संस्कार विधि (महर्षि दयानन्द सरस्वती - षोडश वैदिक संस्कार एवं गुरुकुल विधान सटीक)
Sanskar Vidhi of Maharshi Dayananda Saraswati
महर्षि स्वामी दयानन्द सरस्वती द्वारा
पृष्ठ 239, कुल 318 में से
संदर्भ में पढ़ेंगृहाश्रमप्रकरणम् २३५ ओं ऊ॒र्ध्वाया॑ दिशः शाला॑या॒ नमो॑ महि॒म्ने स्वाहा॑। ओं दे॒वेभ्यः॒ स्वाहा॑भ्यः॒ स्वाहा॑ ॥ इनसे भी दो आहुति मध्यवेदी में। और— ओं दि॒शोदि॑शः शाला॑या॒ नमो॑ महि॒म्ने स्वाहा॑। ओं दे॒वेभ्यः॒ स्वाहा॑भ्यः॒ स्वाहा॑ ॥ इनसे भी दो आज्याहुति मध्यस्थ वेदी में देके, पुनः पूर्व दिशास्थ द्वारस्थ वेदी में अग्नि को प्रज्वलित करके वेदी के दक्षिणभाग में ब्रह्मासन तथा होता आदि के आसन पूर्वोक्त प्रकार बिछवा, उसी वेदी के उत्तरभाग में एक कलश स्थापन कर, पृष्ठ २४ में लिखे प्रमाणे स्थालीपाक बनाके, प्रथम निष्क्रम्यद्वार के समीप जा, ठहरकर ब्रह्मादिसहित गृहपति मध्यशाला में प्रवेश करके ब्रह्मादि को दक्षिणादि आसन पर बैठा, स्वयं पूर्वाभिमुख बैठके संस्कृत घी, अर्थात् जो गरम कर, छान, जिसमें कस्तूरी आदि सुगन्ध मिलाया हो, पात्र में लेके सबके सामने एक- एक पात्र भरके रक्खे और चमसा में लेके— ओं वास्तो॑ष्पते॒ प्रति॑ जानीह्य॒स्मान्त्स्वा॑वे॒शो अ॑नमी॒वो भ॑वा नः । यत्त्वेम॑हे॒ प्रति॒ तन्नो॑ जुषस्व॒ शं नो॑ भव द्विपदे॒ शं चतु॑ष्पदे॒ स्वाहा॑ ॥ १ ॥ वास्तो॑ष्पते॒ प्रतर॑णो न एधि गय॒स्फानो॑ गोभि॒रश्वे॑भिरिन्दो । अ॒जरा॑सस्ते स॒ख्ये स्या॑म पि॒तेव॑ पु॒त्रान् प्रति॑ नो जुषस्व॒ स्वाहा॑ ॥ २ ॥ वास्तो॑ष्पते श॒ग्मया॑ सं॒सदा॑ ते सक्षीमहिं रण्वया॑ गा॒तुमत्या॑। पा॒हि क्षेम॑ उ॒त योगे॒ वरं॑ नो यू॒यं पा॑त स्व॒स्तिभिः॒ सदा॑ नः॒ स्वाहा॑ ॥ ३ ॥ —ऋ० मं० ७। सू० ५४ ॥