संस्कार विधि (महर्षि दयानन्द सरस्वती - षोडश वैदिक संस्कार एवं गुरुकुल विधान सटीक)
Sanskar Vidhi of Maharshi Dayananda Saraswati
महर्षि स्वामी दयानन्द सरस्वती द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें२४२ संस्कारविधिः पशुओं का पालन करना, उनके दुग्धादि का बेचना, (वणिक्पथम्) नाना देशों की भाषा, हिसाब, भूगर्भविद्या, भूमि, बीज आदि के गुण जानना और सब पदार्थों के भावाभाव समझना, (कुसीदम्) ब्याज का लेना*, (कृषिमेव च) खेती की विद्या का जानना, अन्न आदि की रक्षा, खाद और भूमि की परीक्षा, जोतना-बोना आदि व्यवहार का जानना, ये चार कर्म वैश्य की जीविका है। ये गुण-कर्म जिस व्यक्ति में हों वह वैश्य- वैश्या और इन्हीं की परस्पर परीक्षा और योग से विवाह होना चाहिए ॥ अथ शूद्रस्वरूपलक्षणम् एकमेव हि शूद्रस्य प्रभुः कर्म समादिशत् । एतेषामेव वर्णानां शुश्रूषामनसूयया ॥ -मनु० ॥ अर्थ- (प्रभुः) परमेश्वर ने (शूद्रस्य) जो विद्याहीन, जिसको पढ़ने से भी विद्या न आ सके, शरीर से पुष्ट, सेवा में कुशल हो, उस शूद्र के लिए (एतेषामेव वर्णानाम्) इन ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य तीनों वर्णों की (अनसूयया) निन्दा से रहित, प्रीति से सेवा करना, (एकमेव कर्म) यही एक कर्म (समादिशत्) करने की आज्ञा दी है। ये मूर्खत्वादि गुण और सेवा आदि कर्म जिस व्यक्ति में हों वह शूद्र और शूद्रा है। इन्हीं की परीक्षा से इनका विवाह और इनको अधिकार भी ऐसा ही होना चाहिए ॥ इन गुण-कर्मों के योग ही से चारों वर्ण होवें तो उस कुल, देश और मनुष्यसमुदाय की बड़ी उन्नति होवे और जिनका जन्म जिस वर्ण में हो उसी के सदृश गुण-कर्म-स्वभाव हों तो
- सवा रुपये सैकड़े से अधिक, चार आने से न्यून ब्याज न लेवे न देवे। जब दूना धन आ जाए उससे आगे कौड़ी न लेवे न देवे। जितना न्यून ब्याज लेवेगा उतना ही उसका धन बढ़ेगा और कभी धन का नाश और कुसन्तान उसके कुल में न होंगे।