भारतकोश
संस्कार विधि (महर्षि दयानन्द सरस्वती - षोडश वैदिक संस्कार एवं गुरुकुल विधान सटीक)

संस्कार विधि (महर्षि दयानन्द सरस्वती - षोडश वैदिक संस्कार एवं गुरुकुल विधान सटीक)

Sanskar Vidhi of Maharshi Dayananda Saraswati

महर्षि स्वामी दयानन्द सरस्वती द्वारा

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पृष्ठ 247

गृहाश्रमप्रकरणम् अतिविशेष है। २४३ अब सब ब्राह्मणादि वर्णवाले मनुष्य लोग अपने-अपने कर्मों में निम्नलिखित रीति से वर्त्ते- वेदोदितं स्वकं कर्म नित्यं कुर्यादतन्द्रितः। तद्धि कुर्वन् यथाशक्ति प्राप्नोति परमां गतिम् ॥ १ ॥ नेहेतार्थान् प्रसङ्गेन न विरुद्धेन कर्मणा। न विद्यमानेष्वर्थेषु नार्त्यामपि यतस्ततः ॥ २ ॥ अर्थ—ब्राह्मणादि द्विज वेदोक्त अपने कर्म को आलस्य छोड़के नित्य किया करें। उसे अपने सामर्थ्य के अनुसार करते हुए वे मुक्तिपर्यन्त पदार्थों को प्राप्त होते हैं॥१॥ गृहस्थ कभी किसी दुष्ट-प्रसङ्ग से द्रव्य-सञ्चय न करे, न विरुद्ध कर्म से, न विद्यमान पदार्थ होते हुए उन्हें गुप्त रखके, दूसरे से छल करके और चाहे कितना भी दुःख पड़े तथापि अधर्म से द्रव्य-सञ्चय कभी न करे॥२॥ इन्द्रियार्थेषु सर्वेषु न प्रसज्येत कामतः। अतिप्रसक्तिं चैतेषां मनसा सन्निवर्तयेत् ॥ ३ ॥ सर्वान्परित्यजेदर्थान् स्वाध्यायस्य विरोधिनः। यथा तथाऽध्यापयँस्तु सा ह्यस्य कृतकृत्यता ॥ ४ ॥ अर्थ—इन्द्रियों के विषयों में काम से कभी न फँसे और विषयों की अत्यन्त प्रसक्ति, अर्थात् प्रसङ्ग को मनसे अच्छे प्रकार दूर करता रहे॥३॥ जो स्वाध्याय और धर्म-विरोधी व्यवहार वा पदार्थ हैं, उन सबको छोड़ देवे। जिस-किसी प्रकार से विद्या को पढ़ाते रहना ही गृहस्थ का कृतकृत्य होना है॥४॥ बुद्धिवृद्धिकराण्याशु धन्यानि च हितानि च। नित्यं शास्त्राण्यवेक्षेत निगमाँश्चैव वैदिकान् ॥ ५ ॥ यथा यथा हि पुरुषः शास्त्रं समधिगच्छति। तथा तथा विजानाति विज्ञानं चास्य रोचते ॥ ६ ॥