचः) कभी न छोड़े, जिसमें (गुरुभारः) बड़ा भार (लघुर्भव) छोटा होवे, वैसी बनाओ। (त्वा) उस शाला को (यत्रकामम्) जहाँ जैसी कामना हो, वहाँ वैसी हम लोग (वधूमिव) स्त्री के समान (भरामसि) स्वीकार करते हैं, वैसे तुम भी ग्रहण करो ॥८॥

२३२ संस्कारविधिः इस प्रकार प्रमाणों के अनुसार जब घर बन चुके, तब प्रवेश करते समय क्या-क्या विधि करनी, वह नीचे लिखे प्रमाणे जानो— अथ विधि—जब घर बन चुके, तब उसकी अच्छे प्रकार शुद्धि करा, चारों दिशाओं के बाहरवाले द्वारों में चार वेदी और एक वेदी घर के मध्य बनावे, अथवा तांबे का वेदी के समान कुण्ड बनवा लेवे कि जिससे सब ठिकाने एक कुण्ड ही में काम हो जावे। सब प्रकार की सामग्री, अर्थात् पृष्ठ २३-२४ में लिखे प्रमाणे समिधा, घृत, चावल, मिष्ट, सुगन्ध, पुष्टिकारक द्रव्यों को लेके शोधन कर प्रथम दिन रख लेवे। जिस दिन गृहपति का चित्त प्रसन्न होवे, उसी शुभ दिन में गृहप्रतिष्ठा करे। वहाँ ऋत्विज्, होता, अध्वर्यु और ब्रह्मा का वरण करे, जोकि धर्मात्मा, विद्वान् हों। वे सब वेदी से पश्चिम दिशा में बैठें। उनमें से होता का आसन पश्चिम में और उसपर वह पूर्वाभिमुख, अध्वर्यु का आसन उत्तर में उसपर वह दक्षिणाभिमुख, उद्गाता का पूर्व दिशा में आसन उसपर वह पश्चिमाभिमुख बैठे और ब्रह्मा का दक्षिण दिशा में उत्तमासन बिछाकर उसे उत्तराभिमुख बैठावे। इस प्रकार चारों आसनों पर चारों पुरुषों को बैठावे और गृहपति सर्वत्र पश्चिम में पूर्वाभिमुख बैठा करे। ऐसे ही घर के मध्य वेदी के चारों ओर दूसरे आसन बिछा रक्खे। पश्चात् निष्क्रम्यद्वार, जिस द्वार से मुख्य करके घर से निकलना और प्रवेश करना होवे, अर्थात् जो मुख्य द्वार हो, उसी द्वार के समीप ब्रह्मा-सहित बाहर ठहर कर— ओम् अच्युताय भौमाय स्वाहा ॥ इससे एक आहुति देकर, ध्वजा का स्तम्भ जिसमें ध्वजा लगाई हो, खड़ा करे और घर के ऊपर चारों कोणों पर चार ध्वजा खड़ी करे तथा कार्यकर्त्ता गृहपति स्तम्भ खड़ा करके

गृहाश्रमप्रकरणम् २३३ उसके मूल में जल से सेचन करे, जिससे वह दृढ़ रहे। पुनः द्वार के सामने बाहर जाकर नीचे लिखे चार मन्त्रों से जलसेचन करे— ओ३म् इमामुच्छ्रयामि भुवनस्य नाभिं वसोर्द्धारां प्रतरणीं वसूनाम्। इहैव ध्रुवां निमिनोमि शालां क्षेमे तिष्ठतु घृतमुक्ष्‍यमाणा ॥ १ ॥ इस मन्त्र से पूर्व द्वार के सामने जल छिटकावे। अश्वावती गोमती सूनृतावत्युच्छ्रयस्व महते सौभगाय। आ त्वा शिशुराक्रन्दत्वा गावो धेनवो वाश्यमानाः ॥ २ ॥ इस मन्त्र से दक्षिण द्वार। आ त्वा कुमारस्तरुण आ वत्सो जगदैः सह। आ त्वा परिस्रुतः कुम्भ आ दध्नः कलशैरुप। क्षेमस्य पत्नी बृहती सुवासा रयिं नो धेहि सुभगे सुवीर्यम् ॥ ३ ॥ इस मन्त्र से पश्चिम द्वार। अश्वावद् गोमदूर्जस्वत् पर्णं वनस्पतेरिव। अभि नः पूर्यताँꣳ रयिरिदमनुश्रेयो वसानः ॥ ४ ॥ इस मन्त्र से उत्तर द्वार के सामने जल छिटकावे। तत्पश्चात् सब द्वारों पर पुष्प और पल्लव तथा कदली-स्तम्भ वा कदली के पत्ते भी द्वारों की शोभा के लिए लगाकर, पश्चात् गृहपति— हे ब्रह्मन्! प्रविशामीति। ऐसा वाक्य बोले। और ब्रह्मा— वरं भवान् प्रविशतु॥ ऐसा प्रत्युत्तर देवे। और ब्रह्मा की अनुमति से— ओ३म् ऋचं प्रपद्ये शिवं प्रपद्ये ॥ इस वाक्य को बोलके भीतर प्रवेश करे और जो घृत गरम कर, छान, सुगन्ध मिलाकर रक्खा हो, उसे पात्र में लेके जिस द्वार से प्रथम प्रवेश करे, उसी द्वार से प्रवेश करके, पृष्ठ २९- ३२ में लिखे प्रमाणे अग्न्याधान, समिदाधान, जलप्रोक्षण,

२३४ संस्कारविधिः आचमन करके पृष्ठ ३२-३३ में लिखे प्रमाणे घृत की आघारावाज्यभागाहुति चार और व्याहृति आहुति चार, नवमी स्विष्टकृत् आज्याहुति एक, अर्थात् दिशाओं की द्वारस्थ वेदियों में अग्न्याधान से लेके स्विष्टकृत् आहुतिपर्यन्त विधि करके, पश्चात् पूर्वदिशा द्वारस्थ कुण्ड में— ओं प्राच्या॑ दि॒शः शाला॑या॒ नमो॑ महि॒म्ने स्वाहा॑। ओम् दे॒वेभ्यः॒ स्वाहा॑भ्यः॒ स्वाहा॑॥ इन दो मन्त्रों से पूर्व द्वारस्थ वेदी में दो घृताहुति देवे। वैसे ही— ओं दक्षि॑णाया दि॒शः शाला॑या॒ नमो॑ महि॒म्ने स्वाहा॑। ओं दे॒वेभ्यः॒ स्वाहा॑भ्यः॒ स्वाहा॑॥ इन दो मन्त्रों से दक्षिण द्वारस्थ वेदी में एक-एक मन्त्र करके दो आज्याहुति और— ओं प्र॒तीच्या॑ दि॒शः शाला॑या॒ नमो॑ महि॒म्ने स्वाहा॑। ओं दे॒वेभ्यः॒ स्वाहा॑भ्यः॒ स्वाहा॑॥ इन दो मन्त्रों से दो आज्याहुति पश्चिम दिशा द्वारस्थ कुण्ड में देवे। ओं उदी॑च्या दि॒शः शाला॑या॒ नमो॑ महि॒म्ने स्वाहा॑। ओं दे॒वेभ्यः॒ स्वाहा॑भ्यः॒ स्वाहा॑॥ इनसे उत्तर दिशास्थ वेदी में दो आज्याहुति देवे। पुनः मध्यशालास्थ वेदी के समीप जाके स्व-स्व दिशा में बैठके— ओं ध्रुवाया॑ दि॒शः शाला॑या॒ नमो॑ महि॒म्ने स्वाहा॑। ओं दे॒वेभ्यः॒ स्वाहा॑भ्यः॒ स्वाहा॑॥ इनसे मध्य वेदी में दो आज्याहुति।

गृहाश्रमप्रकरणम् २३५ ओं ऊ॒र्ध्वाया॑ दिशः शाला॑या॒ नमो॑ महि॒म्ने स्वाहा॑। ओं दे॒वेभ्यः॒ स्वाहा॑भ्यः॒ स्वाहा॑ ॥ इनसे भी दो आहुति मध्यवेदी में। और— ओं दि॒शोदि॑शः शाला॑या॒ नमो॑ महि॒म्ने स्वाहा॑। ओं दे॒वेभ्यः॒ स्वाहा॑भ्यः॒ स्वाहा॑ ॥ इनसे भी दो आज्याहुति मध्यस्थ वेदी में देके, पुनः पूर्व दिशास्थ द्वारस्थ वेदी में अग्नि को प्रज्वलित करके वेदी के दक्षिणभाग में ब्रह्मासन तथा होता आदि के आसन पूर्वोक्त प्रकार बिछवा, उसी वेदी के उत्तरभाग में एक कलश स्थापन कर, पृष्ठ २४ में लिखे प्रमाणे स्थालीपाक बनाके, प्रथम निष्क्रम्यद्वार के समीप जा, ठहरकर ब्रह्मादिसहित गृहपति मध्यशाला में प्रवेश करके ब्रह्मादि को दक्षिणादि आसन पर बैठा, स्वयं पूर्वाभिमुख बैठके संस्कृत घी, अर्थात् जो गरम कर, छान, जिसमें कस्तूरी आदि सुगन्ध मिलाया हो, पात्र में लेके सबके सामने एक- एक पात्र भरके रक्खे और चमसा में लेके— ओं वास्तो॑ष्पते॒ प्रति॑ जानीह्य॒स्मान्त्स्वा॑वे॒शो अ॑नमी॒वो भ॑वा नः । यत्त्वेम॑हे॒ प्रति॒ तन्नो॑ जुषस्व॒ शं नो॑ भव द्विपदे॒ शं चतु॑ष्पदे॒ स्वाहा॑ ॥ १ ॥ वास्तो॑ष्पते॒ प्रतर॑णो न एधि गय॒स्फानो॑ गोभि॒रश्वे॑भिरिन्दो । अ॒जरा॑सस्ते स॒ख्ये स्या॑म पि॒तेव॑ पु॒त्रान् प्रति॑ नो जुषस्व॒ स्वाहा॑ ॥ २ ॥ वास्तो॑ष्पते श॒ग्मया॑ सं॒सदा॑ ते सक्षीमहिं रण्वया॑ गा॒तुमत्या॑। पा॒हि क्षेम॑ उ॒त योगे॒ वरं॑ नो यू॒यं पा॑त स्व॒स्तिभिः॒ सदा॑ नः॒ स्वाहा॑ ॥ ३ ॥ —ऋ० मं० ७। सू० ५४ ॥

२३६ संस्कारविधिः अमी॒वहा वास्तोष्पते॒ विश्वा॑ रू॒पाण्या॒विश॑न् । सखा॑ सु॒शेव॑ एधि न॒ः स्वाहा॑ ॥ ४ ॥ —ऋ० मं० ७ । सू० ५५ । मं० १ ॥ इन चार मन्त्रों से चार आज्याहुति देके, जो स्थालीपाक, अर्थात् भात बनाया हो, उसे दूसरे कांसे के पात्र में लेके, उसपर यथायोग्य घृत सेचन करके अपने-अपने सामने रक्खें और पृथक्-पृथक् थोड़ा-थोड़ा लेकर— ओम् अग्निमिन्द्रं बृहस्पतिं विश्वाँश्च देवानुपह्वये । सरस्वतीञ्च वाजीञ्च वास्तु मे दत्त वाजिनः स्वाहा ॥ १ ॥ सर्पदेवजनान्सर्वान् हिमवन्तः सुदर्शनम् । वसूँश्च रुद्रानादित्यानीशानं जगदैः सह । एतान्सर्वान् प्रपद्येहं वास्तु मे दत्त वाजिनः स्वाहा ॥ २ ॥ पूर्वाह्नमपराह्रं चोभौ मध्यन्दिना सह । प्रदोषमर्धरात्रं च व्युष्टां देवीं महापथाम् । एतान्सर्वान् प्रपद्येहं वास्तु मे दत्त वाजिनः स्वाहा ॥ ३ ॥ ओं कर्तारञ्च विकर्तारं विश्वकर्माणमोषधींश्च वनस्पतीन् । एतान्सर्वान् प्रपद्येहं वास्तु मे दत्त वाजिनः स्वाहा ॥ ४ ॥ धातारं च विधातारं निधीनां च पतिः सह । एतान्सर्वान् प्रपद्येहं वास्तु में दत्त वाजिनः स्वाहा ॥ ५ ॥ स्योनः शिवमिदं वास्तु दत्तं ब्रह्मप्रजापती । सर्वांश्च देवताश्च स्वाहा ॥ ६ ॥ स्थालीपाक, अर्थात् घृतयुक्त भात की इन छह मन्त्रों से छह आहुति देकर कांस्यपात्र में उदुम्बर=गूलर और पलाश के पत्ते, शाड्वल=तृणविशेष, गोमय, दही, मधु, घृत, कुशा और यव को लेके उन सब वस्तुओं को मिलाकर— ओं श्रीश्च त्वा यशश्च पूर्वे सन्धौ गोपायेताम्। इस मन्त्र से पूर्व द्वार।

गृहाश्रमप्रकरणम् २३७ यज्ञश्च त्वा दक्षिणा च दक्षिणे सन्धौ गोपायेताम्॥ इससे दक्षिण द्वार। अन्नञ्च त्वा ब्राह्मणश्च पश्चिमे सन्धौ गोपायेताम्॥ इससे पश्चिम द्वार। ऊर्कू चत्वा सूनृता चोत्तरे सन्धौ गोपायेताम्॥ इससे उत्तर द्वार के समीप उनको बिखेरे और जलप्रोक्षण भी करे। केता च मा सुकेता च पुरस्ताद् गोपायेतामित्यग्निर्वै केताऽऽदित्यः सुकेता तौ प्रपद्ये ताभ्यां नमोऽस्तु तौ मा पुरस्ताद् गोपायेताम्॥१॥ इससे पूर्व दिशा में परमात्मा का उपस्थान करके दक्षिण द्वार के सामने दक्षिणाभिमुख होके- दक्षिणतो गोपायमानं च मा रक्षमाणा च दक्षिणतो गोपायेतामित्यहर्वै गोपायमानःरात्री रक्षमाणा ते प्रपद्ये ताभ्यां नमोऽस्तु ते मा दक्षिणतो गोपायेताम्॥२॥ इस प्रकार जगदीश का उपस्थान करके पश्चिम द्वार के सामने पश्चिमाभिमुख होके- दीदिविश्च मा जागृविश्च पश्चाद् गोपायेतामित्यन्नं वै दीदिविः प्राणो जागृविस्तौ प्रपद्ये ताभ्यां नमोऽस्तु तौ मा पश्चाद् गोपायेताम्॥३॥ इस प्रकार पश्चिम दिशा में सर्वरक्षक परमात्मा का उपस्थान करके उत्तर दिशा में उत्तर द्वार के सामने उत्तराभिमुख खड़े रहके- अस्वप्नश्च माऽनवद्राणश्चोत्तरतो गोपायेतामिति चन्द्रमा वा अस्वप्नो वायुरनवद्राणस्तौ प्रपद्ये ताभ्यां नमोऽस्तु तौ मोत्तरतो गोपायेताम्॥४॥ धर्मस्थूणाराइजथं श्रीसूर्य्यामहोरात्रे द्वारफलके। इन्द्रस्य गृहा वसुमन्तो वरूथिनस्तानहं प्रपद्ये सह प्रजया पशुभिस्सह। यन्मे किञ्चिदस्त्युपहूतः सर्वगणः सखा यः साधुसंमतस्तां त्वा शाले अरिष्टवीरा गृहा नः सन्तु सर्वतः॥५॥

२३८ संस्कारविधिः इस प्रकार उत्तर दिशा में सर्वाधिष्ठाता परमात्मा का उपस्थान करके सुपात्र, वेदवित्, धार्मिक होता आदि सपत्नीक ब्राह्मण तथा इष्ट-मित्र और सम्बन्धियों को उत्तम भोजन कराके, यथायोग्य सत्कार करके दक्षिणा दे, पुरुषों को पुरुष और स्त्रियों को स्त्री प्रसन्नतापूर्वक विदा करें और वे जाते समय गृहपति और गृहपत्नी आदि को— 'सर्वे भवन्तोऽत्राऽनन्दिताः सदा भूयासुः॥' इस प्रकार आशीर्वाद देके अपने-अपने घर को जावें। इसी प्रकार आराम आदि की भी प्रतिष्ठा करें। इसमें इतना ही विशेष है कि जिस ओर का वायु बगीचे को जावे, उसी ओर होम करे कि जिसका सुगन्ध वृक्ष आदि को सुगन्धित करे। यदि उसमें घर बना हो तो शाला के समान उसकी भी प्रतिष्ठा करे। इति शालादिसंस्कारविधिः ॥ इस प्रकार गृहादि की रचना करके गृहाश्रम में जो-जो अपने-अपने वर्ण के अनुकूल कर्त्तव्य कर्म हैं, उन-उनको यथावत् करें। अथ ब्राह्मणस्वरूपलक्षणम् अध्यापनमध्ययनं यजनं याजनं तथा। दानं प्रतिग्रहश्चैव ब्राह्मणानामकल्पयत्॥ १॥ —मनु० ॥ शमो दमस्तपः शौचं क्षान्तिरार्जवमेव च। ज्ञानं विज्ञानमास्तिक्यं ब्रह्मकर्म स्वभावजम्॥ २॥ —गीता ॥ अर्थ—एक—निष्कपट होके प्रीति से पुरुष पुरुषों को और स्त्री स्त्रियों को पढ़ावें। दो—पूर्ण विद्या पढ़ें। तीन—अग्निहोत्रादि यज्ञ करें। चौथा—यज्ञ करावें। पाँच—विद्या अथवा सुवर्ण आदि का सुपात्रों को दान देवें। छठा—न्याय से धनोपार्जन

गृहाश्रमप्रकरणम् २३९ करनेवाले गृहस्थों से दान लेवें भी। इनमें से तीन कर्म—पढ़ना, यज्ञ करना, दान देना धर्म* हैं और तीन कर्म—पढ़ाना, यज्ञ कराना, दान लेना जीविका हैं। परन्तु— प्रतिग्रहः प्रत्यवरः ॥ —मनु० जो दान लेना है वह नीच कर्म है, किन्तु पढ़ाके और यज्ञ कराके जीविका करनी उत्तम है ॥ १ ॥ (शमः) मन को अधर्म में न जाने दे, किन्तु अधर्म करने की इच्छा भी न उठने देवे। (दमः) श्रोत्रादि इन्द्रियों को अधर्माचरण से सदा दूर रक्खे, दूर रखके धर्म ही के बीच में प्रवृत्त रक्खे। (तपः) ब्रह्मचर्य, विद्या, योगाभ्यास की सिद्धि के लिए शीत-उष्ण, निन्दा-स्तुति, क्षुधा-तृषा, मानापमान आदि द्वन्द्व का सहना। (शौचम्) राग-द्वेष-मोहादि से मन और आत्मा को तथा जलादि से शरीर को सदा पवित्र रखना। (क्षान्तिः) क्षमा, अर्थात् कोई निन्दा-स्तुति आदि से सतावें तो भी उनपर कृपालु रहकर क्रोधादि का न करना। (आर्जवम्) निरभिमान रहना, दम्भ, स्वात्मश्लाघा, अर्थात् अपने मुख से अपनी प्रशंसा न करके नम्र, सरल, शुद्ध, पवित्रभाव रखना। (ज्ञानम्) सब शास्त्रों को पढ़के, विचारकर उनके शब्दार्थ-सम्बन्धों को यथावत् जानकर पढ़ाने का पूर्ण सामर्थ्य करना। (विज्ञानम्) पृथिवी से लेके परमेश्वर-पर्यन्त पदार्थों को जान और क्रियाकुशलता तथा


  • धर्म नाम न्यायाचरण। न्याय नाम पक्षपात छोड़ के वर्तना। पक्षपात छोड़ना नाम सर्वदा अहिंसादि निर्वैरता सत्यभाषणादि में स्थिर रहकर, हिंसा-द्वेषादि और मिथ्याभाषणादि से सदा पृथक् रहना। सब मनुष्यों का यही एक धर्म है। किन्तु जो-जो धर्म के लक्षण वर्ण-कर्मों में पृथक्-पृथक् आते हैं, इसी से चार वर्ण पृथक्- पृथक् गिने जाते हैं।

२४० संस्कारविधिः योगाभ्यास से साक्षात् करके यथावत् उपकार ग्रहण करना- कराना। (आस्तिक्यम्) परमेश्वर, वेद, धर्म, परलोक, परजन्म, पूर्वजन्म, कर्मफल और मुक्ति से विमुख कभी न होना। ये नव कर्म और गुण धर्म में समझना। सबसे उत्तम गुण-कर्म-स्वभाव को धारण करना। ये गुण-कर्म जिन व्यक्तियों में हों वे ब्राह्मण और ब्राह्मणी होवें। विवाह भी इन्हीं वर्ण के गुण-कर्म-स्वभावों को मिलाके ही करें। मनुष्यमात्र में से इन्हीं को ब्राह्मण वर्ण का अधिकार होवे॥ २ ॥ अथ क्षत्रियस्वरूपलक्षणम् प्रजानां रक्षणं दानमिज्याध्ययनमेव च। विषयेष्वप्रसक्तिश्च क्षत्रियस्य समासतः॥ १ ॥ —मनु० ॥ शौर्यं तेजो धृतिर्दाक्ष्यं युद्धे चाप्यपलायनम्। दानमीश्वरभावश्च क्षात्रकर्म स्वभावजम्॥ २ ॥ —गीता ॥ **अर्थ—**दीर्घ ब्रह्मचर्य से (अध्ययनम्) साङ्गोपाङ्ग वेदादि शास्त्रों को यथावत् पढ़ना, (इज्या) अग्निहोत्रादि यज्ञों को करना, (दानम्) सुपात्रों को विद्या, सुवर्ण आदि और प्रजा को अभयदान देना, (प्रजानां रक्षणम्) प्रजाओं का सब प्रकार से सर्वदा यथावत् पालन करना, यह धर्म क्षत्रियों के धर्म के लक्षणों में और शस्त्रविद्या का पढ़ाना, न्यायघर और सेना में जीविका करना क्षत्रियों की जीविका है। (विषयेष्वप्रसक्तिः) विषयों में अनासक्त होके सदा जितेन्द्रिय रहना। लोभ, व्यभिचार, मद्यपानादि नशा आदि दुर्व्यसनों से पृथक् रहकर विनय, सुशीलवादि शुभ कर्मों में सदा प्रवृत्त रहना॥ १ ॥ (शौर्यम्) शस्त्र-संग्राम, मृत्यु और शस्त्र-प्रहारादि से न डरना, (तेजः) प्रगल्भता, उत्तम प्रतापी होकर किसी के सामने दीन वा भीरु न होना, (धृतिः) चाहे कितनी ही आपत्-विपत्,

गृहाश्रमप्रकरणम् क्लेश-दुःखं प्राप्त हो तथापि धैर्य रखके कभी न घबराना, २४१ (दाक्ष्यम्) संग्राम, वाग्युद्ध, दूतत्व, न्याय, विचार आदि सबमें अतिचतुर, बुद्धिमान् होना, (युद्धे चाप्यपलायनम्) युद्ध में सदा उद्यत रहना, युद्ध से घबराकर शत्रु के वश में कभी न होना, (दानम्) इसका अर्थ प्रथम श्लोक में आ गया। (ईश्वरभावः) जैसे परमेश्वर सबके ऊपर दया करके पितृवत् वर्त्तमान, पक्षपात छोड़कर धर्माऽधर्म करनेवालों को यथायोग्य सुख-दुःखरूप फल देता और अपने सर्वज्ञता आदि साधनों से सबका अन्तर्यामी होकर सबके अच्छे-बुरे कर्मों को यथावत् देखता है, वैसे प्रजा के साथ वर्त्तकर गुप्त दूत आदि से अपने को सर्वप्रजा वा राजपुरुषों के अच्छे-बुरे कर्मों से सदा ज्ञात रखना। रात-दिन न्याय करने और प्रजा को यथावत् सुख देने, श्रेष्ठों का मान और दुष्टों को दण्ड करने में सदा प्रवृत्त रहना और सब प्रकार से अपने शरीर को रोगरहित, बलिष्ठ, दृढ़, तेजस्वी, दीर्घायु रखके आत्मा को न्यायधर्म में चलाकर कृतकृत्य करना आदि गुण-कर्मों का योग जिस व्यक्ति में हो वह क्षत्रिय और क्षत्रिया होवे। इनका भी इन्हीं गुण-कर्मों के मेल से विवाह करना और जैसे ब्राह्मण पुरुषों और ब्राह्मणी स्त्रियों को पढ़ावे, वैसे ही राजा पुरुषों, राणी स्त्रियों का न्याय तथा उन्नति सदा किया करे। जो क्षत्रिय राजा न हों वे भी राज में ही यथाधिकार से नौकरी किया करें ॥ २ ॥ अथ वैश्यस्वरूपलक्षणम् पशूनां रक्षणं दानमिज्याध्ययनमेव च। वणिक्पथं कुसीदं च वैश्यस्य कृषिमेव च ॥ —मनु० ॥ अर्थ—(अध्ययनम्) वेदादि शास्त्रों का पढ़ना, (इज्या) अग्निहोत्रादि यज्ञों का करना, (दानम्) अन्नादि का दान देना, ये तीन धर्म के लक्षण हैं और (पशूनां रक्षणम्) गाय आदि

२४२ संस्कारविधिः पशुओं का पालन करना, उनके दुग्धादि का बेचना, (वणिक्पथम्) नाना देशों की भाषा, हिसाब, भूगर्भविद्या, भूमि, बीज आदि के गुण जानना और सब पदार्थों के भावाभाव समझना, (कुसीदम्) ब्याज का लेना*, (कृषिमेव च) खेती की विद्या का जानना, अन्न आदि की रक्षा, खाद और भूमि की परीक्षा, जोतना-बोना आदि व्यवहार का जानना, ये चार कर्म वैश्य की जीविका है। ये गुण-कर्म जिस व्यक्ति में हों वह वैश्य- वैश्या और इन्हीं की परस्पर परीक्षा और योग से विवाह होना चाहिए ॥ अथ शूद्रस्वरूपलक्षणम् एकमेव हि शूद्रस्य प्रभुः कर्म समादिशत् । एतेषामेव वर्णानां शुश्रूषामनसूयया ॥ -मनु० ॥ अर्थ- (प्रभुः) परमेश्वर ने (शूद्रस्य) जो विद्याहीन, जिसको पढ़ने से भी विद्या न आ सके, शरीर से पुष्ट, सेवा में कुशल हो, उस शूद्र के लिए (एतेषामेव वर्णानाम्) इन ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य तीनों वर्णों की (अनसूयया) निन्दा से रहित, प्रीति से सेवा करना, (एकमेव कर्म) यही एक कर्म (समादिशत्) करने की आज्ञा दी है। ये मूर्खत्वादि गुण और सेवा आदि कर्म जिस व्यक्ति में हों वह शूद्र और शूद्रा है। इन्हीं की परीक्षा से इनका विवाह और इनको अधिकार भी ऐसा ही होना चाहिए ॥ इन गुण-कर्मों के योग ही से चारों वर्ण होवें तो उस कुल, देश और मनुष्यसमुदाय की बड़ी उन्नति होवे और जिनका जन्म जिस वर्ण में हो उसी के सदृश गुण-कर्म-स्वभाव हों तो

  • सवा रुपये सैकड़े से अधिक, चार आने से न्यून ब्याज न लेवे न देवे। जब दूना धन आ जाए उससे आगे कौड़ी न लेवे न देवे। जितना न्यून ब्याज लेवेगा उतना ही उसका धन बढ़ेगा और कभी धन का नाश और कुसन्तान उसके कुल में न होंगे।

गृहाश्रमप्रकरणम् अतिविशेष है। २४३ अब सब ब्राह्मणादि वर्णवाले मनुष्य लोग अपने-अपने कर्मों में निम्नलिखित रीति से वर्त्ते- वेदोदितं स्वकं कर्म नित्यं कुर्यादतन्द्रितः। तद्धि कुर्वन् यथाशक्ति प्राप्नोति परमां गतिम् ॥ १ ॥ नेहेतार्थान् प्रसङ्गेन न विरुद्धेन कर्मणा। न विद्यमानेष्वर्थेषु नार्त्यामपि यतस्ततः ॥ २ ॥ अर्थ—ब्राह्मणादि द्विज वेदोक्त अपने कर्म को आलस्य छोड़के नित्य किया करें। उसे अपने सामर्थ्य के अनुसार करते हुए वे मुक्तिपर्यन्त पदार्थों को प्राप्त होते हैं॥१॥ गृहस्थ कभी किसी दुष्ट-प्रसङ्ग से द्रव्य-सञ्चय न करे, न विरुद्ध कर्म से, न विद्यमान पदार्थ होते हुए उन्हें गुप्त रखके, दूसरे से छल करके और चाहे कितना भी दुःख पड़े तथापि अधर्म से द्रव्य-सञ्चय कभी न करे॥२॥ इन्द्रियार्थेषु सर्वेषु न प्रसज्येत कामतः। अतिप्रसक्तिं चैतेषां मनसा सन्निवर्तयेत् ॥ ३ ॥ सर्वान्परित्यजेदर्थान् स्वाध्यायस्य विरोधिनः। यथा तथाऽध्यापयँस्तु सा ह्यस्य कृतकृत्यता ॥ ४ ॥ अर्थ—इन्द्रियों के विषयों में काम से कभी न फँसे और विषयों की अत्यन्त प्रसक्ति, अर्थात् प्रसङ्ग को मनसे अच्छे प्रकार दूर करता रहे॥३॥ जो स्वाध्याय और धर्म-विरोधी व्यवहार वा पदार्थ हैं, उन सबको छोड़ देवे। जिस-किसी प्रकार से विद्या को पढ़ाते रहना ही गृहस्थ का कृतकृत्य होना है॥४॥ बुद्धिवृद्धिकराण्याशु धन्यानि च हितानि च। नित्यं शास्त्राण्यवेक्षेत निगमाँश्चैव वैदिकान् ॥ ५ ॥ यथा यथा हि पुरुषः शास्त्रं समधिगच्छति। तथा तथा विजानाति विज्ञानं चास्य रोचते ॥ ६ ॥

२४४ संस्कारविधिः न संवसेच्च पतितैर्न चाण्डालैर्न पुक्कशैः । न मूर्खैर्नावलिप्तैश्च नान्त्यैर्नान्त्यावसायिभिः ॥७॥ नात्मानमवमन्येत पूर्वाभिरसमृद्धिभिः । आमृत्योः प्रियमन्विच्छेन्नैनां मन्येत दुर्लभाम् ॥८॥ सत्यं ब्रूयात् प्रियं ब्रूयान्न ब्रूयात् सत्यमप्रियम्। प्रियं च नानृतं ब्रूयादेष धर्मः सनातनः ॥९॥ अर्थ—हे स्त्री-पुरुषो ! तुम जो धर्म, धन और बुद्ध्यादि को अत्यन्त शीघ्र बढ़ानेवाले हितकारी शास्त्र हैं उन्हें और वेद के भागों की विद्याओं को नित्य देखा करो ॥५॥ मनुष्य जैसे-जैसे शास्त्र का विचार कर उसके यथार्थ भाव को प्राप्त होता है, वैसे-वैसे अधिक-अधिक जानता है और इसकी प्रीति विज्ञान ही में होती जाती है ॥६॥ सज्जन गृहस्थ लोगों को योग्य है कि जो पतित, दुष्ट कर्म करनेवाले हों उनके साथ तथा, चाण्डाल, कञ्जर, मूर्ख, मिथ्या- भिमानी और नीच निश्चयवाले मनुष्यों के साथ कभी निवास न करें ॥७॥ गृहस्थ लोग जो कभी पहले पुष्कल धनी होके पश्चात् दरिद्र हो जाएँ, उससे अपने आत्मा का अवमान न करें कि 'हाय हम निर्धन हो गये' इत्यादि विलाप भी न करें, किन्तु मृत्युपर्यन्त लक्ष्मी की उन्नति में पुरुषार्थ किया करें और लक्ष्मी को दुर्लभ न समझें ॥८॥ मनुष्य सदैव सत्य बोलें और दूसरे को कल्याणकारक उपदेश करें। काणे को काणा और मूर्ख को मूर्ख आदि अप्रिय वचन उनके सन्मुख कभी न बोलें और जिस मिथ्याभाषण से दूसरा प्रसन्न होता हो, उसे भी न बोलें, यह सनातन धर्म है ॥९॥ अभिवादयेद् वृद्धाँश्च दद्याच्चैवासनं स्वकम्। कृताञ्जलिरुपासीत गच्छतः पृष्ठतोऽन्वियात् ॥१०॥

गृहाश्रमप्रकरणम् २४५ श्रुतिस्मृत्युदितं सम्यङ् निबद्धं स्वेषु कर्मसु । धर्ममूलं निषेवेत सदाचारमतन्द्रितः ॥ ११ ॥ आचाराल्लभते ह्यायुराचारादीप्सिताः प्रजाः । आचाराद् धनमक्षय्यमाचारो हन्त्यलक्षणम् ॥ १२ ॥ दुराचारो हि पुरुषो लोके भवति निन्दितः । दुःखभागी च सततं व्याधितोऽल्पायुरेव च ॥ १३ ॥ सर्वलक्षणहीनोऽपि यः सदाचारवान् नरः । श्रद्दधानोऽनसूयश्च शतं वर्षाणि जीवति ॥ १४ ॥ अर्थ:—सदा विद्यावृद्धों और वयोवृद्धों को 'नमस्ते', अर्थात् उनका मान्य किया क़रे। जब वे अपने समीप आवें तब उठकर मान्यपूर्वक ला अपने आसन पर बैठावे और हाथ जोड़के आप उनके समीप बैठे उनसे प्रश्न पूछे और वे उत्तर देवें और जब वे जानें लगें तब थोड़ी दूर पीछे-पीछे जाकर 'नमस्ते' कर विदा किया करे और वृद्ध लोग हर बार निक़म्मे जहाँ-तहाँ न जाया करें ॥ १० ॥ गृहस्थ सदा आलस्य को छोड़कर वेद और मनुस्मृति में वेदानुकूल कहे हुए अपने कर्मों में निबद्ध और धर्म का मूल सदाचार, अर्थात् सत्य और सत्पुरुष, आप्त, धर्मात्माओं का जो आचरण है, उसका सेवन सदा किया करें ॥ ११ ॥ मनुष्य धर्माचरण ही से दीर्घायु, उत्तम प्रजा और अक्षय धन को प्राप्त होता है तथा धर्माचार बुरे, अधर्मयुक्त लक्षणों का नाश कर देता है ॥ १२ ॥ जो दुष्टाचारी होता है, वह सर्वत्र निन्दित, दुःखभागी और व्याधि से सदा अल्पायु हो जाता है ॥ १३ ॥ जो सब अच्छे लक्षणों से हीन होकर भी सदाचारयुक्त, सत्य में श्रद्धावान् और निन्दा आदि दोषरहित होता है, वह सुख से सौ वर्षपर्यन्त जाता है ॥ १४ ॥